पहले मैं घर की चारदीवारी में गुनगुनाती थी, किस्मत ने मुझे दुनिया के सबसे बड़े मंच तक पहुंचा दिया। गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म में ‘वुमनिया’ गीत से मेरी आवाज को रातों-रात पहचान मिली। शोहरत की चमक के बीच मेरे पति पंकज झा की दोनों किडनियां फेल हो गईं। 10 सा
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गायिका रेखा झा अपने पति पंकज झा को याद कर रोती हुईं। गैंग्स ऑफ वासेपुर में ‘वुमनिया’ गाने से चर्चा के बाद उनके पास सब कुछ है, लेकिन उन्हें संगीत की ट्रेनिंग दिलाने वाले उनके पति उनकी सफलता को देखने के लिए जिंदा नहीं हैं। इसका उन्हें बहुत अफसोस है।
मेरा नाम रेखा झा है। बिहार के मिथिला की बेटी हूं। समस्तीपुर जिला मेरी जन्मभूमि और पटना कर्मभूमि है। मिडिल क्लास परिवार में पैदा हुई। मेरे पिताजी संगीत के टीचर थे। तीन भाइयों के बीच मैं अकेली बेटी थी।
जब मेरी इंटरमीडिएट की पढ़ाई खत्म हुई, तो मेरी उम्र 17 साल थी। तभी घर वालों ने मेरी शादी कर दी। मेरे पति भी 17 साल के थे। उस उम्र में हम दोनों को घर-गृहस्थी की समझ ठीक से नहीं थी। उस वक्त मेरा संगीत से दूर-दूर का कोई नाता नहीं था। हां, घर का काम करते हुए गुनगुनाती रहती थी। मुझे गुनगुनाता देख अक्सर मेरे पति कहते- चलो तुम्हें संगीत की ट्रेनिंग दिला दूं, लेकिन मना कर देती थी। घर में काम इतना ज्यादा होता था कि उससे फुरसत ही नहीं थी।
लेकिन मेरे पति नहीं मानते। वह अक्सर जिद कर बैठते। एक दिन मैंने यह बात अपने पिताजी को बताई। वह तो सुनते ही खुशी से पागल हो गए क्योंकि वह संगीत टीचर थे। मेरे तीनों भाइयों को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसके बाद मेरे पति मुझे एक संगीत टीचर के पास ले गए और उनसे ट्रेनिंग दिलानी शुरू कर दी। इस तरह मेरे पति ट्रैवल एजेंसी चलाते थे और मैं घर संभालने के साथ-साथ संगीत सीखने लगी।
संगीत टीचर से सीखकर आती तो घर पर रियाज न कर पाती क्योंकि घर पर काम बहुत होता था। खाना बनाते, बच्चों को संभालते, कपड़े धोते, साफ-सफाई करते हुए बंदिशें और राग गुनगुनाते हुए रियाज करती थी
इस तरह जब थोड़ा सीख गई तो मेरे पिताजी ने एक गुरु की तलाश की और उन्हें संगीत सिखाने के लिए मेरे घर भेजने लगे। उनसे मैंने भोजपुरी, मैथिली और शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया। गुरु जी से सीखते हुए कुछ ही महीने हुए थे कि उन्होंने बताया कि पटना में एक ऑडिशन है। वहां जाकर ऑडिशन दे आओ। मैं एक घरेलू औरत थी। उल्टे पल्लू वाली साड़ी नहीं पहनती थी कि मॉडर्न लगूं। समझ नहीं आ रहा था कि वहां कैसे जाऊं और बड़े-बड़े लोगों से जाकर कैसे बात करूंगी। गुरु जी से कहा- आप भी साथ चलो। वह तैयार हो गए और मुझे वहां लेकर गए।
वहां गई तो देखा बहुत सारे लोग ऑडिशन देने के लिए आए थे। सब एक से बढ़कर एक थे। उन्हें ऑडिशन देते हुए देखकर मैं तो घबरा गई। लगा कि इनके आगे मैं क्या हूं। हालांकि मेरी बारी आई। मैंने गाना गाया। सब रिजल्ट का इंतजार कर रहे थे। आखिर में सभी को घर जाने के लिए बोल दिया गया, लेकिन मुझे रोक लिया गया।
जब मुझे रोका गया तो लगा कि शायद मुझसे कुछ गलती हो गई है। समझाने के लिए रोका गया है, लेकिन जब रिजल्ट आया तो मुझे सिलेक्ट कर लिया गया था। वो दृश्य आज भी भूलता नहीं। आखिर कैसे स्नेहा वालेकर मैम ने जेब में हाथ डालकर मेरी तरफ देखा था और मुझे गले लगा लिया था। उसके बाद मुझे बताया गया कि आपका यह सिलेक्शन अनुराग कश्यप की फिल्म के लिए हुआ है। वह गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म बना रहे हैं। आप उसमें वुमनिया टाइटल का गीत गाएंगी।
उसके बाद इस गीत की रिकॉर्डिंग बनारस और मुंबई में की गई। मैंने गाया। गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म रिलीज हुई। यह गीत इतना हिट हुआ कि इसने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसने देश-विदेश में धूम मचा दी। आखिर मेरी जैसी एक घरेलू औरत की शोहरत रातों-रात आसमान छूने लगी। बिहार से लेकर मुंबई की संगीत की दुनिया में मेरे चर्चे होने लगे। इस गाने के हिट होने के बाद तो मुझे कई जगह से बुलावा आने लगा। बड़े-बड़े स्टेज शो के ऑफर मिलने लगे।

फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर का पोस्टर। रेखा झा ने इस फिल्म में ‘वुमनिया’ गीत गाया, जिसके लिए उन्हें कई सारे अवॉर्ड मिले।
लेकिन इस दौरान भगवान को कुछ और मंजूर था। एक तरफ मेरी जिंदगी में इतनी बड़ी खुशी, चकाचौंध, संगीत, शोहरत, बुलावे पर बुलावे आ रहे थे तो दूसरी तरफ मेरे पति की दोनों किडनियां फेल हो गईं। मेरी सारी खुशी गम में बदल गई। वो 2012 का साल था।
हम इतने साधारण परिवार से थे कि हमारे पास किडनी के इलाज के लिए पैसे नहीं थे। 2013 में मेरे पति का इलाज शुरू हुआ। जितना भी पैसा मेरे पास था सब उनके इलाज पर खर्च होता गया। एक तरह से जीवन पटरी से उतर गया, लेकिन इस दौरान मेरे पति ने मुझे कसम दी। कहा- मैं भले ही बेड पर पड़ा हूं, लेकिन तुम गाना मत बंद करना। वह इसलिए कह रहे थे ताकि घर की दो जून की रोटी चलती रहे क्योंकि घर चलाने का और कोई रास्ता नहीं था।
उनकी जिद पर मैंने गाने का फैसला किया। मन मार कर स्टेज पर जाने लगी। मंच पर जाती तो दिल रो रहा होता था, लेकिन जबर्दस्ती चेहरे पर मुस्कान लाती। सोचती कि अगर मेरा सुर इधर से उधर हुआ तो कोई गाने के लिए नहीं बुलाएगा। फिलहाल, अच्छा गाती ताकि प्रोग्राम मिलता रहे और घर चलता रहे। सोचिए, जब घर के हालात इतने बुरे हों तो मंच पर मुस्कुराकर गाना कैसा लगता होगा। यह अपने ऊपर जुल्म जैसा था।
इस तरह गाने से जो भी पैसे मिलते, पति के इलाज पर लगा देती। उस दौरान मेरे पांच छोटे बच्चे थे, लेकिन वुमनिया गीत के कारण मुझे इतनी चर्चा मिली कि लोग संपर्क कर-करके मेरी मदद रहे थे। आखिरी दिनों में पति का सप्ताह में दो बार डायलिसिस होने लगा। वह आईसीयू में भी एडमिट हुए। आखिरकार डॉक्टरों ने बोल दिया कि अब कुछ नहीं हो सकता। इस तरह 10 साल तक पति का इलाज कराया।
साल 2022 में पति की मौत हो गई। जिंदगी बिखर गई। जिस दिन पति की मौत हुई है उस दिन मेरे पास अर्थी तक के लिए पैसे नहीं थे। डॉक्टरों ने इलाज के लिए बहुत पैसे ले लिए थे। उस दिन मेरे भाई ने कहीं से अर्थी के पैसे का इंतजाम किया। बड़ी मुश्किल से उनका अंतिम संस्कार और बाकी का क्रिया-कर्म किया।

अपने पति पंकज झा के साथ गायिका रेखा झा।
पति के जाने के बाद कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं। पटना में रहने का हर महीने किराया देना। बच्चे छोटे थे, उनकी देखभाल, पढ़ाई-लिखाई का खर्च सब मुश्किल हो रहा था। बच्चों के साथ सारी-सारी रात बैठी रहती। हम एक-दूसरे की शक्लें देखते और रोते। इस तरह डेढ़ से दो साल तक कुछ नहीं किया। एक तरह से डिप्रेशन में रही। किसी से बात नहीं करती। भगवान से कहती कि यह क्या हो रहा मेरे साथ।
उस वक्त बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी। वह फोन करके पूछती- मां सब ठीक है? उसे कोई दुख न पहुंचे, कह देती- हां सब ठीक है। उस समय अक्सर खाना नहीं खाई होती थी।
इस तरह घर के हालात बहुत खराब थे। मेरे एक जानकार ने मेरी मदद की। मेरी छोटी बेटी को एक प्राइवेट नौकरी दिलाई, लेकिन सैलरी बहुत कम थी। फिर कुछ मदद होने लगी। उस समय मेरी एक और बेटी गुरुग्राम में नौकरी करती थी, वह भी कुछ पैसे देने लगी। इस तरह जिंदगी की गाड़ी किसी तरह चल रही थी। छोटी बेटी को ऑफिस में जो नाश्ता मिलता, वह घर लेकर आती। हम वही खाते थे। इस तरह से हमने किसी तरह दो साल बिताए।
इस दौरान पति की बात दिमाग में गूंजती- तुम्हें गाना बंद नहीं करना है। फिर धीरे-धीरे हिम्मत जुटानी शुरू की। छोटे-मोटे कार्यक्रम में गाने के लिए जाने लगी। जहां भी जाती, चाहे वह धार्मिक कार्यक्रम ही क्यों न हो। छठ का कार्यक्रम हो, लोग वहां गैंग्स ऑफ वासेपुर का वुमनिया गीत जरूर गवाते हैं। एक तरह से इस गीत ने मेरी जिंदगी बदल दी थी। कहूंगी आज भी इसी गीत से मेरे घर की रोजी-रोटी चल रही है।
इस तरह सालों बाद अब जाकर हालात थोड़े ठीक हुए हैं। इस समय मेरे पास संगीत सीखने के लिए काफी बच्चे आते हैं। हाल में इंस्टाग्राम पर एक पेज बनाया है। उस पर कुछ वीडियोज डालती हूं। उन्हीं पैसों से मेरा गुजारा चल रहा है। पति के जाने के बाद अपने लिए एक साड़ी तक नहीं खरीदी। मेरे शिष्य जो लाकर दे देते हैं, वही पहनती हूं।
वुमनिया गीत को बनाने वाली स्नेहा वालेकर भी मुझसे जुड़ी हैं। उस फिल्म की एकमात्र ऐसी इंसान हैं, जो आज भी मुझसे बात करती हैं और मेरा हाल-चाल लेती रहती हैं। जब उनका फोन आता है तो मेरे अंदर जैसे एक नई ऊर्जा आ जाती है। वह मुझे बहुत सम्मान देती हैं।
अब मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं। अब संगीत को पूरा वक्त दे सकती हूं। बस भगवान से यही चाहती हूं कि गाने के मौके मिलें। जिन दस वर्षों में संगीत को समय नहीं दे पाई, अब उसकी भरपाई करना चाहती हूं। चाहती हूं कि एक-एक पल संगीत को दूं।
आखिर में जिंदगी का सबसे बड़ा अफसोस यही है कि जिस पति के कहने पर मैंने संगीत सीखना शुरू किया, आज वही मेरी सफलता देखने के लिए जिंदा नहीं हैं। कहीं गाने जाती हूं और जब वहां मंच पर मुझे सम्मान मिलता है तो मन अंदर ही अंदर रोता है कि- काश यह सब देखने के लिए मेरे पति जिंदा होते।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सम्मान पाती हुईं रेखा झा।
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(रेखा झा ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।)
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