असम विधानसभा चुनाव में झामुमो पहली बार चुनावी मैदान में उतरा। चुनाव परिणाम के आंकड़े बताते हैं कि पार्टी को भले ही सीटों के रूप में बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन वोट शेयर और कई सीटों पर स्थिति ने यह साफ कर दिया कि उसने जमीन तैयार कर ली है। बिना किसी गठबंधन के 17 सीटों पर चुनाव लड़ने उतरी पार्टी ने 16 सीटों पर अपने सिंबल पर और एक सीट पर समर्थित प्रत्याशी के जरिए चुनाव लड़ा। परिणामों में झामुमो दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही, जबकि 14 सीटों पर तीसरे स्थान पर और एक सीट पर चौथे स्थान पर रही। कुल मिलाकर पार्टी को 1.16 प्रतिशत वोट मिले। मझबात सीट से प्रीति रेखा बारला को 29,172 और गोसाईंगांव से फेड्रिकसन हांसदा को 21,417 वोट मिलना इस बात का संकेत है कि पार्टी ने पहली ही कोशिश में स्थानीय स्तर पर प्रभाव छोड़ने में सफलता हासिल की। सात सीटों पर 15 हजार से ज्यादा वोट झामुमो की रणनीति पूरी तरह असम के चाय बागान क्षेत्रों और वहां काम करने वाले आदिवासी, टी-ट्राइब, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों पर केंद्रित रही। पार्टी ने एसटी का दर्जा नहीं मिलने, कम मजदूरी और जमीन के अधिकार जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। यही कारण रहा कि सात सीटों पर पार्टी को 15 हजार से अधिक वोट मिले। तिगखोंग, मार्गेरिटा, दिगबोई, रंगापारा और मेरगांव जैसी सीटों पर पार्टी तीसरे स्थान पर रही। जिन 16 सीटों पर पार्टी ने उम्मीदवार उतारे, उनमें से सभी 16 सीटों पर भाजपा को जीत मिली, जबकि एक सीट बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट के खाते में गई। इसके बावजूद झामुमो का प्रदर्शन इस लिहाज से महत्वपूर्ण रहा कि उसने सीधे तौर पर कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाई और भविष्य की संभावनाओं के संकेत दिए। हेमंत-कल्पना के 10 दिन के कैंपेन ने बदली तस्वीर असम चुनाव में झामुमो की सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन खुद मैदान में उतरे। करीब 10 दिनों तक लगातार चुनाव प्रचार चलाया गया, जिसमें झारखंड के कई मंत्री और विधायक भी शामिल हुए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चुनाव परिणामों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सीमित समय और संसाधनों के बावजूद जो समर्थन मिला, वह पार्टी के लिए ऊर्जा का स्रोत है। उन्होंने इसे केवल राजनीतिक विस्तार नहीं, बल्कि आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक समाज के हक और सम्मान की लड़ाई बताया। हेमंत सोरेन ने स्पष्ट संकेत दिया कि आने वाले समय में पार्टी असम में अपने संगठन को और मजबूत करेगी। टी-ट्राइब समुदाय के अधिकारों की लड़ाई को तेज करेगी। पहली ही कोशिश में दो सीटों पर दूसरे स्थान और कई सीटों पर मजबूत वोट शेयर को पार्टी भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत मान रही है। इधर, बंगाल में कांग्रेस का ऑब्जर्वर मॉडल फेल जहां एक ओर झामुमो ने सीमित संसाधनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, वहीं कांग्रेस के लिए यह चुनाव आत्ममंथन का विषय बन गया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा नियुक्त 33 ऑब्जर्वर में झारखंड के 19 नेताओं को जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। केवल पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर ही ऐसे नेता रहे, जिनके जिम्मे वाले फरक्का और रानीनगर सीट पर पार्टी को सफलता मिली। बाकी ऑब्जर्वर अपने क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर सके। असम में भी झामुमो द्वारा कई सीटों पर हासिल किए गए वोटों ने कांग्रेस के लिए चुनौती खड़ी की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो जिस तरह क्षेत्रीय और सामाजिक मुद्दों के साथ आगे बढ़ रहा है, वह भविष्य में कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को और प्रभावित कर सकता है। ————————————– इसे भी पढ़ें… क्या झारखंड में टूटेगी JMM-कांग्रेस की दोस्ती:कांग्रेस ने समर्थन वापस लिया तो क्या गिरेगी हेमंत सरकार, भाजपा की वापसी की कितनी संभावनाएं सीन वन – बिहार विधानसभा चुनाव के समय से ही खटपट शुरू हो गई थी। इस चुनाव में JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) को सीट नहीं मिली। इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बताया। सीन टू – असम चुनाव में झामुमो ने कांग्रेस के आग्रह को अनसुना करते हुए 21 प्रत्याशियों को उतार दिया। सीन थ्री – जेएमएम ने कांग्रेस को विषैला सांप कहा। इसके बाद कांग्रेस ने सरकार पर हमला बोला ये तीन स्थितियां हैं, जो बता रही हैं कि झारखंड सरकार में शामिल JMM और कांग्रेस के बीच सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। पार्टियों की ओर से बयानबाजी बता रही है कि दोनों पार्टियों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। कांग्रेस जहां खनन माफिया, जिला प्रशासन और पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए अपनी ही सरकार को घेरे में ले रही है तो वहीं JMM कांग्रेस को विषैला सांप बता रही है। यहां पढ़ें पूरी खबर…
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