दिवाली, एक ऐसा त्योहार जो दिलों को रोशनी से भर देता है, लेकिन कभी-कभी वही रोशनी किसी के अंदर के अंधेरे को और गहराई से दिखा देती है। कुछ ऐसा ही महसूस करते हैं पंजाब के सुपरस्टार गायक और बॉलीवुड एक्टर दिलजीत दोसांझ।
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जिनकी जिंदगी के हर रंग में आज भी बचपन की दिवाली की झलक बाकी है। दिलजीत बताते हैं कि कभी दिवाली उनका सबसे पसंदीदा त्योहार हुआ करता था। महीनों पहले से तैयारी शुरू हो जाती थी, घर सजता था, गांव जगमगाता था, और आसमान में रंग-बिरंगे पटाखों की चमक फैल जाती थी।
दिलजीत ने कहा- वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। जब मैं परिवार से अलग हुआ, तब से मैंने दिवाली मनाना छोड़ दिया। अंदर से उदासी सी छा गई। कभी पटाखों की आवाज उन्हें खुशी देती थी, आज वही आवाज उन्हें डराने लगी है।
अब पढ़ें दिलजीत दोसांझ ने दिवाली को लेकर क्या कहा
दिलजीत दोसांझ ने कहा- पहले मैं भी पटाखे चलाता था। मेरा सबसे पसंदीदा त्योहार दिवाली हुआ करता था। मगर फिर मैंने दिवाली मनाना छोड़ दिया, क्योंकि मैं परिवार से अलग हो गया था और मैं अंदर से उदास हो गया था। जिसके बाद से अब तक मैंने दिवाली मनाई नहीं। दिवाली पर पटाखे चलाने मुझे बहुत अच्छे लगते थे। एक एक माह पहले ही दिवाली की तैयारियां शुरू कर दी जाती थी।
दिलजीत ने कहा- जब हम लोग अपने गांव (जालंधर के गोराया में स्थित दोसांझ कलां) में होते थे तो हम गुरुद्वारा जाते थे, उसके बाद शिव महाराज मंदिर जाते थे, फिर गांव में एक दरगाह थी, वहां जाते थे। सभी जगह पर दिए जगाते थे। आखिरी में एक गुगा पीर की जगह होती थी, वहां पर दिए जलाने के लिए जाते थे। दिवाली मनाने का प्रोसेस हम लोग चार बजे शाम को ही शुरू कर देते थे।
दिलजीत ने कहा- दिए जलाने के बाद हम घर लौट तक पटाखे चलाया करते थे। जब हमारे पटाखे खत्म होते तो हम गांव के एनआरआई द्वारा चलाए जाते पटाखों को देखने के लिए जाते थे। हमारे मन में आस रहती थी कि क्या पता हमें भी दें, थोड़े पटाखे चलाने के लिए। दिवाली मेरा सबसे पसंदीदा त्योहार था, मगर अब पटाखों से मुझे डर लगता है।
