इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अधिवक्ता द्वारा एक न्यायाधीश के विरुद्ध दाखिल आपराधिक अवमानना की अर्जी को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय एवं न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालत और वकील के बीच होने वाली तीखी बहस आपराधिक अवमानना की श्रेणी में नहीं आती। केस को किसी और पीठ में ट्रांसफर किया अधिवक्ता अरुण मिश्रा ने अर्जी में आरोप लगाया था कि 26 नवंबर 2025 को एक रिट याचिका की सुनवाई के दौरान उन्होंने संबंधित न्यायाधीश से केस को किसी अन्य कोर्ट में स्थानांतरित करने का अनुरोध किया था क्योंकि उन्हें उस पीठ पर विश्वास नहीं था। अरुण मिश्र के अनुसार इस पर न्यायाधीश ने उन्हें अपमानित किया, याचिका खारिज कर दी और बार कौंसिल को उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश कर दी। तीखी बहस का रिकॉड नहीं दिया हाईकोर्ट ने पाया कि याची ने अपने हलफनामे में उन विशिष्ट शब्दों या बयानों का उल्लेख नहीं किया है जो न्यायाधीश द्वारा कथित तौर पर उपयोग किए गए थे। कोर्ट ने कहा कि यदि न्यायाधीश और वकील के बीच कोई तीखी बहस हुई भी है, तो वह अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 2(सी) के तहत आपराधिक अवमानना नहीं मानी जा सकती।
ऐसी बहस न तो न्यायालय की गरिमा को कम करती है और न ही न्याय प्रशासन में बाधा डालती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी न्यायाधीश के गलत आदेश को अवमानना की कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता। ऐसे आदेशों को सक्षम उच्च या उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए। अरुण मिश्र ने संविधान के अनुच्छेद 134(ए) के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए प्रमाण पत्र मांगा तो कोर्ट ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस मामले में कानून का कोई ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल नहीं है जिसे उच्चतम न्यायालय द्वारा तय किया जाना आवश्यक हो।
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