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100 साल का संघ, एपिसोड-1: मुस्लिमों का साथ देने पर गांधी से नाराज एक कांग्रेसी ने बनाया RSS, उनकी आखिरी चिट्ठी पढ़ सब हैरान क्यों रह गए

100 साल का संघ, एपिसोड-1:  मुस्लिमों का साथ देने पर गांधी से नाराज एक कांग्रेसी ने बनाया RSS, उनकी आखिरी चिट्ठी पढ़ सब हैरान क्यों रह गए


नागपुर में शुक्रवारी तालाब के पास एक ‘गणेश मंडल’ चलता था। उसके करीब ही एक मस्जिद थी। 1923 में मुसलमानों ने मस्जिद के सामने से हिंदुओं के धार्मिक जुलूस निकालने पर आपत्ति जताई। नागपुर के जिलाधिकारी ने हिंदुओं की झांकी निकालने पर रोक लगा दी।

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हिंदू भी अड़ गए कि अगर जुलूस की अनुमति नहीं मिली तो गणपति विसर्जन नहीं करेंगे। जिलाधिकारी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए मस्जिद के सामने से दिंडी यानी भजन मंडली के गुजरने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। दंगे भड़क गए, हिंसा हुई।

‘डॉक्टरजी’ के नाम से मशहूर 34 साल के केशव बलिराम हेडगेवार को उम्मीद थी कि उनकी पार्टी कांग्रेस के बड़े नेता हिंदुओं के लिए आवाज उठाएंगे, लेकिन उन्हें एक बार फिर निराशा हाथ लगी। हेडगेवार ने जिलाधिकारी के आदेश के खिलाफ ‘दिंडी सत्याग्रह’ शुरू किया और देखते ही देखते जय विट्ठल का नारा लगाती करीब 20 हजार लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई।

इसके बाद हेडगेवार ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2 साल के भीतर एक ऐसे संगठन की शुरुआत की, जो 100 सालों से अपनी विचारधारा और गतिविधियों की वजह से हमेशा सुर्खियों में बना हुआ है।

22 जून 1897 का दिन। रानी विक्टोरिया की ताजपोशी की 60वीं सालगिरह थी। पूरे देश की तरह नागपुर में भी सरकारी जश्न मनाया जा रहा था।

इस बीच 8 साल का एक बच्चा स्कूल में समारोह छोड़ घर लौट आया। उसे शांत और उदास देख बड़े भाई ने पूछा, ‘क्या तुम्हें मिठाई नहीं मिली।’

जवाब आया, ‘मिली थी। मैंने फेंक दी। हम इन अंग्रेजों के समारोह में कैसे हिस्सा ले सकते हैं?’

इस बच्चे का नाम था- केशव बलिराम हेडगेवार

केशव 13 बरस के हुए, तो प्लेग ने माता-पिता को छीन लिया। बड़े भाई महादेव ने उनकी परवरिश की। 15 साल के केशव की दोस्ती बीएस मुंजे से हुई। आंदोलन से जुड़े मुंजे अपने घर बुलाकर हेडगेवार को बम बनाने की ट्रेनिंग देते थे।

1910 में केशव डॉक्टरी पढ़ने कलकत्ता गए। 5 साल बाद डॉक्टर बनकर नागपुर लौटे, लेकिन नौकरी करने के बजाय एक व्यायामशाला खोली। यहां व्यायाम के साथ युवाओं के बीच ज्वलंत मुद्दों पर डिबेट कॉम्पिटिशन कराते थे।

अपने परिवार के साथ केशव बलिराम हेडगेवार (दाएं)। परिवार चाहता था कि हेडगेवार शादी करके घर बसा लें, लेकिन उन्होंने शादी नहीं की।

अपने परिवार के साथ केशव बलिराम हेडगेवार (दाएं)। परिवार चाहता था कि हेडगेवार शादी करके घर बसा लें, लेकिन उन्होंने शादी नहीं की।

1910 से 1919 के बीच हेडगेवार ने कई छोटे संगठन बनाए, पर उसका कुछ खास परिणाम नहीं निकला। उन्होंने 1919 में कांग्रेस जॉइन कर ली और 1920 में हिंदूवादी नेता एलवी परांजपे के भारत स्वयंसेवक मंडल से जुड़ गए। इस संगठन का काम कांग्रेस के अधिवेशनों के लिए ज्यादा से ज्यादा युवाओं को जुटाना था।

1921 में एक भाषण की वजह से अंग्रेजों ने उन पर देशद्रोह का मुकदमा लगाया। करीब सालभर जेल काटकर जुलाई 1922 में रिहा हुए।

इस बीच जेल से लिखी गई विनायक दामोदर सावरकर की किताब ‘Hindutva: Who is a Hindu’ उन्हें पढ़ने को मिली। यह एक ऐसी किताब थी जिसने उन्हें हिंदुओं का एक संघ बनाने का ठोस विचार दिया।

खिलाफत आंदोलन और मालाबार हिंसा में कांग्रेस लीडरशिप के रवैये से हेडगेवार काफी आहत थे।

साल 1923 में नागपुर में सांप्रदायिक दंगा हुआ। कलेक्टर ने हिंदुओं की झांकियों पर रोक लगा दी। हेडगेवार को उम्मीद थी कि कांग्रेस इसके विरोध में आवाज उठाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

नाराज हेडगेवार के मन में अब हिंदुओं के लिए अलग संगठन तैयार करने का ख्याल और मजबूत हुआ। तब देश में हिंदू महासभा का गठन हो चुका था। हेडगेवार के मेंटर रहे डॉ. बीएस मुंजे हिंदू महासभा के सचिव थे।

कुछ समय के लिए हेडगेवार हिंदू महासभा से जुड़े भी, लेकिन उन्हें यह संगठन रास नहीं आया। हेडगेवार का मानना था कि हिंदू महासभा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए हिंदू हितों से समझौता कर लेगी। आखिरकार हेडगेवार ने एक बड़ा फैसला किया।

27 सितंबर 1925, उस दिन विजयादशमी थी। हेडगेवार ने पांच लोगों के साथ अपने घर में एक बैठक बुलाई और कहा- आज से हम संघ शुरू कर रहे हैं

27 सितंबर 1925 को हेडगेवार के इसी घर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी गई थी। यह घर नागपुर के महल इलाके में हैं। तस्वीर 9 साल पुरानी है। फोटो क्रेडिट- सुरेश हावरे

27 सितंबर 1925 को हेडगेवार के इसी घर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी गई थी। यह घर नागपुर के महल इलाके में हैं। तस्वीर 9 साल पुरानी है। फोटो क्रेडिट- सुरेश हावरे

बैठक में हेडगेवार के साथ विनायक दामोदर सावरकर के भाई गणेश सावरकर, डॉ. बीएस मुंजे, एलवी परांजपे और बीबी थोलकर शामिल थे। 17 अप्रैल 1926 को हेडगेवार के संगठन का नामकरण हुआ- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी RSS।

महज 51 साल के हेडगेवार को किसी अज्ञात बीमारी ने जकड़ लिया था। उन्हें तेज बुखार बना रहता था। 20 जून 1940। बीमार हेडगेवार ने माधव सदाशिव गोलवलकर को कागज की एक पर्ची पकड़ाई। अगली सुबह हेडगेवार का निधन हो गया।

13 दिन बाद यानी 3 जुलाई 1940 को संघ के बड़े नेताओं की बैठक में हेडगेवार की पर्ची पढ़ी गई। इस पर लिखा था-

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इससे पहले कि तुम मेरे शरीर को डॉक्टरों के हवाले करो, मैं तुमसे कहना चाहता हूं कि अब से संगठन को चलाने की पूरी जिम्मेदारी तुम्हारी होगी।

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ये सुनते ही वहां मौजूद ज्यादातर लोग हैरान रह गए। दरअसल, संगठन में हेडगेवार के दाहिने हाथ अप्पाजी माने जाते थे, लेकिन हेडगेवार ने 34 साल के एक प्रोफेसर को संघ प्रमुख बनाकर सबको चौंका दिया।

19 फरवरी 1906, महाराष्ट्र में रामटेक कस्बे के एक ब्राह्मण परिवार में माधवराव गोलवलकर पैदा हुए। वे बचपन से मेधावी थे। नागपुर में ​स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी पहुंचे। यहां से जूलॉजी में बैचलर और मास्टर्स किया और वहीं लैब असिस्टेंट के तौर पर पढ़ाने लगे।

साल 1930 में एक दिन प्रभाकर बलवंत दानी नाम का स्टूडेंट गोलवलकर को BHU में लगने वाली RSS की एक शाखा में ले गया। वहां गोलवलकर ने हिंदू राष्ट्र और दर्शन पर भाषण दिए। उनकी बातों और वेषभूषा की वजह से हर कोई उन्हें ‘गुरुजी’ कहने लगा।

1932 में जब गोलवलकर नागपुर आए तो पहली बार हेडगेवार से मिले। ये उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। उन्होंने बनारस छोड़ दिया और नागपुर में वकालत की पढ़ाई के साथ संघ की गतिविधियों में जुट गए।

नवंबर 1936 में गोलवलकर संन्यास लेने रामकृष्ण मिशन के सरगाची आश्रम पहुंचे, लेकिन तीन महीने में ही लौट आए। रामकृष्ण मिशन और RSS के बीच उन्होंने RSS चुन लिया था।

नवंबर 1938। गोलवलकर ने अपने विचारों को एक किताब की शक्ल दी। नाम था- वी और अवर नेशनहुड डिफाइंड’। हिंदू राष्ट्र का सपना संजोए इस किताब में हिंदुस्तान में बाहर से आए लोगों के लिए काफी सख्त विचार थे…

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हिंदुस्तान में बाहर से आए लोगों को हिंदू संस्कृति और भाषा अपनानी होगी, हिंदू धर्म का आदर करना और उस पर श्रद्धा रखना सीखना होगा, अपने किसी भी अलग अस्तित्व को त्याग देना होगा और या फिर पूरी तरह हिंदू राष्ट्र की अधीनता में बिना किसी चीज पर दावा किए, बिना किसी विशेषाधिकार के, नागरिक अधिकारों के बगैर ही देश में रहना होगा।

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नए युवक की ऊर्जा और विचारों से चमत्कृत होकर ही हेडगेवार ने उन्हें RSS की कमान सौंपने का फैसला किया था। हेडगेवार के पहले मासिक श्राद्ध पर 21 जुलाई 1940 को गोलवलकर ने कहा,

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RSS अमर है। चाहे इसके संस्थापक की मृत्यु हो गई हो, लेकिन संघ आगे बढ़ता रहेगा। मैं नहीं जानता कि डॉक्टर साहब ने मुझे इस महान उत्तरदायित्व के लिए क्यों चुना, लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि उनका मेरे प्रति अपार प्रेम था।

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तस्वीर 1939 की है। केशव बलिराम हेडगेवार के साथ माधव सदाशिव गोलवलकर, जो 1940 में संघ के दूसरे सरसंघचालक बने।

तस्वीर 1939 की है। केशव बलिराम हेडगेवार के साथ माधव सदाशिव गोलवलकर, जो 1940 में संघ के दूसरे सरसंघचालक बने।

गोलवलकर जानते थे कि कैडर तैयार ​करने के लिए शाखा एक महत्वपूर्ण टूल है। उन्होंने शाखाओं के नियम बनाए। प्रार्थना, प्रतिज्ञा, व्यायाम, खेल-कूद और विचार-विमर्श को शामिल किया।

गोलवलकर खुद साल में कम से कम दो बार देश के हर राज्य में जाते। प्रचारकों और स्वयंसेवकों के साथ घुल-मिल जाना, हर किसी में विश्वास जगा देने की क्षमता, आकर्षक मुस्कान से ही मसलों को सुलझा देने का हुनर गोलवलकर की ​खासियत थी।

नतीजतन, संघ की शाखाओं का नेटवर्क पूरे देश में दूर-दराज के इलाकों तक फैल गया। तब की ब्रिटिश सरकार का डेटा है कि उस वक्त देशभर में 76 हजार लोग संघ की शाखाओं में रेगुलर जाने लगे थे।

लेकिन 30 जनवरी 1948 को अचानक… दिल्ली स्थित बिड़ला हाउस के प्रार्थना सभा की ओर जा रहे महात्मा गांधी के सीने में एक शख्स ने एक-एक कर तीन गोलियां उतार दीं।

दिल्ली के बिरला मंदिर परिसर में रखा महात्मा गांधी का पार्थिव शरीर।

दिल्ली के बिरला मंदिर परिसर में रखा महात्मा गांधी का पार्थिव शरीर।

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आगे की कहानी अगले एपिसोड में जारी… देखिए कल यानी 2 अक्टूबर की सुबह, दैनिक भास्कर ऐप पर



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