मानसून की दस्तक से पहले ही नगर निगम और बीकानेर विकास प्राधिकरण के जलभराव मुक्ति के दावों की हवा निकल गई है। शहर को डूबने से बचाने के लिए पिछले साल आनन-फानन में बनाए गए 14 ‘पाताल तोड़’ कुएं (7 निगम और 7 बीडीए) की ओर से बनाए गए थे। ज्यादातर पहली ही मूसलाधार बारिश का दबाव झेलने में नाकाम रहे। महज 13 एमएम बारिश ने निगम की तकनीक और मेंटेनेंस की पोल खोल दी है। निगम और बीडीए ने दावे किए थे कि ये कुएं उन पॉइंट्स पर बनाए गए हैं जहाँ सर्वाधिक पानी जमा होता है। तर्क था कि इससे जमीन का जलस्तर भी सुधरेगा और पानी की निकासी भी चंद मिनटों में हो जाएगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है। हालात यह हैं कि खुद निगम दफ्तर के अंदर बना कुआं हांफ रहा है। कचरा जमा होने से फिल्टर चोक हैं और यह अपनी क्षमता का 20 फीसदी पानी भी नहीं सोख पाया। वहीं, पवनपुरी में नागणेची जी मंदिर के पास तो कुएं के आसपास की जमीन धंस गई है, जिससे बड़ा हादसा हो सकता है। नगर निगम ने अपने 7 कुओं के रख-रखाव के लिए बाकायदा 3 साल का मेंटीनेंस कॉन्ट्रैक्ट दिया था। शर्त थी कि कुओं की नियमित सफाई होगी ताकि बारिश का पानी बिना रुकावट पाताल में जा सके। लेकिन हालिया बारिश में दिखा कीचड़ यह बताने के लिए काफी है कि कागजों पर तो सफाई हो रही है, लेकिन मौके पर कुएं मलबे से पटे पड़े हैं। तकनीकी जानकारों का कहना है कि बीकानेर की मिट्टी की संरचना और बारिश के पानी के साथ आने वाले भारी कचरे को देखते हुए इन कुओं के लिए मल्टी-लेयर फिल्टर की जरूरत है। लेकिन वर्तमान में कीचड़ और सिल्ट की वजह से फिल्टर की ऊपरी परत पूरी तरह बंद हो चुकी है। जब तक प्री-फिल्ट्रेशन का मजबूत ढांचा नहीं बनेगा ये कुएं शो-पीस ही बने रहेंगे। पुराने कुओं का रखरखाव नहीं, अब 14 नए कुओं की तैयारी! क्यों है पाताल तोड़ कुओं की मजबूरी?
बीकानेर शहर में ड्रेनेज (निकासी) का कोई मास्टर प्लान नहीं है। शहर की अधिकांश मुख्य सड़कों के किनारे न तो पक्के नाले हैं और न ही नालियां। ऐसे में बारिश का सारा पानी और सड़कों पर बिखरा कचरा सीधे सीवरेज लाइनों में चला जाता है। कचरा जाने से सीवरेज लाइनें जगह-जगह से चोक हो जाती हैं जिससे गंदा पानी सड़कों पर उबलने लगता है। चूंकि नया ड्रेनेज सिस्टम बिछाना बेहद महंगा और समय लेने वाला काम है इसलिए प्रशासन पाताल तोड़ कुओं को शॉर्टकट के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। विफलता के बीच 14 नए कुओं की फाइल तैयार
हैरानी की बात यह है कि पुराने 14 कुओं की विफलता का विश्लेषण करने और उनकी कमियां सुधारने के बजाय अब प्रशासन 14 और नए कुएं बनाने की तैयारी में है। इसकी फाइल चल पड़ी है और जल्द ही टेंडर प्रक्रिया शुरू हो सकती है। सवाल यह है कि जब पुराने कुएं ही पानी नहीं सोख पा रहे तो करोड़ों की लागत से बनने वाले ये नए कुएं शहर को राहत देंगे या बजट को पाताल में ले जाएंगे? 3 साल का ठेका…रखरखाव क्यों नहीं
जब 3 साल का मेंटेनेंस ठेका है, तो बारिश से पहले ‘डी-सिल्टिंग’ (सफाई) क्यों नहीं हुई?
पवनपुरी में कुएं के पास जमीन धंसी, इसका जिम्मेदार कौन है? क्या निर्माण सामग्री की जांच होगी?
क्या नए कुएं बनाने से पहले पुरानी तकनीक की खामियों को सुधारा जाएगा?
जनता के टैक्स का पैसा ‘पाताल’ में भेजने वाली इस विफलता पर जवाबदेही कब तय होगी? 3 साल का ठेका…रखरखाव क्यों नहीं
जब 3 साल का मेंटेनेंस ठेका है, तो बारिश से पहले ‘डी-सिल्टिंग’ (सफाई) क्यों नहीं हुई?
पवनपुरी में कुएं के पास जमीन धंसी, इसका जिम्मेदार कौन है? क्या निर्माण सामग्री की जांच होगी?
क्या नए कुएं बनाने से पहले पुरानी तकनीक की खामियों को सुधारा जाएगा?
जनता के टैक्स का पैसा ‘पाताल’ में भेजने वाली इस विफलता पर जवाबदेही कब तय होगी?
Source link
