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राबड़ी CM बनीं, 9वें दिन 34 भूमिहारों का कत्ल: मुख्यमंत्री बोलीं- ऊ लोग हमारा वोटर नहीं, क्यों जाएं वहां; आरोपी 77 लेकिन दोषी 0

राबड़ी CM बनीं, 9वें दिन 34 भूमिहारों का कत्ल:  मुख्यमंत्री बोलीं- ऊ लोग हमारा वोटर नहीं, क्यों जाएं वहां; आरोपी 77 लेकिन दोषी 0


37 मिनट पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

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दैनिक भास्कर की इलेक्शन सीरीज ‘नरसंहार’ के सातवें एपिसोड में आज कहानी सेनारी नरसंहार की…

ये कहानी है 18 मार्च 1999 की। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। बिहार में राबड़ी देवी को दूसरी बार मुख्यमंत्री बने 9 दिन ही हुए थे।

अरवल जिले में एक गांव है सेनारी। तब ये गांव जहानाबाद में पड़ता था। रात के 7.30 बजे थे। करीब 400-500 लोगों की भीड़ बंदूक और देसी हथियार लिए गांव की ओर तेजी से बढ़ रही थी। कुछ लोग पुलिस की वर्दी में थे और कुछ ने लुंगी बनियान पहन रखी थी।

गांव से करीब 2 किलोमीटर पहले सहरसा नाम की पुलिस चौकी थी। थाने में हल्की लाइट जल रही थी। 5-6 जवान इधर-उधर टहल रहे थी। भीड़ में शामिल लंबे कद काठी का एक आदमी बोला- ‘आधे लोग यहीं रुक जाओ। थाने को घेर लो।’ ये आदमी इस भीड़ का कमांडर था।

करीब 200 लोगों ने थाने को घेर लिया और बाकी गांव की तरफ चल दिए। कुछ ही देर में भीड़ सेनारी पहुंच गई। आधे लोग गांव के बाहर ही ठहर गए और आधे 20-30 लोगों का गुट बनाकर गांव में घुस गए।

एक घर के बाहर 5 लोग बैठकर बातें कर रहे थे। अचानक हथियारबंद लोगों को देखकर भागने लगे। पुलिस की वर्दी पहना एक अधेड़ बोला- ‘भागो मत, हम कुछ नहीं करेंगे। बस ठाकुरबाड़ी का रास्ता बता दो।’

20-25 साल का एक लड़का डरते हुए बोला- ‘चलो हम रास्ता दिखा देते हैं।’

अधेड़ बोला- ‘सब साथ चलो ना, वहां मिलकर भजन-कीर्तन करेंगे।’ डरे सहमे पांचों लोग इनके साथ चल दिए। कुछ ही देर में सभी ठाकुरबाड़ी पहुंच गए।

अब कमांडर बोला- ‘इनके हाथ बांध दो।’ इतना सुनते ही पांचों समझ गए कि वे फंस चुके हैं। बचाओ, बचाओ… चिल्लाने लगे। तभी 30 साल के एक लड़के ने बंदूक तान दी- ‘@#$%@# ज्यादा चिल्लाया तो तुम्हारी खोपड़ी में गोली मार देंगे।’ हमलावरों ने पांचों के हाथ बांधकर ठाकुरबाड़ी में बैठा दिया।

19 मार्च 1999, सेनारी गांव में कटी-फटी लाशों के पास बैठकर बिलखती महिलाएं। सोर्स : लाइब्रेरी

19 मार्च 1999, सेनारी गांव में कटी-फटी लाशों के पास बैठकर बिलखती महिलाएं। सोर्स : लाइब्रेरी

इधर, हमलावरों के दूसरे गुट ने एक घर को घेर रखा था। जोर-जोर से दरवाजा पीट रहे थे, पर कोई आवाज नहीं आ रही थी। 40-45 साल का एक हमलावर गुस्से में बोला- ‘टाइम खराब मत करो, डायनामाइट लगाकर उड़ा दो।’

उन लोगों ने वैसा ही किया। जोरदार धमाका हुआ। दरवाजा और दो तरफ से दीवार ढह गईं। हमलावर अंदर घुसे। 70 साल की एक महिला पलंग पर लेटी थी। पीछे 30-35 साल का उसका बेटा खड़ा था।

‘@#$%#$% दरवाजा क्यों नहीं खोल रहा था।’ ये कहते हुए हमलावर ने लड़के की छाती पर गड़ासा मार दिया। लड़का चीख उठा। हमलावर ने फिर से गड़ासा उठाया, तभी लड़के की मां उसके पैरों पर गिर पड़ी। बिलखते हुए बोली- ‘हमरा बचवा के छोड़ द।’

हमलावर ने महिला के सीने पर जोर से लात मारी। वो दूर जा गिरी। इसी बीच हमलावर ने लड़के की गर्दन पर कुल्हाड़ी मार दी। फिर उसे घसीटते हुए बाहर लेकर चले गए। महिला अंदर चीखती रह गई।

अब हमलावर दूसरे घर में घुसे। एक महिला खाना पका रही थी। पास ही लालटेन की रोशन में 15 साल का उसका बेटा पढ़ाई कर रहा था। हमलावर ने जोर से थप्पड़ मारा, लड़का तखत से नीचे गिर गया। मां उसे बचाने दौड़ी, तो दूसरे हमलावर ने उसका बाल पकड़कर अपनी तरफ खींच लिया। गालों पर जोर का थप्पड़ मारते हुए बोला- ‘@#$%^# तू तो पेट से है ना, दूसरा बच्चा पैदा कर लेना।’

महिला ने उसके हाथ में दांत से काट दिया। गुस्से में हाथ छुड़ाते हुए हमलावर ने उसके पेट पर कुल्हाड़ी मार दी। वो वहीं गिर पड़ी। हमलावर बोला- %$#@%$# लो अब तुम्हारा वंश ही नहीं रहेगा।’ फिर लड़के का हाथ बांधा और बाहर खींचते हुए ठाकुरबाड़ी की तरफ चल दिए।

अब कमांडर बोला- ‘अरे कोई थाने जाकर बता दो कि गांव में तैयारी हो गई है। वो लोग अपना काम शुरू कर दें।

10-12 आदमी भागते हुए थाने के पास पहुंचे। अपने आदमियों से कहा- ‘थाने पर हमला बोल दो। देखना कोई पुलिस वाला गांव नहीं पहुंचना चाहिए।’

सेनारी गांव के इसी ठाकुरबाड़ी के पास MCC वालों ने 34 भूमिहारों की हत्या की थी।

सेनारी गांव के इसी ठाकुरबाड़ी के पास MCC वालों ने 34 भूमिहारों की हत्या की थी।

इधर, गांव में ठाकुरबाड़ी के पास 40-45 लोग लाइन में खड़े थे। सबके हाथ-पैर बंधे थे। 300 से ज्यादा हमलावरों ने उन्हें घेर रखा था। ‘एमसीसी जिंदाबाद, रणवीर सेना मुर्दाबाद’ के नारे लग रहे थे। एक हट्टा-कट्टा हमलावर बोला- ‘एक-एक करके सबकी गर्दन काट दो। जल्दबाजी नहीं करना। आराम-आराम से मारना है। तड़पा तड़पाकर।’

लाइन में खड़े सब एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। 30 साल के एक शख्स ने तलवार उठाई और सबसे दाएं खड़े अधेड़ की गर्दन पर दे मारी। उसी लाइन में 25 साल का उसका बेटा भी था। पिता को देख वो चीख उठा। गाली देते हुए बोला- ‘$#@#$% पहले मुझे काटो, बूढ़े को मारकर मर्दानगी क्यों दिखा रहा।’

हमलावर बोला- ‘#@#$#@ घबराओ नहीं। तुम्हारी बारी भी आएगी। रणवीर सेना का साथ देने वालों को आसान मौत नहीं देंगे।’

हमलावर आगे बढ़ा और 15 साल के एक लड़के की गर्दन पर गड़ासा दे मारा। उसकी आधी गर्दन कट गई। वह वहीं गिर पड़ा। खून के छींटे अगल-बगल खड़े लोगों पर पड़े। लाइन में खड़ा 45-50 साल का एक शख्स दहाड़ मारकर चीखने लगा- ‘अरे मेरे बेटवा को काट दिया। मार दिया। इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था।’

‘चुप रह #$@^%$.’ इतना कहते हुए हमलावर दनादन गड़ासा चलाने लगा। गांव चीखों से दहल गया। बेटे के सामने बाप की हत्या, बाप के सामने बेटे का कत्ल… 10-12 लोगों की गर्दन काटने के बाद हमलावर थक गया। गड़ासा फेंकते हुए बोला- ‘तुम सब मुंह क्यों देख रहा। सब मिलकर #$%$$#$ को काटो ना।’

अब 15-20 हमलावर टूट पड़े। कोई गड़ासा तो कोई कुल्हाड़ी लेकर। गांव की महिलाएं ठाकुरबाड़ी की तरफ आना चाहती थीं, लेकिन हमलावर बार-बार उन्हें लाठी-डंडे से पीटकर भगा दे रहे थे।

हमलावरों ने कुछ महिलाओं के साथ बदसलूकी भी की। किसी के निजी अंग में बंदूक से वार किया तो किसी के स्तन पर। कुछ ने महिलाओं की इज्जत भी लूटी। रात 12 बजे तक हमलावर गांव में तांडव मचाते रहे। फिर ‘एमसीसी जिंदाबाद… एमसीसी जिंदाबाद, रणवीर सेना मुर्दाबाद’ का नारा लगाते हुए तेजी से निकल गए।

हर तरफ कटी-फटी लाशें बिखरी पड़ी थीं, लग रहा था कोई बूचड़खाना हो

19 मार्च 1999, सेनारी गांव में ठाकुरबाड़ी के बाहर पड़ी कटी-फटी लाशें। सोर्स : लाइब्रेरी

19 मार्च 1999, सेनारी गांव में ठाकुरबाड़ी के बाहर पड़ी कटी-फटी लाशें। सोर्स : लाइब्रेरी

रात के 12.15 बजे, जहानाबाद पुलिस मुख्यालय में फोन बजा- ‘साहब मैं करपी थाना प्रभारी बोल रहा हूं। सेनारी गांव में हमला हो गया। फोर्स भेजिए।’

फौरन जहानाबाद से पुलिस की कई टुकड़ियां सेनारी के लिए भेजी गईं। रास्ते में जगह-जगह डायनामाइट लगा रखे थे। रास्ते ब्लॉक कर रखे थे। तीन घंटे तक पुलिस और हमलावरों के बीच मुठभेड़ चलती रही। करीब 3 बजे करपी थाना प्रभारी जैसे-तैसे कुछ पुलिस वालों के साथ सेनारी पहुंचे।

ठाकुरबाड़ी के पास चीख-पुकार मची थी। थाना प्रभारी जमुना सिंह ने टॉर्च जलाया- हर तरफ लाशें ही लाशें दिख रही थीं। कंठ से रिसता खून का फौव्वारा, पेट से निकली आतें। लग रहा था जैसे कोई बूचड़खाना हो।

थाना प्रभारी सिहर गए। वो टॉर्च जलाते हुए लाशों के पास पहुंचे। 34 लोगों की कटी-फटी लाश मिलीं। आंखों और पेट में गोली मारी गई थी। 6 लोग लहूलुहान मिले। उनके शरीर में हरकतें हो रही थीं। थाना प्रभारी ने सिपाहियों से कहा- ‘जल्दी गाड़ी बुलाओ। इन्हें अस्पताल ले जाओ।’

पुलिस को लाशों के बीच कुछ पर्चे मिले। जिस पर लिखा था- ‘गरीब भूमिहार भाइयों…रणवीर सेना या जातपात के फेरे में न पड़ें, अमीरी गरीबी की लड़ाई में कूद पड़ें। लक्ष्मणपुर बाथे, शंकर बिगहा व नारायणपुर नरसंहार का ही परिणाम है सेनारी घटना। …एमसीसी जिंदाबाद।’

ये सेनारी नरसंहार था। 34 लोगों का कत्ल हुआ था। सभी के सभी भूमिहार थे। आरोप माओवादी संगठन एमसीसी यानी माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर पर लगा।

सेनारी नरसंहार के बाद MCC ने जगह-जगह बैनर पोस्टर लगाया था।

सेनारी नरसंहार के बाद MCC ने जगह-जगह बैनर पोस्टर लगाया था।

थाना प्रभारी जमुना सिंह ने पूछा- ‘किसी ने हत्यारों को देखा क्या?’

भीड़ में खड़ी एक महिला चिल्लाते हुए बोली- ‘मैंने अपनी आंखों से देखा है। मेरे पति-बेटे को मार दिया उन लोगों ने।’

थाना प्रभारी- ‘ नाम क्या है तुम्हारा? आंसू पोछते हुए महिला बोली- चिंतामणी।

क्या देखा पूरी बात बताओ…

बिलखते हुए चिंतामणी बोलने लगीं- ‘ रात के 8 बज रहे थे। छत पर बेटा लालटेन जलाकर पढ़ाई कर रहा था। मैं उसके पास ही बैठी थी। उसके पापा नीचे कमरे में चाय पी रहे थे। अचानक शोर सुनाई पड़ा। मैंने और बेटे ने छत से देखा- 20-25 लोग बगल के इंजीनियर साहब के घर के बाहर खड़े थे। दरवाजा खटखटा रहे थे। कोई दरवाजा नहीं खोल रहा था।

बेटे ने कहा- ‘उनके घर कोई पुरुष नहीं है।’ भीड़ में से एक आदमी ने मेरे बेटे को बुला लिया। हमें लगा कि वे लोग किसी का पता पूछ रहे हैं। वो लालटेन लेकर नीचे उतरने लगा। मैं भी उसके साथ नीचे आ गई। दरवाजा खोलकर हम बाहर निकले।

गांव के ही रामाशीष भुइयां, रामलखन भुइयां, साधु भुइयां, मुर्गी भुइयां सहित 15-20 लोग सामने खड़े थे। इनमें से ज्यादातर लोग मेरे गांव के ही थे। कुछ लोग लुंगी और बनियान पहने थे और कुछ लोग पुलिस की वर्दी में थे।

अचानक मुर्गी भुइयां ने बेटे का हाथ पकड़कर खींच लिया। वे उसे घसीटते हुए गांव के उत्तर दिशा में ठाकुरबाड़ी की तरफ ले जाने लगे। मैं चीखने लगी। तभी मुझे गोली चलने की आवाज सुनाई दी। दर्जनों लोग ‘एमसीसी जिंदाबाद, लालू यादव जिंदाबाद, रणवीर सेना जिंदाबाद का नारा लगाते हुए आ रहे थे।

19 मार्च 1999, अटल सरकार में मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस, यशवंत सिन्हा और नीतीश कुमार सेनारी गांव में पीड़ितों से मिलते हुए। सोर्स : लाइब्रेरी

19 मार्च 1999, अटल सरकार में मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस, यशवंत सिन्हा और नीतीश कुमार सेनारी गांव में पीड़ितों से मिलते हुए। सोर्स : लाइब्रेरी

मैं समझ गई नक्सली गांव में आ गए हैं। इसी बीच उन लोगों ने मेरे पति को भी पकड़ लिया। दोनों को घसीटते हुए ले जाने लगे। मैं भी उनके पीछे-पीछे चल दी। मैंने देखा कि ठाकुरबाड़ी के पास सैकड़ों लोग जमा हुए थे। उनके हाथों में कुल्हाड़ी, गड़ासा और हसिया थे। सब नारा लगा रहे थे।

उन लोगों ने पति और बेटे के हाथ-पैर बांध दिए। फिर लाइन में ले जाकर खड़ा कर दिया। इसी बीच एक आदमी ने पसुली से बेटे की गर्दन पर वार कर दिया। मैं उसे बचाने के लिए दौड़ी, तो उन लोगों ने धक्का दे दिया। मैं भूसे के ढेर पर जा गिरी। कुछ पल के लिए बेहोश सी हो गई। फिर सिर उठाकर देखा- एक अधेड़ ने पति की गर्दन पर जोर से गड़ासा मारा। वो चीख उठे। उसने फिर से गड़ासा मार दिया। वो वहीं गिर पड़े।’

थाना प्रभारी- ‘गड़ासा कौन मारा, पहचानते हो क्या?’

चिंतामणी- ‘हां… वो लोग टॉर्च जला रहे थे। दुखन राम था वो। मैंने चेहरा देख लिया था।’

और क्या देखा…

गहरी सांस लेते हुईं चिंतामणी बोलीं- ‘एमसीसी वाले गांव के मर्दों को घसीटते हुए ला रहे थे और गला काटते जा रहे थे। दुखन राम और रमेश यादव, ये दो लोग ही ज्यादातर लोगों का गला काट रहे थे।

इससे आगे देखने की मेरी हिम्मत नहीं हो सकी। मैं भागते हुए घर पहुंची। छाती पीट-पीटकर रोने लगी। दो-तीन घंटे बाद मुझे जोरदार धमाके सुनाई दिए। वे लोग नारा लगा रहे थे- एमसीसी जिंदाबाद। लाल सलाम जिंदाबाद। फिर उनकी आवाज बंद हो गई। मैं समझ गई कि वे लोग चले गए।’

अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में रणवीर सेना प्रमुख ने लालू को चुनौती देते हुए कहा था कि वे जल्द इसका बदला लेंगे।

अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में रणवीर सेना प्रमुख ने लालू को चुनौती देते हुए कहा था कि वे जल्द इसका बदला लेंगे।

अपने परिवार की 8 लाशें देखकर पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार को हार्ट अटैक

बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट श्रीकांत प्रत्यूष सुबह-सुबह सेनारी पहुंचे थे। वे याद करते हैं- ‘मैं गांव पहुंचा तो भीड़ जुटी थी। ठाकुरबाड़ी के बाहर अधकटी लाशें बिखरी पड़ी थीं। लोग गुस्से में थे। महिलाएं छाती पीट-पीटकर रो रही थीं। जब लाशों की फोटो खींचने लगा, तो दर्जनों लोग खुद के ऊपर कपड़े डालकर लाशों के बीच लेट गए।

एक बुजुर्ग ने गुस्से में कहा- ‘30-35 लाशों की फोटो मत लो। जितने लोग लेटे हैं सबकी फोटो खींचो। लोगों को पता तो चले कि यहां कितना बड़ा नरसंहार हुआ है।’ वे लोग बहुत गुस्से में थे। उन्हें समझाना या मना करना मुमकिन नहीं था। मैंने सबकी फोटो खींची। लोगों से बात की, फिर पटना आ गया। हालांकि मैंने 34 लोगों के नरसंहार की ही खबर प्रकाशित की।’

19 मार्च 1999 को सुबह करीब 10 बजे एसआई जमुना सिंह ने 38 लोगों के खिलाफ हत्या, अपहरण, आगजनी जैसी धाराओं में केस दर्ज किया।

पुलिस लाशें उठाना चाहती थी, लेकिन गांव वाले तैयार नहीं हुए। भीड़ ने पुलिस को घेर लिया। लोग एमसीसी और लालू यादव के खिलाफ नारा लगाने लगे। पुलिस से कहने लगे- ‘हमें राइफल चाहिए, राइफल। हम लोग खुद सुरक्षा करेंगे। कोई प्रशासन नहीं है यहां। प्रशासन मुर्दा है मुर्दा।’

19 मार्च को ही पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन रजिस्ट्रार पद्मनारायण सिंह सेनारी पहुंचे। यहां उनके परिवार के 8 लोग मारे गए थे। अपने परिवार वालों की लाशें देखकर उन्हें हार्ट अटैक आ गया। कुछ ही देर बाद उनकी मौत हो गई। गांव वाले और नाराज हो गए।

कुछ देर बाद अटल सरकार में मंत्री रहे जॉर्ज फर्नांडिस, यशवंत सिन्हा और नीतीश कुमार सेनारी पहुंचे। तीनों नेताओं ने गांव के लोगों को समझाया-बुझाया, तब जाकर वे लोग माने। शाम 4 बजे लाशों का पोस्टमॉर्टम शुरू हुआ। पुलिस ने मौके से खून के थक्के, खून से सनी मिट्टी, खून लगा फरसा और गड़ासा बरामद किया।

गांव वालों ने दावा किया कि 400-500 नक्सलियों ने उनके गांव पर हमला किया था।

गांव वालों ने दावा किया कि 400-500 नक्सलियों ने उनके गांव पर हमला किया था।

जब CM राबड़ी बोलीं- ‘वो लोग हमारे वोटर्स नहीं हैं, मैं क्यों जाऊं वहां’

जनवरी में शंकर बिगहा और फरवरी में नारायणपुर नरसंहार के बाद केंद्र सरकार ने राबड़ी सरकार बर्खास्त कर दी थी, लेकिन राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के चलते 8 मार्च को राष्ट्रपति शासन वापस ले लिया था। 9 मार्च को राबड़ी देवी फिर से सीएम बनीं और अब 9 दिन बाद ही सेनारी नरसंहार हो गया।

बीजेपी, समता पार्टी और जनता दल के नेता राबड़ी देवी का इस्तीफा मांग रहे थे। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा- ‘इस नरसंहार के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है। उसने एक ऐसे दल को सपोर्ट किया है, जो नरसंहारों के लिए जिम्मेदार है।’

सरकार में शामिल होने के बाद भी कांग्रेस का एक गुट आरजेडी का विरोध कर रहा था।

लेखक मृत्युंजय शर्मा अपनी किताब ब्रोकेन प्रॉमिसेज में लिखते हैं- ‘जब लोगों ने राबड़ी देवी को सेनारी जाने के लिए कहा तो उन्होंने जवाब दिया- ‘वो लोग हमारे वोटर्स नहीं हैं। मैं क्यों जाऊं वहां।’

राबड़ी के इस बयान पर खूब बवाल हुआ। जनता दल के नेता रामविलास पासवान ने सेनारी से लौटने के बाद कहा- ‘मुझे बहुत दुख है। मुख्यमंत्री राबड़ी देवी कहती हैं कि जो लोग वोट नहीं करते, उनके यहां क्यों जाना। उनका ये बयान शर्मनाक है। लोकतंत्र के खिलाफ है।’

20 मार्च 1999 को बिहार के राज्यपाल जस्टिस बीएम लाल सेनारी पहुंचे। उनसे गांव वालों ने बंदूक की मांग की। वापस पटना लौटने के बाद राज्यपाल ने आदेश जारी किया कि गांव वालों को बंदूक का लाइसेंस दिया जाएगा।

सेनारी नरसंहार में जख्मी हुए लोगों को प्रशासन ने गया के सरकारी अस्पताल के एक खास वार्ड में भर्ती कराया था। इसी वार्ड में एक महीना पहले हुए नारायणपुर नरसंहार के घायलों का इलाज किया जा रहा था। ये फैसला थोड़ा चौंकाने वाला था, क्योंकि नारायणपुर में रणवीर सेना ने नरसंहार किया था और सेनारी में एमसीसी ने।

उस समय के अखबारों के मुताबिक नारायणपुर के घायलों को जब पता चला कि सेनारी के लोग भी यहां आ रहे हैं, तो वे डर गए। अस्पताल में भगदड़ जैसी स्थिति बन गई।

नरसंहार के तीन महीने बाद यानी 16 जून 1999 को जहानाबाद पुलिस ने अपनी जांच रिपोर्ट जहानाबाद के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने भेजा। 27 अक्टूबर 1999 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल की गई। बाद में पुलिस ने दो और चार्जशीट दाखिल की। कुल 77 आरोपियों को ट्रायल के लिए भेजा गया। इनमें से 45 आरोपियों के खिलाफ सेशन कोर्ट में आरोप तय हुए।

22 मार्च 1999, अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी ने सेनारी नरसंहार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था।

22 मार्च 1999, अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स, जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी ने सेनारी नरसंहार के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था।

पत्रकार का माइक लेकर लालू बन गए रिपोर्टर, कहा- ‘बोलने आता ही नहीं है’

नरसंहार के कुछ महीने बाद लालू-राबड़ी जहानाबाद गए। दोनों ने कुल 6 रैलियां कीं। इस दौरान लालू ने एक पत्रकार के हाथ से माइक ले लिया। लालू ने रिपोर्टर के अंदाज में भीड़ से पूछा- बताओ कोई है डर है? ऐ कस के बोलिए कोई डर है? भीड़ से आवाज आई- जी ना, कोई डर नहीं है।

लालू ने पूछा- उग्रपंथी के खिलाफ हो? भीड़ बोली- हां। उन्होंने फिर पूछा- रणवीर सेना के खिलाफ हो। भीड़ बोली- हां। लालू ने पत्रकार को माइक देते हुए कहा- ‘बोलने आता ही नहीं है।’

सेनारी नरसंहार के सात महीने बाद अक्टूबर 1999 में लोकसभा चुनाव हुए। तब बिहार में कुल 54 सीटें थीं। बीजेपी ने इनमें से 23 सीटें जीत ली। जदयू को 18 सीटें मिलीं और आरजेडी को 7 सीटें। जबकि कांग्रेस 4 सीटों पर सिमट गई। इससे एक साल पहले 1998 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी को 17 सीटें मिली थीं। यानी 10 सीटें कम हो गईं।

फरवरी-मार्च 2020 में बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। कुल 324 सीटों में से आरजेडी को 124, बीजेपी को 67 और नीतीश की समता पार्टी को 34 और कांग्रेस को 23 सीटें मिलीं। किसी भी दल या गठबंधन के पास बहुमत नहीं था।

राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय ने एनडीए को सरकार बनाने के लिए बुला लिया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत नहीं होने के चलते 7 दिन के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा। आरजेडी ने कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाई। राबड़ी देवी तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं।

साल 2000, मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद खुशी जाहिर करते नीतीश कुमार। हालांकि सात दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। सोर्स : इंडिया टुडे

साल 2000, मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद खुशी जाहिर करते नीतीश कुमार। हालांकि सात दिन बाद ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। सोर्स : इंडिया टुडे

समय के साथ बिहार में राजद और कांग्रेस की पकड़ ढीली पड़ती गई। फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में कुल 243 सीटों में से आरजेडी को 75, नीतीश की जदयू को 55 और बीजेपी को 37 सीटें मिलीं। जबकि कांग्रेस 10 सीटों पर सिमट गई। सत्ता की चाबी नई नवेली रामविलास पासवान की लोजपा के हाथों में थी, जिसे 29 सीटें मिली थीं। पासवान ने किसी भी दल को समर्थन नहीं दिया।

बिहार में राष्ट्रपति शासन लग गया। अक्टूबर-नवंबर 2005 में फिर से चुनाव हुए। इस बार बीजेपी-जदयू गठबंधन ने 243 सीटों में से 143 सीटें जीत लीं। जबकि आरजेडी को 54 और कांग्रेस को 9 सीटें मिलीं। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। इसके बाद बिहार की सत्ता हमेशा नीतीश के ही इर्द-गिर्द रही।

सेनारी नरसंहार के 17 साल बाद यानी 27 अक्टूबर 2016 को जहानाबाद जिला अदालत ने 13 आरोपियों को दोषी करार दिया।

15 नवंबर 2016 को 10 आरोपियों को फांसी और 3 को उम्रकैद की सजा के साथ एक-एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया। तीन दिन बाद यानी 18 नवंबर को अदालत ने एक और आरोपी दुखन राम को भी फांसी की सजा सुना दी।

इसके बाद आरोपियों ने पटना हाईकोर्ट से गुहार लगाई। नरसंहार के करीब 22 साल बाद यानी 21 मई 2021 को पटना हाईकोर्ट ने सभी 14 आरोपियों को बरी कर दिया।

कोर्ट ने कहा- ‘पुलिस की शुरुआती जांच रिपोर्ट में गवाहों के बयान और बाद की रिपोर्ट में गवाहों के बयान बहुत हद तक बदले हुए थे। घटना रात में हुई थी। अंधेरे में आरोपियों की पहचान करना संदेह के घेरे में है। जिन लोगों के खिलाफ ट्रायल चला, उनका नाम शुरुआती रिपोर्ट में नहीं था। पुलिस ने आरोपियों को कोर्ट में पेश करने से पहले पहचान के लिए परेड भी नहीं कराई। ऐसे में यह तय कर पाना मुश्किल है कि इन्हीं लोगों ने हत्या की है।’

हाईकोर्ट के फैसले के बाद बिहार सरकार इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गई, लेकिन अब तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी है।

22 मई 2021 का दैनिक भास्कर अखबार।

22 मई 2021 का दैनिक भास्कर अखबार।

कल 8वें एपिसोड में पढ़िए बिहार के एक और बड़े नरसंहार की कहानी…

(यह सच्ची कहानी पुलिस चार्जशीट, कोर्ट जजमेंट, गांव वालों के बयान, अलग-अलग किताबें और इंटरनेशल रिपोर्ट्स पर आधारित है। क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करते हुए इसे कहानी के रूप में लिखा गया है।)

रेफरेंस :

  • Community Warriors: State, Peasants and Caste Armies in Bihar
  • Broken Promises Caste, Crime and Politics in Bihar
  • https://indiankanoon.org/doc/169568993/
  • https://eparlib.sansad.in/bitstream/123456789/712886/1/843.pdf

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