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पाकिस्तान को 12 हिस्सों में बांटने की तैयारी: मंत्री बोले- छोटे प्रांतों का बनना तय; बिलावल भुट्टो की पार्टी विरोध में

पाकिस्तान को 12 हिस्सों में बांटने की तैयारी:  मंत्री बोले- छोटे प्रांतों का बनना तय; बिलावल भुट्टो की पार्टी विरोध में


इस्लामाबाद11 मिनट पहले

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संचार मंत्री अब्दुल अलीम खान की पार्टी शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार का हिस्सा है।

पाकिस्तान के चारों प्रांतों को 12 हिस्सों में बांटने की तैयारी चल रही है। देश के संचार मंत्री अब्दुल अलीम खान ने कहा है कि देश में छोटे-छोटे प्रांत बनना अब तय है। उनका कहना है कि इससे शासन बेहतर होगा।

अब्दुल अलीम खान रविवार को शेखूपुरा में इस्तेहकाम-ए-पाकिस्तान पार्टी (IPP) के कार्यकर्ता सम्मेलन में शामिल हुए। इस दौरान उन्होंने कहा कि सिंध और पंजाब में तीन-तीन नए प्रांत बनाए जा सकते हैं। ऐसा ही विभाजन बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में भी हो सकता है।

अलीम खान ने कहा कि हमारे आस-पास के देशों में कई छोटे प्रांत हैं। इसलिए पाकिस्तान में भी ऐसा होना चाहिए। अलीम खान की पार्टी IPP पीएम शहबाज शरीफ की गठबंधन सरकार का हिस्सा है।

अब्दुल अलीम खान ने शेखूपुरा में रविवार को IPP के कार्यकर्ताओं को संबोधित किया।

अब्दुल अलीम खान ने शेखूपुरा में रविवार को IPP के कार्यकर्ताओं को संबोधित किया।

कौन-कौन से नए प्रांत बन सकते हैं?

पाकिस्तान सरकार की तरफ से अभी आधिकारिक नक्शा जारी नहीं किया गया है, लेकिन जिन इलाकों की चर्चा है, वे कुछ इस तरह हैं-

  • पंजाब: उत्तर पंजाब, मध्य पंजाब, दक्षिण पंजाब
  • सिंध: कराची सिंध, मध्य सिंध, ऊपरला सिंध
  • KP: उत्तरी KP, दक्षिणी KP, आदिवासी KP/फाटा रीजन
  • बलूचिस्तान: पूर्व बलूचिस्तान, पश्चिम बलूचिस्तान, दक्षिणी बलूचिस्तान

बिलावल की पार्टी बंटवारे के खिलाफ

शहबाज सरकार में शामिल बिलावल भुट्टो की पार्टी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) ने साफ कहा है कि सिंध को बांटने का किसी भी कीमत पर विरोध किया जाएगा।

PPP लंबे समय से खासकर सिंध के बंटवारे का विरोध करती रही है। पिछले महीने सिंध के मुख्यमंत्री मुराद अली शाह ने साफ चेतावनी दी थी कि सिंध के हितों के खिलाफ कोई कदम स्वीकार नहीं किया जाएगा।

CM मुराद ने कहा था कि नए प्रांतों की अफवाहों पर ध्यान न दें और कोई भी ताकत सिंध को नहीं बांट सकती।

नए प्रांतों की मांग पहले भी उठती रही है, लेकिन कभी मुकाम तक नहीं पहुंची। पाकिस्तान में 1947 के वक्त पांच प्रांत थे। इनमें पूर्वी बंगाल, पश्चिमी पंजाब, सिंध, नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस (NWFP) और बलूचिस्तान शामिल थे।

1971 में पूर्वी बंगाल अलग होकर आज का बांग्लादेश गया। बाद में NWFP का नाम बदलकर खैबर पख्तूनख्वा रखा गया। इस बार प्रस्ताव को कुछ थिंक-टैंक और मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट पाकिस्तान (MQM-P) जैसी पार्टियों ने भी समर्थन दिया है।

MQM-P ने तो कहा है कि वह 28वें संविधान संशोधन के जरिए नए प्रांतों की मांग आगे बढ़ाएगी। (फाइल फोटो)

MQM-P ने तो कहा है कि वह 28वें संविधान संशोधन के जरिए नए प्रांतों की मांग आगे बढ़ाएगी। (फाइल फोटो)

कई छोटी पार्टियां भी विरोध में

PPP के अलावा कई छोटे दल भी इस बंटवारे के विरोध में हैं। अवामी नेशनल पार्टी (ANP) और बलूच राष्ट्रवादी दलों ने इसे बांटो और राज करो की नीति बताया है।

इन लोगों का कहना है कि छोटे प्रांत बनाने से स्थानीय पहचान और संस्कृति कमजोर हो सकती है। बड़े प्रांतों की राजनीतिक ताकत टूट जाएगी। सेना और केंद्र सरकार की पकड़ और मजबूत हो जाएगी।

इसके अलावा बलूचिस्तान जैसे इलाकों में तनाव और भड़क सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह कदम देश की पहले से अस्थिर राजनीति को और उलझा सकता है।

नए प्रांत बनाने के लिए दो तिहाई बहुमत जरूरी

कई पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि पाकिस्तान के सत्ता ढांचे में पिछले कुछ सालों में सेना का प्रभाव बढ़ा है। ऐसे में प्रांतों को बांटने का फैसला प्रशासनिक सुधार से ज्यादा राजनीतिक कंट्रोल बढ़ाने की रणनीति भी हो सकती है।

नए प्रांत बनाने के लिए संविधान में संशोधन जरूरी है और उसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। अगर पाकिस्तान 12 प्रांतों में बंटता है, तो देश का प्रशासनिक ढांचा, राजनीति और संसाधन-बंटवारा पूरी तरह से बदल जाएगा।

एक्सपर्ट बोले- ज्यादा प्रांत मतलब ज्यादा दिक्कतें

पाकिस्तान के वरिष्ठ अफसर और पुलिस अधिकारी रहे सैयद अख्तर अली शाह का कहना है कि सिर्फ प्रांत बढ़ाने से समस्याएं हल नहीं होंगी।

उनका कहना है,

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पाकिस्तान की समस्या प्रांतों की संख्या नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था की खामियां हैं। अगर ये दुरुस्त नहीं हुईं, तो नए प्रांत बनाना हालात और बिगाड़ सकता है।

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अली शाह के मुताबिक कमजोर संस्थाएं, कानून का असमान लागू होना, जवाबदेही की कमी और स्थानीय सरकारों को अधिकार न देना देश की असली समस्याएं हैं।

थिंक टैंक PILDAT के प्रमुख अहमद बिलाल महबूब ने भी कहा कि पुराने अनुभव बताते हैं कि प्रशासनिक फेरबदल ने गिले-शिकवे बढ़ाए ही हैं।

उनके मुताबिक, नए प्रांत बनाना खर्चीला, राजनीतिक रूप से विवादित और जटिल कदम होगा। असली जरूरत है स्थानीय सरकारों को मजबूत करने की।

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