बिहार में 243 सीटों पर विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में चुनाव की घोषणा की है। नतीजे 14 नवंबर को आएंगे। चुनाव की तारीखों के साथ ही राज्य में आचार संहिता भी लागू हो गई है।
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आखिर क्या है ये आचार सहिंता, इसकी शुरुआत कब हुई, इसे सही तरीके से लागू करवाना किसने शुरू किया और लागू होने के बाद किन कामों पर रहेगी पाबंदी; जानेंगे भास्कर एक्सप्लेनर में…
शुरुआत एक किस्से से…
2 अगस्त 1993। उस वक्त के चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने 17 पेज का एक आदेश जारी किया। इसमें कहा गया था कि जब तक सरकार चुनाव आयोग की शक्तियों को मान्यता नहीं देती, तब तक देश में कोई चुनाव नहीं कराया जाएगा।
चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल की राज्यसभा सीट पर चुनाव नहीं होने दिया, जिसकी वजह से केंद्रीय मंत्री प्रणब मुखर्जी को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु इतना नाराज हुए कि उन्होंने चुनाव आयुक्त शेषन को ‘पागल कुत्ता’ तक कह दिया। वीपी सिंह ने कहा- शेषन ने तो प्रजातंत्र को ही लॉक-आउट कर दिया है।
टीएन शेषन को ही भारत में चुनावों के दौरान आचार संहिता को सही से लागू करवाने का श्रेय जाता है।
टीएन शेषन के बारे में कहा जाता है कि राजनेताओं में राजीव गांधी अकेले शख्स थे जो उन्हें पसंद करते थे।
आचार संहिता क्या है और चुनाव से कितने दिन पहले लागू होती है?
चुनाव आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए कुछ नियम बनाए हैं, जिसे मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट या आचार संहिता कहा जाता है। इसमें बताया गया है कि राजनीतिक पार्टियों और कैंडिडेट को चुनाव के दौरान क्या करना है और क्या नहीं करना है।
आचार संहिता की सबसे खास बात ये है कि ये नियम किसी कानून के जरिए नहीं बल्कि राजनीतिक पार्टियों की आपसी सहमति से बनाए गए हैं। आचार संहिता की वजह से चुनाव के दौरान राजनीतिक पार्टियों, कैंडिडेट्स और सत्ताधारी पार्टी के कामकाज और उनके व्यवहार पर नजर रखना संभव होता है।
इस दौरान अगर किसी पार्टी या कैंडिडेट को आचार संहिता के उल्लंघन का दोषी पाया जाता है तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। जरूरत होने पर आयोग आपराधिक मुकदमा भी दर्ज करा सकता है। यहां तक कि दोषी पाए जाने पर जेल की सजा भी हो सकती है।
आचार संहिता चुनाव के कार्यक्रमों की घोषणा के साथ ही लागू हो जाती है, जो इलेक्शन की पूरी प्रकिया खत्म होने तक जारी रहती है।
65 साल पहले केरल चुनाव में पहली बार आचार संहिता लागू हुई
25 जनवरी 1950 को देश में चुनाव आयोग की स्थापना हुई थी। इसका मकसद था कि चुनाव को निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी रखा जाए। इसके दस साल बाद 1960 के केरल विधानसभा चुनाव से आचार संहिता की शुरुआत हुई। चुनाव आयोग के अधिकारी और राजनीतिक पार्टियों के बीच बातचीत और सहमति के आधार पर आचार संहिता को तैयार किया गया। इसमें पार्टियों और उम्मीदवारों ने तय किया वो किन-किन नियमों का पालन करेंगे।
1962 के आम चुनाव के बाद 1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी आचार संहिता लागू हुई। बाद के चुनावों में उसमें और नियम जुड़ते चले गए। आचार संहिता किसी कानून का हिस्सा नहीं है। हालांकि इसके कुछ प्रावधान बीएनएस की धाराओं पर भी लागू होते हैं।
जब लालू ने चुनाव आयोग से कहा- भैंसिया पर चढ़ा कर गंगाजी में हेला देंगे
देश में भले ही आचार संहिता पर काम 1960 के दशक में शुरू हो गया था, लेकिन इसे सख्ती से लागू होने में तीन दशक लग गए। इसका श्रेय टीएन शेषन को जाता है। उन्होंने चुनाव आयोग को सरकार से अलग स्वतंत्र रखा। इसके लिए वो बिहार के मुख्यमंत्री लालू यादव से भी भिड़ गए थे।
साल 1995। बिहार में विधानसभा चुनाव का माहौल था। चुनाव करवाने की जिम्मेदारी टीएन शेषन के हाथों में थी। शेषन के लिए ऐसे राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना मुश्किल था, जो चुनावों के दौरान हिंसा और बूथ कैप्चरिंग के लिए कुख्यात था।
चुनाव की घोषणा से पहले शेषन ने कहा, ‘बिहार पर थोड़ा ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि अंत में यह नहीं कहा जाना चाहिए कि बाकी जगह काम बेहतर था, लेकिन बिहार में हम असफल रहे।
पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने द ब्रदर्स बिहारी में लिखा- मुक्त और निष्पक्ष चुनावों के लिए कब्रगाह के रूप में बिहार शेषन के लिए अंतिम चुनौती था, जिस पर उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाई। शेषन ने एक बार कहा था- I will Change the Bihar (मैं बिहार को बदल दूंगा।)

1995 विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव चुनाव आयोग के तौर तरीकों से नाराज थे।
शेषन ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आचार संहिता का थोड़ा उल्लंघन भी हुआ तो पूरी प्रक्रिया को रद्द कर दिया जाएगा। चुनाव आयोग ने चार बार इलेक्शन की तारीखों की घोषणा की फिर उसे आगे बढ़ाया। जब दिल्ली से चौथी बार चुनाव की तारीख को आगे टालने का फैक्स आया तो लालू तिलमिला गए।
लालू ने बिहार चुनाव आयोग के एक अधिकारी को फोन लगाया। तिलमिलाते हुए बोले- ऐ पिल्लई, ई का हो रहा है… हम तुमरा चीफ मिनिस्टर हैं और तुम हमरा अधिकारी, ई बीच में बेर-बेर शेषनवा कहां से आ जाता है और समझाओ उसको उ फैक्स करता है… बीतने दो चुनाव सब फैक्स फुस्स उड़ा देंगे।
लालू चुनाव आयोग से इतना खीझ चुके थे कि उन्होंने एक सभा में कहा- उ शेषनवा को बुझाता ही नहीं है, हम कउन हैं। भैंसिया पर चढ़ाकर गंगा जी में हेला देंगे।
हालांकि 1995 का चुनाव ठीक उसी तरह पूरा हुआ, जैसा शेषन चाहते थे। लालू की जीत हुई, लेकिन चुनाव आयोग ने निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव कराने में सफलता पाई।
जब एक नियम को लागू करने में 10 साल लग गए
1991 का आम चुनाव आचार संहिता के लिहाज से सबसे अहम था। उस साल चुनाव आयोग ने पहली बार सोचा कि आचार संहिता को चुनावों की तारीखों के साथ ही लागू कर देना चाहिए। हालांकि सरकार इसे उस दिन से लागू करना चाहती थी, जिस दिन अधिसूचना जारी हो।

1991 में टीएन शेषन चुनाव आयुक्त थे, तभी आचार संहिता में बदलाव पर विचार शुरू हुआ था।
चुनाव आयोग और सरकार के बीच ठनी तो मामला कोर्ट तक गया। 1997 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को सही ठहराया। इस फैसले के खिलाफ सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई, लेकिन वहां से कुछ क्लियर नहीं हुआ।
आखिरकार 16 अप्रैल 2001 को चुनाव आयोग और सरकार में सहमति बनी। तय किया गया कि आचार संहिता उसी दिन से लागू होगी जिस दिन चुनाव का कार्यक्रम जारी होगा। इसमें एक शर्त जोड़ी गई कि चुनाव की तारीखों की घोषणा अधिसूचना जारी होने से तीन हफ्ते से ज्यादा नहीं की जाएगी।
अब जानिए आचार संहिता के दौरान राजनीतिक पार्टियों और कैंडिडेट्स पर किस तरह की रोक होती है, कौन से सरकारी काम रोक दिए जाते हैं…
सवाल-1: आचार संहिता के दौरान कौन से काम रुक जाते हैं और कौन से चालू रहते हैं?
जवाब: अचार संहिता की वजह से इन कामों पर रोक लग जाती है…
- आचार संहिता लगने के बाद किसी भी तरह की सरकारी घोषणाएं, परियोजनाओं का लोकार्पण, शिलान्यास या भूमिपूजन का कार्यक्रम नहीं किया जा सकता।
- सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगले का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता है।
- सत्ताधारी पार्टी के लिए सरकारी पैसे से सरकार के काम का प्रचार-प्रसार करने के लिए विज्ञापन चलाने पर भी रोक होती है।
- विधायक, सांसद या विधान परिषद के सदस्य आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद लोकल एरिया डेवलपमेंट फंड से नई राशि जारी नहीं कर सकते हैं।
- आदर्श आचार संहिता लगने के बाद पेंशन फॉर्म जमा नहीं हो सकते और नए राशन कार्ड भी नहीं बनाए जा सकते। हथियार रखने के लिए नया आर्म लाइसेंस नहीं बनेगा। BPL के पीले कार्ड नहीं बनाए जा सकते।
- कोई भी नया सरकारी काम शुरू नहीं होगा। किसी नए काम के लिए टेंडर भी जारी नहीं होंगे। किसी नए काम की घोषणा नहीं होगी।
- आचार संहिता लागू होने के बाद चुनाव आयोग की इजाजत के बिना किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का तबादला नहीं किया जा सकता है।

सवाल-2: क्या आम आदमी पर भी आचार संहिता के नियम लागू होते हैं?
जवाब: आम नागरिकों पर भी आचार संहिता के कुछ नियम लागू होते हैं, लेकिन यह मुख्य रूप से राजनीतिक दलों और सरकारी अधिकारियों के लिए बनाई गई है।
आम नागरिकों की जिम्मेदारी यह है कि वे चुनाव के दौरान निष्पक्ष और शांतिपूर्ण रहें। उन्हें किसी को पैसे, उपहार या कोई और लाभ देकर वोट देने के लिए प्रभावित नहीं करना चाहिए। किसी को धमका कर या डराकर वोट दिलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। पोलिंग बूथ पर नियमों का पालने करें। वोटिंग मशीन या चुनाव से जुड़ी मशीनों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए।
सवाल-3: क्या चुनाव आयोग आचार संहिता लागू होने से पहले भी कार्रवाई कर सकता है?
जवाब: हां, इसे ऐसे समझें कि 2010 में चुनाव आयोग को एक शिकायत आई थी कि बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने सरकारी पैसे से अपने चुनाव चिह्न ‘हाथी’ की प्रतिमाएं बनवाई थीं, जिसे आचार संहिता का उल्लंघन माना गया।
शुरुआत में चुनाव आयोग ने कहा कि आचार संहिता लागू होने की समय-सीमा से पहले किसी राजनीतिक दल की ओर से सरकारी संसाधनों का कथित गलत इस्तेमाल होने पर कार्रवाई नहीं की जा सकती, लेकिन इस रुख को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की जांच के बाद हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि चुनाव आयोग BSP के चुनाव चिह्न को अमान्य घोषित कर सकता है।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि सत्ता में रहने वाली पार्टी को आचार संहिता लागू होने से पहले भी सरकारी पैसे का उपयोग अपने चुनाव चिह्न या नेताओं की स्थिति मजबूत करने के लिए नहीं करना चाहिए।
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