तारीख: 26 फरवरी 2020 जगह: दिल्ली का सुदामापुरी इलाका
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CAA यानी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ यहां भी प्रदर्शन चल रहा था। इसी बीच हिंसा भड़क गई। कुछ ही देर में अजीजिया मस्जिद के पास 30-40 लोगों की भीड़ जमा हो गई। सभी के हाथों में लाठी-डंडे थे। देखते ही देखते भीड़ ने मस्जिद समेत दुकानों, गाड़ियों और घरों में आग लगानी शुरू कर दी। हालात बेकाबू होने लगे।
मौके से ही किसी ने पुलिस (PCR) को फोन कर बताया कि मस्जिद में किसी ने आग लगा दी है। न्यू उस्मानपुर थाने से पुलिस की टीम मौके पर पहुंची। हालांकि उसे कोई गवाह नहीं मिला। न ही घटना को लेकर किसी ने शिकायत दर्ज कराई। उस समय ASI रहे करण सिंह ने 27 फरवरी को खुद इस मामले में शिकायत दर्ज की। इसके बाद 7 मार्च 2020 को 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया।
दिसंबर 2021 में चार्जशीट दाखिल हुई। इसके मुताबिक, केस में कई लोगों के बयान दर्ज हुए। लोगों ने हिंसा और उसमें हुए नुकसान की बात कही लेकिन गिरफ्तार आरोपियों में से किसी को नहीं पहचानना। सिर्फ हेड कॉन्स्टेबल विकास ने सभी 6 आरोपियों की पहचान की। कोर्ट में भी पुलिस आरोपियों के खिलाफ कोई खास सबूत नहीं दे पाई।
घटना के करीब साढ़े पांच साल बाद अभी 25 अगस्त को दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ झूठा मामला गढ़ा। दैनिक भास्कर ने इस मामले में बरी हुए ईशु गुप्ता, प्रेम प्रकाश और मनीष शर्मा से बात की। इन्होंने बताया कि कैसे एक झूठे केस ने इनकी जिंदगी बर्बाद कर दी। हमने वकीलों से भी समझने की कोशिश की कि इस घटना में पुलिस कैसे घिर गई।
सबसे पहले बरी हुए लोगों की बात… अरेस्ट होते बैंक की नौकरी छूटी, ब्लैकलिस्टेड होकर करियर बर्बाद हम दिल्ली के सुदामापुरी इलाके में पहुंचे। यहां रहने वाले 29 साल के ईशु गुप्ता दंगों में केस दर्ज होने से पहले एक प्राइवेट बैंक में काम करते थे। गिरफ्तारी के बाद उनकी नौकरी चली गई। अब वे ऋषिकेश के एक होटल में काम करते हैं। ईशु बताते हैं कि फरवरी 2020 में जब दंगे खत्म हो गए, उसके 10 दिन बाद पुलिस वाले उनके घर आए।
वे बताते हैं, ‘परिवार से पूछताछ के बाद छोटे भाई को पुलिस पकड़ ले गई। तब मैं ऑफिस में था। पता चला तो पुलिस के पास पहुंचा। भाई को पकड़ने की वजह पूछी तो बताया कि वे मुझे तलाश रहे थे क्योंकि उन्हें हिंसा में तोड़फोड़ के दौरान मेरी फोटो मिली है। मेरे लाख सफाई देने के बावजूद 7 मार्च 2020 को मुझे गिरफ्तार कर लिया।’
ईशु बताते हैं,
पुलिस ने मेरे खिलाफ एक ही तरह के 3 केस दर्ज कर दिए। मुझे चार दिन थाने में ही रखा। 11 मार्च को कोर्ट में पेश किया गया था। मैं इस मामले में करीब चार महीने जेल में रहा।

अपनी गिरफ्तारी के बारे में ईशु बताते हैं, ‘पुलिस ने कहा कि तुम दंगों में शामिल हो, तोड़फोड़ कर रहे थे। पुलिस बोल रही थी कि उन्हें मेरे अलावा 10 नाम और चाहिए। मेरे साथ मारपीट भी की गई। वो लगातार धमकी देते रहे कि हमारे खिलाफ ही सारे केस डाल देंगे, लेकिन पुलिस कोर्ट में एक सबूत नहीं पेश कर पाई। अगर उनके पास कुछ सबूत होता तो हम बरी नहीं होते। पुलिस को तो चार्जशीट फाइल करने में ही दो साल लग गए।’
केस की वजह से हुई परेशानी का जिक्र करते हुए ईशु कहते हैं, ‘जॉब तो छूट ही गई थी। मैं बैंकिंग सेक्टर में ब्लैकलिस्टेड हो गया। जेल से बाहर आने के बाद कहीं नौकरी नहीं मिली। उस वक्त लॉकडाउन भी था। इन पांच सालों में मेरे लाखों रुपए बर्बाद हो गए। तीनों केस में बेल कराने में ही डेढ़ से दो लाख खर्च हो गए। उसके बाद सुनवाई के लिए वकील का खर्च लग रहा था।’

ईशु के मुताबिक, उनके घर के आसपास जब हिंसा हुई थी, तो वो भी दूसरे लोगों की तरह वहां हुआ नुकसान देख रहे थे। जिसका हवाला देकर उन्हें झूठे केसों में फंसा दिया गया। एक केस में उन्हें कोर्ट ने पहले भी डिस्चार्ज कर दिया था। उसमें भी कोई सबूत नहीं मिला था। एक और केस में अंतिम सुनवाई चल रही है।
पुलिस बोली पूछताछ के बाद छोड़ देंगे, एक के बाद एक 4 केस कर दिए इसी केस में 31 साल के प्रेम प्रकाश भी बरी हुए हैं। ड्राइविंग का काम करने वाले प्रेम सुदामापुरी से सटे पंजाबी कॉलोनी में रहते हैं। परिवार में सिर्फ उनकी मां हैं। पिता 10 साल पहले लापता हो गए थे। प्रेम कहते हैं कि इस केस के कारण उनकी जिंदगी बर्बाद हो गई।
प्रेम के मुताबिक, 7 मार्च 2020 को पुलिस ने पूछताछ के लिए प्रेम को भी हिरासत में लिया था। पुलिस ने कहा था कि पूछताछ करने के बाद छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने एक के बाद एक केस दर्ज कर दिए। करीब 4 महीने जेल में रहना पड़ा।
प्रेम कहते हैं, ‘मैं नहीं जानता था कि मुझे क्यों और किस केस में बंद किया गया है। गिरफ्तारी के दौरान मुझे पुलिस ने कुछ नहीं बताया। जब जेल में बंद किया, तब पता चला कि मेरे खिलाफ 4 केस दर्ज किए गए है। गिरफ्तारी के दौरान पुलिस वालों ने मारपीट भी की थी।‘

वे आगे बताते हैं, ‘जेल से बाहर आने के बाद मैं ड्राइविंग का काम कर रहा था। पुलिस कभी भी घर आ जाती और घरवालों से मेरे बारे में पूछने लगती।‘
प्रेम अब तक दो केस में बरी हो चुके हैं। पहले मामले में भी पुलिस कोई सबूत नहीं पेश कर पाई थी। इस केस में भी पुलिस को प्रेम के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। वे कहते हैं, ‘बेल और कोर्ट की तारीख के चक्कर में मेरे 3 लाख रुपए से ज्यादा बर्बाद हो चुके हैं। घर में कमाने वाला सिर्फ मैं ही था। ऐसे में मेरे बिना मां बुरी तरह परेशान हुईं।’
7 मार्च 2020 को ईशु गुप्ता और प्रेम दोनों की गिरफ्तारी एक अलग FIR (89/2020) की वजह से हुई थी। 25 फरवरी को ये FIR भी अजीजिया मस्जिद के पास हिंसा को लेकर दर्ज हुई थी। इसमें भी किसी आरोपी का नाम नहीं लिखा था। पुलिस ने FIR में लिखा था कि जब वहां ASI पहुंचे तो कोई शिकायतकर्ता या चश्मदीद नहीं मिला।

दिल्ली के सुदामापुरी इलाके की इसी अजीजिया मस्जिद और इसके आस-पास आगजनी की घटनाएं और हिंसा हुई थी।
जब कहा दंगों के बारे में नहीं पता तो केस दर्ज किया हमने इसी केस में बरी हुए मनीष शर्मा से भी बात की। वे कहते हैं कि जब पुलिस वाले लोगों से पूछताछ करने आए थे, तब वे भी गली में ही खड़े थे। 9 मार्च 2020 को उन्हें भी हिरासत में ले लिया गया। वो करीब एक साल तक जेल में रहे।
अपनी गिरफ्तारी पर मनीष बताते हैं, ‘जिन लोगों के साथ मुझ पर केस दर्ज किया गया, उन्हें मैं जानता भी नहीं था। हिरासत के दौरान पुलिस मुझसे दंगों के बारे में जानकारी ले रही थे। मैंने पुलिस से कहा कि मुझे दंगों के बारे में कुछ नहीं पता तो मेरे खिलाफ केस दर्ज कर दिया। एक साल जेल में बिताने के बाद मैं घर लौट सका। मामले की सुनवाई में ना जा पाने की वजह से मुझे दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। मैं फिर करीब एक साल जेल में रहा।‘

अब कोर्ट का फैसला… झूठे आरोप गढ़ने को लेकर कोर्ट ने पुलिस को फटकारा 25 अगस्त को कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशन जज परवीन सिंह ने केस को लेकर पुलिस को फटकार लगाई। क्योंकि पुलिस की चार्जशीट में कई बयान विरोधाभासी थे।
दरअसल, जिस अजीजिया मस्जिद आगजनी केस में ईशु और मनीष बरी हुए हैं, उसमें उनकी गिरफ्तारी का समय 7 मार्च को सुबह 10:25 बजे और 10:40 बजे दिखाया गया था। जबकि पुलिस ने इन्हीं के खिलाफ इससे पहले FIR में बताया था उन्हें 7 मार्च को रात के 8 और 9 बजे गिरफ्तार किया गया। कोर्ट ने आरोपियों की गिरफ्तारी के समय पर सवाल उठाया कि ये कैसे संभव है।
कोर्ट ने ये भी कहा कि एकमात्र विटनेस हेड कॉन्स्टेबल विकास की गवाही विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि उनके बयानों से जाहिर होता है कि जांच अधिकारी के केस को सपोर्ट करने के लिए उन्होंने ऐसा किया।
जज ने आगे कहा, ‘पुलिस ने केस को सही साबित करने के लिए आरोपियों के खिलाफ झूठा आरोप गढ़ा है। जांच अधिकारी ने सबूत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए। इससे आरोपियों के अधिकारों का हनन हुआ। ये और भी दुखद है कि जांच में खामियों के बावजूद सुपरवाइजिंग अफसर जैसे SHO और ACP ने चार्जशीट को मैकेनिकल तरीके से आगे बढ़ा दिया।‘
कोर्ट ने ये भी कहा कि ऐसे मामलों से कानून और जांच प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है। कोर्ट ने इस फैसले की कॉपी दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजने की सिफारिश की है ताकि वे जांच प्रक्रिया में सुधार के उपाय कर सकें।

25 अगस्त 2025 को दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने अजीजिया मस्जिद आगजनी-तोड़फोड़ केस में सभी 6 आरोपियों को बरी कर दिया।
वकील बोले- पुलिस ने जानबूझकर गरीबों को टारगेट किया इस मामले में पीड़ित पक्ष के वकील प्रवीण यादव कहते हैं, ‘पुलिस को पता था कि ऐसे लोगों को टारगेट करो, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं या जिनके आगे-पीछे कोई नहीं।‘
‘ये सभी लोग किसी दूसरे मुकदमे में गिरफ्तार हुए थे। फिर गलत तरीके से इन्हें इस केस में भी आरोपी बना दिया गया। जिन 6 लोगों को गवाह बनाया गया था, उन्होंने भी कोर्ट में आरोपियों को पहचानने से इनकार कर दिया था। सिर्फ हेड कॉन्स्टेबल विकास ने उन्हें पहचानते हुए कहा था कि उन्होंने ड्य़ूटी के दौरान इन सभी को दंगा करते देखा था।‘
प्रवीण आगे कहते हैं कि उस वक्त माहौल ऐसा था कि पुलिस पर भी किसी को गिरफ्तार करने का दबाव था इसलिए ये गिरफ्तारियां हुईं। इसी चक्कर में लोग एक, दो या तीन साल तक जेल में बंद रहे।
वे कहते हैं, ‘दंगों के सारे केस में यही हो रहा है। पब्लिक विटनेस ना के बराबर मिलेंगे जिसमें किसी ने आरोपी की पहचान की हो। पुलिस वाले ही गवाह बन रहे हैं कि वे आरोपियों को पहचानते हैं। हो सकता है कि वे किसी को पहचानते भी हों, लेकिन एक कॉन्स्टेबल 20 लोगों को कैसे पहचान सकता है।‘

पुलिस ने बार-बार मनगढ़ंत कहानियां बनाईं इसी मामले में तीन लोगों का केस देख रहे वकील अशोक कुमार कहते हैं कि किसी भी आरोपी के वीडियो-फोटो नहीं थे, न ही किसी ने इसमें गवाही दी थी। जिन लोगों ने पुलिस को बयान दिए, उन्होंने अपने नुकसान के बारे में बताया था। उन्होंने किसी के खिलाफ शिकायत नहीं की थी
अशोक कहते हैं, ‘अगर ये लोग अपराधी होते तो पुलिस की कार्रवाई के वक्त भाग जाते, लेकिन ये सभी अपने घरों में मिले। पुलिस अगर सही से जांच करती तो इन लोगों के इतने साल बर्बाद नहीं होते।‘
पुलिस बार-बार यही काम कर रही है। इस मामले में भी पुलिस ने मनगढ़ंत कहानियां बनाईं। इन लोगों ने ट्रायल का सामना किया। इस तरह की कार्रवाई के कारण समाज में इनकी छवि खराब हुई।

हेड कॉन्स्टेबल ने आरोपियों के पहचाना, कोर्ट ने छोड़ दिया तो क्या करें केस के शिकायतकर्ता और शुरुआती जांच करने वाले अधिकारी करण सिंह (तत्कालीन ASI, न्यू उस्मानपुर थाना) थे। हमने कोर्ट के फैसले के आधार पर उनसे पूछा कि आरोपियों के खिलाफ इस तरह से केस क्यों दर्ज किए गए। जवाब में करण सिंह कहते हैं कि बाद में किसी और अधिकारी ने जांच की थी।
जब आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर हमने उनसे पूछा तो जवाब मिला, ‘हेड कॉन्स्टेबल ने आरोपियों को आइडेंटिफाई किया था और दंगा तो हुआ ही था। अब कोर्ट ने छोड़ दिया तो हम क्या कर सकते हैं।‘ करण सिंह ने इसके आगे बात करने से इनकार कर दिया।
इस मामले पर हमने उच्च अधिकारियों से भी बात करने की कोशिश की। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के DCP से हमने ईमेल के जरिए झूठे मामले और जांच अधिकारियों की गलती को लेकर सवाल पूछे हैं। साथ ही ये भी सवाल किया है कि क्या दिल्ली पुलिस इस मामले को ऊपरी अदालत में चुनौती देगी। जवाब आने पर हम इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में पहले भी उठ चुके हैं सवाल ये पहली बार नहीं है, जब 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में लोग इस तरह बरी हुए हैं। दिल्ली दंगों से जुड़े दूसरे मामलों में भी पुलिस की जांच पर सवाल उठ चुके हैं।
22 अगस्त, 2024 को दंगों से जुड़े मामले में एक मुस्लिम शख्स को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा था कि पुलिस ने उसके खिलाफ मनगढ़ंत बयान तैयार किए थे। ये मामला दिल्ली के दयालपुर इलाके में हिंसा से जुड़ा था। जज पुलस्त्य प्रमाचला ने कहा कि पुलिस ने सही तरीके से जांच किए बिना आरोपी जावेद के खिलाफ मैकेनिकल तरीके से चार्जशीट फाइल की थी।
इसी तरह दिल्ली दंगों से जुड़े मामले देख रहे जज विनोद यादव ने भी एक मामले में सही से जांच नहीं करने पर पुलिस के खिलाफ 25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। 2 सितंबर 2021 को उन्होंने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था, ‘मैं ये बात कहने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं कि इतिहास पीछे मुड़कर दिल्ली के सांप्रदायिक दंगों को देखेगा, तो जांच एजेंसी की नाकामी दिखेगी कि उसने सही तरीके से जांच नहीं की।’
उन्होंने ये भी कहा था कि जिस तरीके से मामले की जांच की गई, उससे साफ पता चलता है दिल्ली पुलिस ने कोर्ट की आंखों में धूल झोंकने की कोशिश की है।
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