‘जब ईरान, सीरिया, सऊदी अरब या देवबंद जैसे इस्लामी देश और विचारधाराएं अपनी लड़कियों को पढ़ा रहे हैं, तो अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं को स्कूल-कॉलेज जाने से क्यों रोका जा रहा है?’
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ये सवाल स्मिता शर्मा का है। स्मिता फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं। इंटरनेशनल बीट कवर करती हैं। उनका सवाल अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी से था। अफगान मंत्री भारत दौरे पर हैं। 10 अक्टूबर को उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया। विवाद हुआ तो दो दिन बाद फिर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई। इसमें महिला पत्रकार भी शामिल हुईं।
दैनिक भास्कर ने महिला पत्रकार स्मिता शर्मा, सुहासिनी हैदर और कादंबिनी शर्मा से बात की। तीनों अमीर खान मुत्तकी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद थीं और उनसे तीखे सवाल पूछे।
वे कहती हैं कि महिला होने की वजह से ऐसा भेदभाव हमारे साथ कभी नहीं हुआ। एक अफसोस इस बात का है कि तालिबान के मंत्री ने ऐसा किया, दूसरा अफसोस है कि भारत सरकार ने ऐसा होने दिया। सरकार ने अब तक आपत्ति तक दर्ज नहीं कराई है।
अमीर खान मुत्तकी (बाएं) 6 दिन के भारत दौरे पर हैं। 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान में सत्ता संभालने के बाद पहली बार वहां से कोई मंत्री भारत आया है।
तालिबान के मंत्री की दो दिन में दो प्रेस कॉन्फ्रेंस सुहासिनी हैदर अंग्रेजी अखबार ‘द हिंदू’ में हैं। विदेश मंत्रालय और विदेशों से जुड़े मामले कवर करती हैं। विदेश से मंत्री या बड़े लीडर भारत आते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं, तो सुहासिनी को अक्सर बुलाया जाता है।
10 अक्टूबर को ऐसा नहीं हुआ। सुहासिनी को पहले तो अजीब नहीं लगा, लेकिन फिर पता चला कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक भी महिला रिपोर्टर नहीं थीं। अफगानिस्तान के दूतावास ने 18 रिपोर्टर, 7 वीडियो जर्नलिस्ट बुलाए और सभी पुरुष थे।

फोटो अफगान मंत्री अमीर खान मुत्तकी की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस की है। इसमें एक भी महिला पत्रकार को नहीं बुलाया गया।
ये फोटो सामने आया तो आलोचना शुरू हो गई। कहा गया कि ये तालिबान की महिला विरोधी सोच है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वॉड्रा, राहुल गांधी और TMC लीडर महुआ मोइत्रा ने भी सवाल उठाए। बात बढ़ी तो एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और इंडियन वूमेन प्रेस कॉर्प्स ने इसे भेदभाव बताया और कहा कि इस तरह की घटना आगे न हो।
इसके बाद अगली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को भी बुलाया गया। ये प्रेस कॉन्फ्रेंस करीब एक घंटे चली। पुरुष पत्रकारों ने तय किया कि आगे की दो कतारों में नहीं बैठेंगे, ताकि महिला पत्रकार वहां बैठें और अफगान मंत्री से सवाल पूछें।
हालांकि, प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में ही विदेश मंत्री मुत्तकी ने सफाई दी कि महिला पत्रकारों को जानबूझकर नजरअंदाज नहीं किया गया, प्रेस कॉन्फ्रेंस कम वक्त में बुलाई गई थी, इसलिए पत्रकारों की छोटी लिस्ट भेजी गई थी।

फोटो 12 अक्टूबर की है, जब अफगान मंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकार पहुंची थीं।
अब प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल पत्रकारों की बात पढ़िए…
सुहासिनी हैदर, द हिंदू ‘पत्रकारों ने दिखाया- यहां तालिबानी सोच नहीं चलेगी’ ‘द हिंदू’ की डिप्लोमैटिक अफेयर्स एडिटर सुहासिनी हैदर बताती हैं, ‘मैं 30 साल से दिल्ली में पत्रकारिता कर रही हूं। विदेश मंत्रालय को करीब से कवर किया है। ईरान से लेकर सऊदी अरब तक के विदेश मंत्रियों के इंटरव्यू लिए हैं। आज तक मुझे एक बार भी महिला होने की वजह से नहीं रोका गया। कभी किसी ने नहीं कहा कि अपना सिर ढक लो या इस तरह के कपड़े पहन लो।’
‘10 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बारे में हमें कुछ पता नहीं चला। प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म हुई, तब पता चला कि इसमें किसी महिला रिपोर्टर को नहीं बुलाया गया। हमने भारतीय विदेश मंत्रालय के अफसरों से पूछा कि क्या आपको पता था कि तालिबान अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाएंगे और इस तरह के भेदभाव पर विदेश मंत्रालय का रुख क्या है?’
‘जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने बयान जारी किया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में हमारी कोई भूमिका नहीं है। हमने जोर दिया कि भारत सरकार को इस पर कुछ तो कहना चाहिए। हम जिस सरकार को मान्यता देते हैं, तालिबान अभी उसका हिस्सा नहीं है।’
भारत सरकार ने अब तक तालिबान सरकार को मान्यता नहीं दी है। अगर दूतावास के अंदर कुछ गैर-कानूनी या गलत हो रहा है तो आप किसी पर मुकदमा तो नहीं कर सकते, लेकिन विदेश मंत्रालय की तरफ से निंदा तो की जा सकती है।

‘10 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबान को खराब कवरेज मिली, तो उसने रुख बदला और दो दिन बाद महिला पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बुलाया। सवाल भारत सरकार पर भी है कि उन्होंने तालिबान को भारत बुलाया और तालिबानी सोच को यहां जारी रखा गया।’

‘12 अक्टूबर को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुरुष पत्रकारों ने आगे की दो लाइन महिला पत्रकारों के लिए छोड़ने का फैसला लिया। हमने कहा कि हमें एक साथ बैठना चाहिए, जैसे आम तौर पर बैठते हैं। वे चाहते थे कि अगर हम पहली लाइन में बैठेंगे, तो तालिबान के मंत्री को महिला पत्रकारों के सवालों का जवाब देना ही होगा।’
‘हमारा यही कहना था कि किसी भी तरह का भेदभाव हमें मंजूर नहीं है। प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले का अधिकार है कि वो किसे बुलाता है। विदेश मंत्रालय कवर करने वाले 18 पत्रकार और 7 वीडियो जर्नलिस्ट बुलाए गए। इस बीट में कई महिला रिपोर्टर हैं, लेकिन तालिबान ने एक को भी नहीं बुलाया। ये तो भेदभाव है।’

‘उन्हें ऐसा लगा कि वे शायद इस सोच के साथ आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन पत्रकारों ने दिखाया कि यहां तालिबानी सोच नहीं चलेगी। यहां हमारे रिवाज, संस्कृति और सभ्यता से काम होता है। जो हुआ अच्छा हुआ। 10 अक्टूबर की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद तालिबान के नेता चले जाते और आगे कभी भारत दौरे पर आते तो सिर्फ पुरुष पत्रकारों को बुलाकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सकते थे।’
स्मिता शर्मा फ्रीलांस जर्नलिस्ट 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी हुई, तब से हमें ठीक से पता नहीं पता था कि अफगानिस्तान दूतावास में होने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए कैसे अर्जी देनी है। 10 अक्टूबर की सुबह हमारे मेल कलीग्स ने बताया कि उन्हें अफगानिस्तान दूतावास की तरफ से प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने के लिए बुलाया गया है। प्रेस ब्रीफिंग के लिए किसी महिला रिपोर्टर को न्योता नहीं आया, तो ये चौंकाने वाली बात थी।
प्रेस ब्रीफिंग दूतावास में अंदर चल रही थी और बाहर दिल्ली पुलिस तैनात थी। जिन्हें बुलाया गया था, सिर्फ उन्हें ही अंदर जाने दिया गया। महिला पत्रकारों को न्योता ही नहीं दिया गया इसलिए उन्हें अंदर जाने देने का सवाल ही नहीं उठता।
तालिबान की सरकार बनने के बाद पहली बार है, जब सीधे पत्रकारों से बात की गई। इसमें महिला पत्रकार भी अच्छी खासी थीं। हमने 10 अक्टूबर वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं के न बुलाए जाने पर आपत्ति जताई। हमने कहा कि तालिबान काबुल में महिला पत्रकारों से बात करते हैं।

तालिबान के मंत्री ने भारत आकर महिला पत्रकारों के साथ भेदभाव किया, उससे भी ज्यादा अफसोस की बात है कि भारत सरकार ने ऐसा होने दिया। भारत सरकार ऐसा होने से रोक सकती थी। ऐसा नहीं हो सकता कि प्रेस कॉन्फ्रेंस हो रही हो और सरकार को पता न हो। भारत सरकार की तरफ से आपत्ति दर्ज की जानी चाहिए थी, जो अब तक नहीं की गई है।
तालिबान के विदेश मंत्री मुत्तकी ने एक घंटे तक सवालों के जवाब दिए, हालांकि उनके जवाब टालमटोल करने वाले थे। उन्होंने जवाब देते हुए हवा हवाई बातें कीं, लेकिन ये उनका अधिकार है कि वे क्या जवाब देना चाहते हैं।

स्मिता शर्मा ने अफगानिस्तान में भारत के पत्रकार दानिश सिद्दीकी की हत्या पर भी सवाल पूछा। अफगान मंत्री ने जवाब दिया कि अफगानिस्तान ने 4 दशकों तक युद्ध झेला है। इसमें कई युवा पत्रकारों की मौत हुई है। ये हमारे इतिहास में एक काला अध्याय है। पिछले 4 साल के हमारे शासन में किसी भी पत्रकार को कोई नुकसान नहीं हुआ।

अफगान मंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्मिता शर्मा। उन्होंने अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पर सवाल पूछे।
कादंबिनी शर्मा फ्रीलांस जर्नलिस्ट पहले हम अफगानिस्तान के राजदूतों से मिलते थे। महिलाओं का डेलिगेशन जाता था और खुलकर मुलाकात होती थी। पिछली सरकार के दौरान आराम से बैठकर बातें होती थीं। पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया, इस वजह से माहौल गर्म था। नाराजगी साफ दिख रही थी। किसी ने नहीं सोचा कि महिला पत्रकारों के साथ ऐसा बर्ताव होगा।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में 90% सवाल महिला पत्रकारों ने ही पूछे। पुरुष पत्रकारों ने भी हमें समय दिया, ताकि हम खुलकर सवाल पूछें। हमने अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति, पढ़ाई, हेल्थ पर सवाल किए, लेकिन अफगान मंत्री ने सीधा जवाब नहीं दिया।
ये सवाल जितनी सख्ती से पूछे जाने चाहिए, हमने वैसे ही पूछे। मुत्तकी बार-बार कहते रहे कि हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर फैसले कर रहे हैं, लेकिन आधी आबादी अगर प्राथमिकता में नहीं होगी, तो कैसे चलेगा।
दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों को बुलाने के पीछे की क्या कहानी है, ये कहना मुश्किल है। ये साफ है कि सरकार की भी आलोचना हुई।

अभिषेक झा फ्रीलांस जर्नलिस्ट तालिबान के विदेश मंत्री भारत-अफगानिस्तान के रिश्तों को बेहतर करने के मकसद से आए थे। पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिलाओं को नहीं बुलाया गया, तो तालिबान की सरकार की किरकिरी हुई। ये धारणा बनी कि तालिबान में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अब भी वे महिला विरोध वाली सोच के साथ ही काम कर रहे हैं।

पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अफगानिस्तान के दूतावास के बाहर सख्ती से चेकिंग की गई थी। दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दरवाजा खोल दिया गया, सभी को अंदर जाने दिया। उन्होंने पत्रकारों की पहचान तक नहीं पूछी। लग रहा था कि तालिबान सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ है।
तालिबान की तरफ से तुरंत इस गलती को सुधारने के लिए दूसरी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई गई। ये कहना मुश्किल है कि ये सुधार करने के लिए भारत सरकार की तरफ से कहा गया या फिर तालिबान ने खुद सुधार किया।
