नए साल पर पहली बार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार पूरी तरह एक्टिव नजर आ रहे हैं। सुबह-सुबह नीतीश कुमार उन्हें अपने साथ लेकर नालंदा पहुंचे।
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अपने पैतृक गांव कल्याण बिगहा में मुख्यमंत्री ने मां परमेश्वरी देवी की पुण्यतिथि पर कविराज रामलखन सिंह स्मृति वाटिका में जाकर उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि दी।
इस मौके पर मुख्यमंत्री के बेटे निशांत कुमार मौजूद रहे। निशांत ने अपनी दादी परमेश्वरी देवी को श्रद्धांजलि दी। उसके बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों से मुलाकात की और उनसे बातचीत की।
पार्टी के कार्यकर्ताओं ने निशांत को घेर लिया, उनसे अपनी बातें करने लगे। गांव के लोगों ने भी उन्हें अपनी समस्या बताईं। इस पर निशांत ने कहा कि देखते हैं हम करवाते हैं।
इसके बाद निशांत गांव की महिलाओं से मिले। गरीब लोगों और बच्चों के बीच कंबल भी बांटे। वहीं गेस्ट हाउस की भी कुछ तस्वीरें सामने आईं, जिसमें निशांत और नीतीश कुमार साथ-साथ नाश्ता करते दिखाई दिए। नाश्ते पर भी निशांत पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ बात करते नजर आए।
निशांत कुमार की तस्वीरें देखिए…
पैतृक गांव कल्याण बिगहा में निशांत नीतीश की तरह एक्टिव नजर आए।

गेस्ट हाउस में मुख्यमंत्री के साथ बेटे निशांत कुमार ने कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं के साथ नाश्ता किया।

दादी परमेश्वरी देवी की पुण्यतिथि पर निशांत कुमार ने महिलाओं की समस्याएं जानीं और कंबल बांटे।
अब जानिए निशांत कुमार के राजनीति में आने पर कब किसने क्या कहा
5 दिसंबर को पटना एयरपोर्ट पर JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और निशांत कुमार एक साथ दिखे। संजय झा ने कहा, ‘JDU के कार्यकर्ता, समर्थक और शुभचिंतक सभी चाहते हैं कि अब निशांत कुमार पार्टी में सक्रिय भूमिका निभाएं। पार्टी में हर कोई उन्हें काम करते देखना चाहता है। अब अंतिम निर्णय निशांत कुमार को ही लेना है।’
खास बात है कि इस बार संजय झा ने यह बयान मीडिया के बिना सवाल पूछे दिया है। मतलब अपने से बयान दिया है और वह भी निशांत कुमार के सामने। जबकि, इससे पहले 3 सितंबर को एक इंटरव्यू में संजय झा ने कहा था, ‘फिलहाल निशांत कुमार राजनीति में नहीं आएंगे। ऐसी कोई बात नहीं है। नीतीश कुमार फिलहाल सक्रिय हैं।’
- चुनाव के रिजल्ट के दूसरे दिन 16 नवंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बड़े भाई सतीश कुमार ने निशांत कुमार के बारे में कहा, ‘उनको राजनीति में आना चाहिए। हालांकि, यह उनकी इच्छा पर निर्भर है। उनकी जब इच्छा होगी, तब आएंगे।’
- चुनाव से पहले 5 सितंबर को राष्ट्रीय लोक मोर्चा नेता उपेंद्र कुशवाहा ने कहा था, ‘मेरे बाउंड्रीवाल के पीछे पार्टी कार्यालय में बैठे लोग सुन रहे होंगे। यदि समय रहते उत्तराधिकारी तय नहीं होगा तो वही स्थिति हो सकती है, जैसी शोषित समाज दल के साथ हुई थी। यदि उस पार्टी को उत्तराधिकारी मिला होता, तो आज वह बिहार की सबसे बड़ी ताकत होती।’
- इससे पहले 20 जुलाई को भी कुशवाहा ने सोशल मीडिया पर लिखा था, ‘समय रहते नीतीश कुमार अपना उत्तराधिकारी चुन लें। अगर देरी हुई तो इतना बड़ा नुकसान होगा, जिसकी भरपाई मुश्किल होगी।’
- कई मौकों पर तेजस्वी यादव कह चुके हैं, ‘पिता (नीतीश कुमार) का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, तो निशांत को आना चाहिए। दूसरी विचारधारा के लोग पार्टी हाईजैक कर लें उससे अच्छा है निशांत आएं।’

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत का अध्यात्म में मन लगता है। वह राजनीति से अब तक दूरी बनाकर रखे हुए हैं। फोटो 20 नवंबर के शपथ ग्रहण समारोह के तुरंत बाद की है।
निशांत को राजनीति में लाने की मांग क्यों हो रही है
1. नीतीश के बाद JDU में कोई पॉपुलर लीडर नहीं
2003 में बनी JDU बीते 22 साल से नीतीश की छतरी के नीचे ही चल रही है। नीतीश कुमार ही चेहरा हैं। पार्टी में कोई और नेता नहीं, जिसकी पकड़ पूरे बिहार में हो। दूसरे नंबर पर जरूर कुछ नेता पहुंचे हैं, लेकिन वे भी लंबे समय तक टिक नहीं पाए हैं।
- इनमें सबसे बड़ा नाम RCP सिंह यानी रामचंद्र प्रसाद सिंह का है। UP कैडर के IAS अफसर रहे RCP 2010 में नौकरी छोड़कर JDU में आए। उन्हें नीतीश कुमार का आंख-कान-नाक कहा जाता था। 2020 में JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हालांकि, 2 साल बाद ही दोनों के रिश्ते में दरार पड़ गई और RCP ने JDU छोड़ दिया। वे भाजपा में शामिल हुए और फिर जनसुराज का हिस्सा बन गए।
- 2015 में नीतीश के साथ मिलकर महागठबंधन की सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाले प्रशांत किशोर भी नीतीश के काफी करीब रहे। अक्सर वे नीतीश के साथ दिखते थे। तब चर्चा थी कि नीतीश के बाद प्रशांत किशोर ही JDU का चेहरा हैं। हालांकि, बाद में वह भी अलग हो गए।
- कोईरी समुदाय से आने वाले उपेंद्र कुशवाहा भी नीतीश के करीबी रह चुके हैं। हालांकि, बाद में उन्होंने अलग होकर खुद की पार्टी बना ली। कोईरी समुदाय नीतीश का कोर वोटर माना जाता है।
- पिछले साल पूर्व IAS अफसर मनीष वर्मा का नाम भी नीतीश के उत्तराधिकारी के तौर पर उभरा। नालंदा के रहने वाले मनीष वर्मा उसी कुर्मी समाज से आते हैं, जिससे नीतीश आते हैं। फिलहाल वे नीतीश कुमार के साथ दिखते तो हैं, लेकिन पार्टी के अहम निर्णयों से दूर दिखते हैं।
2. बड़े लीडर हैं भी तो कोर वोटर कोईरी-कुर्मी समुदाय से नहीं
JDU में नीतीश के अलावा 4 बड़े नेता हैं। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा, विजय कुमार चौधरी और अशोक चौधरी। इनमें ललन सिंह और विजय चौधरी भूमिहार हैं। संजय झा ब्राह्मण है और अशोक चौधरी दलित। जबकि, JDU का कोर वोटर कुर्मी-कोईरी और EBC हैं।
- तीनों समुदायों को मिला लें तो बिहार की कुल आबादी का 43% हैं। इनमें अकेले EBC आबादी 36% है।
- मतलब यह है कि नीतीश के बाद पार्टी के चारों बड़े नेता JDU के कोर वोट बैंक से नहीं आते। यानी चारों कुर्मी-कोईरी और अति पिछड़ा समीकरण में फिट नहीं।
सीनियर जर्नलिस्ट संजय सिंह बताते हैं, ‘फिलहाल बिहार की राजनीति में पिछड़ा तबका हावी है। नीतीश पिछड़े तबके के बड़े नेता हैं। ऐसे में वे किसी फॉरवर्ड को टॉप लीडरशिप नहीं सौंपना चाहेंगे। इससे अति पिछड़ा तबका लालू की तरफ शिफ्ट हो सकता है। अगर दलित नेता के नाते अशोक चौधरी को विरासत सौंपी जाती है, तो अति पिछड़ी जातियां उन्हें अपना नेता नहीं मानेगी।’
3. निशांत के नाम पर विवाद नहीं, पार्टी बच सकती है
पॉलिटिकल एनालिस्ट अभिरंजन कुमार कहते हैं, ‘भारत की पॉलिटिक्स को देखें तो यहां पॉलिटिकल साइंस की वेबर थ्योरी काम करती है। इसके मुताबिक, लीडरशिप 3 तरह की होती है- अथॉरिटेटिव मने आधिकारिक, डेमोक्रेटिक मने लोकतांत्रिक और कैरिस्मैटिक मने करिश्माई।
- भारत की रीजनल पार्टियां का उभार करिश्माई लीडरशिप के उभार के साथ जुड़ा है।
- इसमें जब नेतृत्व का ट्रांसफर परिवार में होता है तो विवाद नहीं होता। जैसे- लालू ने तेजस्वी को पार्टी सौंप दी। अगर पार्टी की कमान सेकेंड लाइन के नेताओं को देते तो विवाद की स्थिति बनती है।
- JDU में नीतीश कुमार के करीबी नेताओं में आपसी तालमेल नहीं है, जिसके चलते किसी भी स्थिति में नेतृत्व को लेकर विवाद रहेगा।
- यही कारण है कि नीतीश अगर परिवार से बाहर के नेता को पार्टी सौंपेंगे तो पार्टी का भविष्य खतरे में रहेगा। निशांत कुमार के नाम पर कोई विवाद नहीं होगा। और ना ही टूट होगी।’

जिन पार्टियों ने समय से अपना नेता घोषित नहीं किया, उनका क्या हुआ?
भारत की राजनीति में करिश्माई नेतृत्व का प्रचलन रहा है। लोगों और कार्यकर्ताओं के दिलो-दिमाग में नेताओं का प्रभाव रहा है। यही कारण है कि बिना परिवार की पार्टियों के भविष्य पर खतरा मंडराता रहा है। कांग्रेस की स्थिति ही देख लीजिए, पार्टी गांधी परिवार के बिना चल नहीं पाती।
भारतीय राजनीति की विडंबना है कि जिन पार्टियों ने समय से कदमताल कर अपना नेता घोषित नहीं किया है, वो खत्म हो गई हैं। इसे उदाहरण से समझिए…
- उपेंद्र कुशवाहा जिस शोषित समाज दल की बात रहे हैं, वह पार्टी बड़े समाजवादी नेता जगदेव प्रसाद की थी। 1970 में उनकी हत्या हो गई, पार्टी में कोई घोषित नेता नहीं था। बाद में यह पार्टी सिकुड़ती चली गई।
- वही हाल जनता पार्टी का भी हुआ। जनता पार्टी में अलग-अलग नेता हुए। उसमें से जनता दल (से), RJD, समता पार्टी बनी।
- दिवंगत जयललिता की पार्टी AIADMK को ही देख लीजिए। उनके निधन के बाद पार्टी खत्म होने की कगार पर है।

