चंडीगढ़ कोर्ट ने दविंदर सिंह गिल को इमीग्रेशन फ्रॉड और चेक बाउंस मामले में 2 साल की सजा सुनाई है। पीड़ित व्यक्ति को 25 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है। मेडिकल स्टोर संचालक से उसके बेटे को कनाडा भेजने के नाम पर 30 लाख रुपए लिए थे। लेकिन इसके बाद भी उसको विदेश नहीं भेजा। मामला 6 सितंबर 2019 का है। करीब 6 साल 5 महीने चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। 3 पॉइंट में जानिए पूरा मामला कोर्ट में आरोपी ने खुद को बताया निर्दोष मामले की सुनवाई के दौरान दविंदर गिल ने खुद को निर्दोष बताते हुए कहा कि वह शिकायतकर्ता नरेश भाटिया को नहीं जानता, चेक उसके नहीं हैं और उस पर किए गए साइन फर्जी हैं। उसने यह भी कहा कि उसे साजिश के तहत फंसाया गया है। वहीं शिकायतकर्ता ने बैंक रिकॉर्ड, ट्रांजैक्शन और अन्य दस्तावेज पेश किए, जिससे यह साबित हुआ कि पैसे दिए गए थे और चेक भी गिल द्वारा ही जारी किए गए थे। कोर्ट ने सभी सबूतों और गवाहों को ध्यान में रखते हुए पाया कि गिल अपने बचाव में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “सिग्नेचर डिफर” के कारण चेक बाउंस होना भी कानून के तहत अपराध है और इससे आरोपी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। 6 महीने की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी दिव्या शर्मा की कोर्ट ने दविंदर सिंह गिल को नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराते हुए 2 साल की साधारण कैद की सजा सुनाई। साथ ही आरोपी को 25 लाख रुपए शिकायतकर्ता को मुआवजा देने का आदेश दिया गया है। यदि आरोपी मुआवजा नहीं देता है, तो उसे 6 महीने की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी। कोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक गंभीर आर्थिक अपराध है, जिसमें आरोपी ने भरोसे का गलत फायदा उठाया और लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया से बचने की कोशिश की। ऐसे मामलों में नरमी नहीं बरती जा सकती, क्योंकि इससे बैंकिंग व्यवस्था और लेन-देन की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। क्रिस्पी खेहरा का रोल नहीं आया सामने कोर्ट के आदेश के अनुसार, क्रिस्पी खेहरा का इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण और सीधा रोल सामने आया है। रिकॉर्ड के मुताबिक, आरोपी दविंदर सिंह गिल ने शिकायतकर्ता को यह बताया था कि उसकी पत्नी क्रिस्पी खेहरा इमिग्रेशन का काम करती है और वही उसके बेटे को कनाडा भेजने की पूरी प्रक्रिया संभालेगी। इसी भरोसे पर शिकायतकर्ता ने पैसे देने के लिए सहमति दी। कोर्ट में यह भी साबित हुआ कि कुल 30 लाख रुपए में से 14 लाख रुपए सीधे क्रिस्पी खेहरा के बैंक खाते में RTGS के माध्यम से ट्रांसफर किए गए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह लेन-देन का हिस्सा थी। 2 चेक क्रिस्पी खेहरा के नाम से थे कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने जो रकम दी, वह दविंदर गिल और उसकी पत्नी दोनों को दी गई थी और दोनों ने मिलकर विदेश भेजने का भरोसा दिलाया था। जब काम पूरा नहीं हुआ और शिकायतकर्ता ने पैसे वापस मांगे, तब आरोपी और क्रिस्पी खेहरा ने मिलकर कुल 30 लाख रुपए के 5 पोस्ट डेटेड चेक जारी किए, जिनमें से दो चेक क्रिस्पी खेहरा के नाम से थे। इससे यह स्थापित होता है कि पैसे वापस करने की जिम्मेदारी में भी उसकी भागीदारी थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वर्तमान केस विशेष रूप से उस 25 लाख रुपए के चेक से संबंधित था, जो दविंदर सिंह गिल के खाते से जारी हुआ था और बाउंस हो गया। इसलिए इस मामले में सजा उसी को दी गई। बावजूद इसके, कोर्ट के रिकॉर्ड और साक्ष्यों से यह साफ है कि किस्पी खेरा पूरे लेन-देन, पैसे लेने और चेक जारी करने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल रही।
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