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अन्नपूर्णा मंदिर कोट किशन चंद में अन्नपूर्णा जयंती के पावन अवसर पर श्रीमद्भागवत महापुराण साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया गया है। यह भागवत कथा 28 नवम्बर से प्रारंभ हुई और 4 दिसम्बर को कथा को विराम दिया जाएगा।
कथा में पंडित पंकज शर्मा ने महाराजा ऋषभदेव, भरत, भक्त प्रह्लाद, अजामिल तथा भगवान कृष्ण अवतार आदि के कई महत्वपूर्ण प्रसंग सुनाए। महाराज जी ने भक्त शिरोमणि प्रह्लाद जी के पावन चरित्र का वर्णन किया।
इसके पश्चात महाराज जी ने राम जन्म से लेकर राम राज्याभिषेक तथा सम्पूर्ण भगवान कृष्ण अवतार की कथा सुनाई। कंस-वध का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि कंस ने पिता उग्रसेन, बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को बंदी बना लिया, क्योंकि विवाह के समय आकाशवाणी हुई थी कि देवकी की 8वीं संतान उसके मृत्यु का कारण बनेगी।
उसने 6 संतानों की हत्या कर दी। 7वीं संतान को योगमाया ने स्थानांतरित कर रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर दिया। 8वीं संतान श्रीकृष्ण हुए जो पहले चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए, फिर शिशु बनकर देवकी की गोद में आए। वसुदेव जी उन्हें यमुना पार नंद के घर छोड़ आए और नंद के घर जन्मी कन्या को कारागार में ले आए।
वह कन्या महामाया थी, जो कंस के हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और चेतावनी देकर अदृश्य हो गई। उधर, गोकुल में नंद बाबा के घर पुत्र जन्म का समाचार मिलते ही बधाइयां गाई जाने लगीं नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की। भक्त जन नृत्य और कीर्तन में मग्न हो उठे।
उन्होंने बताया कि जब प्रह्लाद जी की माता गर्भवती थीं, तब वे नारद जी के आश्रम में रहती थीं। नारद जी के सत्संग के प्रभाव से गर्भस्थ बालक में भगवान नारायण की भक्ति का बीज अंकुरित हो गया। जन्म के बाद प्रह्लाद जी बचपन से ही नारायण नाम का संकीर्तन करने लगे। हिरण्य कशिपु तपस्या करके लौटा तो उसे प्रह्लाद का आचरण अस्वीकार्य लगा।
उसने अनेक बार समझाया कि वह नारायण की भक्ति छोड़ दे, परंतु प्रह्लाद अडिग रहे। उसे पर्वत से गिराया गया, अग्नि में जलाया गया, परंतु भगवान की कृपा से उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। मारने वाला भगवान, बचाने वाला भगवान… बाल न बांका होता उसका जिसका रक्षक कृपा-निधान। अंत में भगवान ने नरसिंह अवतार लेकर हिरण्य कशिपु का वध किया और भक्त प्रह्लाद की रक्षा की।
