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पुणे23 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने शुक्रवार को कहा कि जजों का ट्रांफर न्यायपालिका का आंतरिक मामला है। इसमें सरकार या केंद्र की कोई भूमिका नहीं है।
उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ फैसले देने वाले जजों का तबादला करना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हस्तक्षेप है।
जस्टिस भुइयां ने पुणे के ILS लॉ कॉलेज में प्रिंसिपल जी.वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर के दौरान ये बाते कही।

जस्टिस भुइयां की स्पीच की तीन बड़ी बातें…
- जब कॉलेजियम के प्रस्ताव में ही यह दर्ज हो कि किसी जज का ट्रांसफर केंद्र सरकार के दोबारा विचार करने के कारण हुआ, तो यह कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
- केंद्र सरकार का हाई कोर्ट जजों के ट्रांसफर या पोस्टिंग में कोई दखल नहीं हो सकता। यह पूरी तरह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है और न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होना चाहिए। कॉलेजियम के फैसलों में कार्यपालिका के असर की यह खुली स्वीकृति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
- देश के संविधान निर्माताओं ने संसद की संप्रभुता के बजाय संविधान की सर्वोच्चता को चुना। भारत में संसद सर्वोच्च नहीं है, संविधान सर्वोच्च है।
सरकार के पुनर्विचार के बाद जस्टिस श्रीधरन का ट्रांसफर बदला गया
अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन का ट्रांसफर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से बदलकर इलाहाबाद हाई कोर्ट करने की सिफारिश की थी। कॉलेजियम के बयान में यह दर्ज था कि यह बदलाव केंद्र सरकार के पुनर्विचार अनुरोध के बाद किया गया।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में जस्टिस श्रीधरन सीनियरिटी के आधार पर कॉलेजियम का हिस्सा बनते, जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनकी सीनियरिटी काफी नीचे थी। यह फैसला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि जस्टिस श्रीधरन की पहचान एक स्वतंत्र जज के रूप में रही है, जिनमें BJP मंत्री विजय शाह के खिलाफ कर्नल सोफिया कुरैशी पर की गई टिप्पणी के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर FIR दर्ज करने का आदेश शामिल है।
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