कभी देशभर में फुलझड़ी के लिए मशहूर श्रीगंगानगर में अब ग्रीन बम बनाए जा रहे हैं। कोरोना काल के बाद मजदूरों की कमी ने फुलझड़ी उद्योग को ठप कर दिया, लेकिन अब यहां ग्रीन सूतली बम (एटम बम) बन रहे हैं। जो पूरे राजस्थान में सप्लाई हो रहे हैं।
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पुरानी आबादी, मिर्जेवाला और साहूवाला की फैक्ट्रियों में कारीगर व मजदूर मिलकर इन बम को हाथ से तैयार करते हैं। ग्रीन बम बनाने में मेहनत और काफी सावधानी बरती जाती है। यहां हर साल 10 करोड़ से रुपए से ज्यादा के पटाखे बनाए जा रहे हैं।
इन फैक्ट्री में इसका सांचा बनाने से लेकर इसमें बारूद भरने और फ्यूज लगाने तक का काम होता है। इन सभी काम के लिए अलग-अलग कमरे बने हुए हैं। जब ये बन जाते हैं तो इन्हें 24 घंटे सुखाया जाता है।
ग्रीन सूतली बम बनाने का काम पुरुषों के साथ महिलाएं भी करती हैं।
पहले बनती थीं फुलझड़ी पहले श्रीगंगानगर में फुलझड़ी बनाई जाती थीं। देश के कोने-कोने में यहां की फुलझड़ी पहुंचती थीं। लेकिन कोविड-19 के बाद बाहरी मजदूरों की कमी ने इस उद्योग को झटका दिया।
श्रीगंगानगर की पुरानी आबादी में पटाखा फैक्ट्री मालिक नसीम हुसैन (47) बताते हैं- पहले फुलझड़ी बनाने का काम ज्यादातर बाहरी मजदूर करते थे। उनके जाने के बाद यह काम बंद हो गया।
अब हम सिर्फ ग्रीन बम बनाते हैं, जो पर्यावरण के लिए कम हानिकारक हैं। नसीम पिछले 40 साल से पटाखे बनाते हैं। पहले फैक्ट्री में फुलझड़ियां बनती थी। अब ग्रीन बम का निर्माण होता है।

ग्रीन सूतली बम पारंपरिक भारतीय पटाखा नसीम ने बताया- ग्रीन सूतली बम, जिसे एटम बम भी कहा जाता है, एक पारंपरिक भारतीय पटाखा है। यह पूरी तरह हस्तनिर्मित है। इसमें पुरुषों के साथ महिलाएं भी काम करती हैं।

पटाखे बनाना बहुत सावधानी और बारीकी का काम पटाखा फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगरों ने बताया- पटाखे बनाना बहुत सावधानी और बारीकी का काम है। धागे बांधने से लेकर फ्यूज डालने तक पूरा काम बहुत सावधानी और बारीकी से किया जाता है। पूरा काम हाथों से होता है। इसमें किसी मशीन का इस्तेमाल नहीं होता।
पटाखा निर्माण जोखिम भरा काम फैक्ट्री ऑनर नसीम ने बताया- पटाखा निर्माण जोखिम भरा है। छोटी-सी चिंगारी से बड़ा हादसा हो सकता है। इसलिए अलग-अलग कमरों में काम होता है, ताकि एक धमाके से पूरी फैक्ट्री न उड़े।
धूम्रपान पर सख्त पाबंदी है और फायर एक्सटिंग्विशर (अग्निशामक यंत्र) हर जगह मौजूद हैं। फिर भी कई अवैध फैक्ट्रियों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी होती है।

ग्रीन सूतली बम बनाने का पूरा काम हाथों से किया जाता है। इस दौरान काफी सावधानी बरती जाती है।
ग्रीन बम कम प्रदूषण फैलाते हैं, लेकिन बारूद की धूल और केमिकल अब भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। एक बम की लागत 2 से 4 रुपए होती है। बाजार में यह 10 से 15 रुपए में बिकता है।

