2 मिनट पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र
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राबड़ी देवी को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने 100 दिन भी नहीं हुए थे कि बिहार में एक और बड़ा नरसंहार हो गया। सालभर के भीतर ये 8वां नरसंहार था। सरकार घिर चुकी थी। BJP-JDU सीएम के इस्तीफे पर अड़े थे। कांग्रेस सरकार को घेर रही थी, लेकिन समर्थन वापस लेने को तैयार नहीं थी। दलील ये कि समर्थन वापस लिया, तो सांप्रदायिक ताकतें सत्ता हथिया लेंगी।
नरसंहार सीरीज के 8वें एपिसोड में आज कहानी मियांपुर नरसंहार की, जहां लाइन में खड़ा करके यादवों का कत्लेआम हुआ…
पटना से दक्षिण में करीब 90 किलोमीटर दूर औरंगाबाद जिले का मियांपुर गांव। तारीख 16 जून और 2000 का साल। वक्त रात के 9 बजे। गर्मी का मौसम था, ज्यादातर लोग घर से बाहर थे। कुछ लोग छतों पर टहल रहे थे। कई लोग अभी खेत से लौटे नहीं थे।
एक नहर किनारे 4-5 लड़के बैठकर बातें कर रहे थे। अचानक उन्हें 200-250 लोग दिखे। ‘रणवीर बाबा की जय, रणवीर बाबा की जय’ का नारा लगाते हुए भीड़ तेजी से गांव की तरफ बढ़ रही थी। हाथों में बंदूक, फरसा, तलवार और देसी हथियार।
भीड़ को अपनी तरफ आते देख लड़के भाग निकले। गांव में जाकर हल्ला कर दिए कि रणवीर सेना वाले आ गए हैं। लोग इधर-उधर भागने लगे। जिसको जहां जगह मिली छुप गया। इधर, हमलावरों ने गांव को घेर लिया। अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगे।
भीड़ में शामिल 45-50 साल का एक शख्स बोला- ‘पागल हो क्या सब। चुन चुनकर मारना है, समझते क्यों नहीं। तुम लोग तो सब गोली बर्बाद कर दोगे।’

17 जून 1999, मियांपुर नरसंहार में मारे गए लोगों की लाश। सोर्स : लाइब्रेरी
एक हमलावर 10-15 साथियों को लेकर एक घर में घुसा। टॉर्च जलाई, कहीं कोई नजर नहीं आया। अचानक उसे कुछ गिरने की आवाज सुनाई पड़ी। हमलावर फौरन उस तरफ दौड़े। 20-25 साल का एक लड़का अनाज रखने वाले मिट्टी के कोठिला के पीछे छिपा था। जोर-जोर से हांफ रहा था। हमलावरों को देखकर मानो उसके प्राण ही सूख गए।
एक हमलावर ने उसके सिर पर बंदूक की बट से जोर से वार किया। उसका सिर फट गया। खून बहने लगा।
‘@#$%#$% तू बच के कहां जाएगा… चल बाहर चल।’ गाली देते हुए हमलावर लड़के को घसीटते हुए बाहर ले गया। जोर का तमाचा जड़ते हुए पूछा- यहां यादवों के घर किस तरफ हैं?
कांपते हुए लड़का बोला- ‘काका हम नहीं जानते, हम तो दूसरे गांव के हैं।’
हमलावर ने धक्का देकर उसे गिरा दिया और उसकी छाती पर चढ़कर बैठ गया। गर्दन में बंदूक की नोक सटा दी। बोला- ‘सच-सच बता गांव में यादवों के घर किस तरफ हैं?’
लड़के ने हाथ से इशारा कर दिया…
हमलावर नारा लगाते हुए उस तरफ चल पड़े। 10-15 का गुट बनाकर यादवों की बस्तियों में धावा बोल दिया। महिला, पुरुष, बच्चे… जो मिला सबको जबरन उठा लिए। जिसने भागने की कोशिश की, उसे बंदूक की बट से मारकर गिरा दिया, लेकिन किसी को गोली नहीं मारी। एक घंटे के भीतर कुल 60-65 लोगों को दबोच लिया।
अब हमलावरों का कमांडर बोला- ‘सबके हाथ-पैर बांधकर लाइन में खड़ा कर दो। इन ह$#@#$ ने जैसे सेनारी में हमारे लोगों को मारा था, वैसे ही मारना है। बाप के सामने बेटे को और बेटे के सामने बाप को। इनकी औरतों-बच्चों को भी नहीं छोड़ना है।’

नब्बे के दशक में हमलावरों की वेश-भूषा कुछ ऐसी होती थी। सोर्स : लाइब्रेरी
हमलावरों ने जाति पूछ-पूछकर लाशें बिछा दीं…
हमलावरों ने हाथ-पैर बांधकर सबको लाइन में खड़ा कर दिया। मूछें ऐंठते हुए कमांडर ने तलवार उठाई। लाइन में सबसे पहले खड़ी एक महिला से पूछा- ‘का नाम है तुम्हारा?’
वो कांपते हुए बोली- ‘दुलारी देवी।’
कमांडर ने चीखते हुए पूछा- जात बताओ, कौन जात हो… लड़खड़ाती जुबान में महिला बोली- हम यादव हैं।
मजा आ गया… कहते हुए कमांडर आगे बढ़ा। लाइन में खड़े हर शख्स से जाति पूछी। 40 साल का एक आदमी बोला- ‘भैया हम दलित हैं। यादव नहीं। छोड़ दो हमको।’
कमांडर जोर-जोर से हंसने लगा। फिर अचानक उसकी गर्दन पर तलवार मार दी। वह चीख उठा। @#$@## तू दलित है तो का हो गया… यह कहते हुए कमांडर ने फिर से तलवार मार दी। उसकी गर्दन कटकर लटक गई।
वह आगे बढ़ा और सबसे जाति पूछते गया। जिन-जिन लोगों ने यादव बताया, उन्हें लाइन में खड़ा रखा। यह देखकर कुछ दलितों ने भी अपनी जाति यादव बता दी। उन्हें लगा रणवीर सेना वाले दलितों को तो नहीं छोड़ेंगे।
अब हमलावरों ने यादव छोड़कर बाकी जाति के लोगों को बंदूक की बट से मारकर भगा दिया। कमांडर अपने आदमियों से बोला- ‘बंदूक उठाओ और सबको खत्म कर दो।’
10-12 हमलावरों ने बंदूक उठाई और अंधाधुंध गोलियां बरसाने लगें। चीख-पुकार से गांव दहल गया। किसी के सामने बेटा मरा तो किसी के सामने बाप। कुछ ही मिनटों में दर्जनों लाशें बिछ गईं। हमलावरों ने महिलाओं की गोद से बच्चों को छीनकर भी मार डाला।
फिर नजदीक जाकर एक-एक लाश को टटोला। जिस लाश में हरकत दिखी, फिर से गोली मार दी। तलवार से काट दिया। अब रात के करीब 11 बज चुके थे। हमलावर ‘रणवीर सेना की जय, रणवीर बाबा की जय, सेनारी का बदला ले लिया, अफसढ का बदला ले लिया’… नारा लगाते हुए गांव के पूरब की तरफ निकल गए।
रात करीब 2 बजे औरंगाबाद पुलिस मियांपुर पहुंची। गांव में सन्नाटा पसरा था। ज्यादातर लोग अपने घरों में बंद थे। कुछ लोग लाशों के पास खड़े थे। महिलाएं छाती पीट-पीटकर चीख रही थीं।
पुलिस ने टॉर्च जलाई- खून से सनी लाशें बिखरी पड़ी थीं। महिला, पुरुष और बच्चों की। एक-एक करके लाशें गिनी गई। कुल 34 लोगों का नरसंहार हुआ था। 26 यादव, 6 दलित और 2 दूसरी जातियों से थे। इनमें 13 महिलाएं और 9 बच्चे शामिल थे। 15 लोग जिंदा बच गए थे। उन्हें फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया।
ये मियांपुर नरसंहार था। हत्या का आरोप लगा अगड़ी जातियों के प्रतिबंधित संगठन रणवीर सेना पर…कहा गया कि ये अफसढ़ नरसंहार का बदला है।

17 जून 2000, मियांपुर नरसंहार में अपने परिवार के लोगों की हत्या के बाद बिलखती महिलाएं। सोर्स : लाइब्रेरी
अगले दिन यानी 17 जून, सुबह करीब 7 बजे का वक्त। इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर पूर्ण चंद्र ने पूछा- ‘हत्या करने वाले कौन थे, किसी ने देखा क्या?’
भीड़ से निकलकर एक अधेड़ बोला- ‘साहब मैंने देखा है। सबकुछ अपनी आंखों से देखा है।’
क्या नाम है तुम्हारा?
रुआंसे आवाज में अधेड़ बोला- ‘राजाराम यादव।’
क्या देखा, पूरी बात बताओ?
राजाराम कहने लगा- ‘साहब कल शाम 7.30 बजे की बात है। मैं कुछ साथियों के साथ गांव के पूरब में नहर किनारे बैठा था। अचानक सहरसा थाने की पुलिस और चौकीदार नहर के पास आए। हमसे पूछा कि क्या कर रहे हो, हमने बताया गांव की रखवाली कर रहे हैं। क्योंकि हमें हमले का अंदेशा था। पुलिस को भी बताया था।
15-20 मिनट बाद 400-500 लोग उत्तर-पूरब की तरफ से गांव में घुसे। उन्हें देखते ही हमें कुछ अजीब सा लगा। हमने परिचय पूछ लिया। इस पर उन लोगों ने गोली चलानी शुरू कर दी। हम लोग अपने घरों की तरफ भाग गए। मैं छत पर चला गया। तभी गांव में सिटी बजने की आवाज आने लगी। कुछ ही देर में हर तरफ धांय…धांय गूंजने लगा।’
भीड़ बढ़ती देख प्रशासन जल्द से जल्द शवों का अंतिम संस्कार कराना चाहता था, लेकिन गांव वाले जिद पर अड़े गए कि मुख्यमंत्री के आने के बाद ही वे लाश उठाने देंगे। इसके बाद उसी दिन सुबह पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव और शिवानंद तिवारी मियांपुर पहुंच गए। पर गांव वाले सीएम को बुलाने पर अड़े रहे। गांव वालों लालू का विरोध करना शुरू कर दिया। नारे लगाने लगे।
आखिरकार दोपहर में सरकारी हेलिकॉप्टर से मुख्यमंत्री राबड़ी देवी वहां पहुंची। उन्होंने मृतकों के हर परिवार को 1.10 लाख रुपए देने का ऐलान किया। इसके बाद गांव वाले अंतिम संस्कार के लिए तैयार हुए।
अगले दिन सरकार ने सहरसा पुलिस चौकी के अधिकारियों, गोह थाना प्रभारी, दाऊदनगर प्रभारी को सस्पेंड कर दिया। गुमला के एसपी संजय लाटेकर को औरंगाबाद का नया SP बनाया गया। SP एमपी राव को दो हफ्ते पहले ही औरंगाबाद भेजा गया था, लेकिन पैर में चोट लगने की वजह से अभी तक वे चार्ज नहीं ले सके थे। इसी दिन लालू ने बताया कि नरसंहार से जुड़े 11 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

18 जून 2000, पटना में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री राबड़ी देवी। साथ में हैं राज्यपाल विनोद चंद्र पांडे। सोर्स : लाइब्रेरी
राबड़ी सरकार पर इतना ज्यादा दबाव बढ़ चुका था कि सरकार हर हाल में रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया को पकड़ना चाहती थी। मुखिया के सिर पर 5 लाख का इनाम भी रखा था। पर वो सरकार के हाथ लग नहीं रहे थे। ऊपर से अखबारों में इंटरव्यू देकर सरकार को चुनौती दे रहे थे। इससे लालू-राबड़ी की काफी किरकिरी हो रही थी।
कुमार नरेंद्र अपनी किताब बिहार में निजी सेनाओं का उद्भव और विकास में लिखते हैं- ‘मियांपुर नरसंहार के बाद लालू रणवीर सेना के एक कार्यकर्ता के जरिए ब्रह्मेश्वर मुखिया को गिरफ्तार करवाना चाहते थे। लेकिन वो कार्यकर्ता तैयार नहीं हुआ। लालू ने 10 लाख रुपए की पेशकश की थी। इस कार्यकर्ता ने बताया कि लालू ने बड़हरा के विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह के जरिए उससे संपर्क किया था।’
मियांपुर नरसंहार को सेनारी और अफसढ़ नरसंहार का बदला कहा गया। 18 मार्च 1999 को जहानाबाद जिले के सेनारी गांव में 34 भूमिहारों का गला काटा गया था। नरसंहार का आरोप माओवादी संगठन एमसीसी पर लगा था। आरोपियों में ज्यादातर दलित और यादव थे। सेनारी नरसंहार की पूरी कहानी पिछले एपिसोड में हम बता चुके हैं।
अफसढ़ में क्या हुआ था, क्योंकि मियांपुर नरसंहार के बाद हमलावर इसका जिक्र कर रहे थे…
दरअसल, इस कहानी की शुरुआत होती है एक सियासी लड़ाई से। नवादा में उन दिनों दो गैंग का दबदबा था- अशोक महतो गैंग और अखिलेश सिंह गैंग। अशोक कुर्मी समुदाय से था और अखिलेश सिंह भूमिहार।
बात 2000 विधानसभा चुनाव की है। नवादा की वारिसलीगंज सीट से अखिलेश सिंह की पत्नी अरुणा देवी निर्दलीय मैदान में उतरीं। राजद की तरफ से मणिलाल प्रसाद चुनाव में उतरे।
मणिलाल को चुनाव जिताने के लिए यादवों ने खूब जोर लगाया, पर चुनाव जीत गईं अरुणा देवी। पत्नी की मदद करने के साथ-साथ अखिलेश सिंह ने नवादा जिले के दूसरे उम्मीदवारों को भी जिताने के लिए जी तोड़ मेहनत की थी।
इस चुनाव के नतीजों कुछ ही महीने बाद अखिलेश के गुट पर हमला हुआ। आरोप लगा यादवों पर। इसके बाद 3 जून 2000 को राजोबिगहा ब्लॉक में 5 यादवों की हत्या हो गई। कुछ दिनों बाद 3 कुर्मी भी मार दिए गए। आरोप लगा अखिलेश सिंह पर।

19 जून 2000, मियांपुर नरसंहार को लेकर पटना में शांति मार्च निकालते हुए नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस। (दाएं से बाएं) सोर्स : लाइब्रेरी
बात 11 जून 2000 की है। नवादा जिले में एक गांव है अफसढ। ये गांव गैंगस्टर अखिलेश सिंह का गांव है। यहां भूमिहारों का अच्छा-खासा दबदबा था।
रात के करीब 10 बज रहे थे। 50-60 आदमी अचानक गांव में घुसे। उनके हाथों में बंदूक, तलवार और देसी हथियार थे। हमलावरों ने गांव में इधर-उधर घूमकर रेकी की। गांव के कुछ लोग भी उनके साथ थे। फिर उन लोगों ने एक मकान को टारगेट किया।
हमलावरों में से एक आदमी छत पर चढ़ गया। इधर-उधर नजर दौड़ाई। देखा एक दर्जन से ज्यादा लोग गहरी नींद में सो रहे थे। वह दबे पांव नीचे उतरा और अपने कमांडर से बोला- ‘काका… काम बन गया। 15-20 लोग सो रहा है। चलो काम तमाम कर देते हैं।’
फौरन 15-20 हमलावर छत पर चढ़ गए। एक दूसरे को टॉर्च जलाकर इशारा किया और गोलियां बरसाने लगे। कुछ लोग गोली लगते ही मर गए। कुछ लोगों को गोली हाथ-पैर में लगी।
वे भागना चाह रहे थे, तभी हमलावरों ने उनकी गर्दन पर तलवार मार दी। दो बच्चे तो जान बचाने के लिए छत से कूद गए। करीब 10 मिनट तक हमलावर तांडव मचाते रहे। फिर नीचे उतरे और एमसीसी जिंदाबाद, एमसीसी जिंदाबाद’ नारा लगाते हुए गांव से निकल गए।
11 लोग मौके पर ही मारे गए। इनमें दो बच्चे भी थे। एक की उम्र महज 4 साल थी और दूसरे की उम्र 10 साल। 4 लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे। उन्हें फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन कुछ ही दिनों में उनमें से एक की मौत हो गई। इस तरह अफसढ नरसंहार में 12 लोग मारे गए। सभी लोग भूमिहार थे। इसमें गैंगस्टर अखिलेश सिंह का छोटा भाई भी मारा गया।
रात में ही इस नरसंहार की खबर आग की तरफ फैल गई। आसपास के गांवों के भूमिहारों ने नवादा शहर में बवाल कर दिया। गाड़ियों में आग लगाने लगे। दुकानों में आग लगाने लगे। पूरा शहर जलने लगा। सुबह होते होते नाराज भीड़ ने पास के एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन में आग लगा दी। उसकी कई बोगियां जल गईं।

23 जून 2000, मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और पूर्व सीएम लालू यादव। मानसून सत्र के लिए दोनों विधानसभा जाते हुए। सोर्स : लाइब्रेरी
सुबह तक पूरा गांव छावनी में बदल चुका था। हर तरफ पुलिस तैनात थी। एक समूह बेहद गुस्से में था। पुलिस लगातार उन्हें समझाने की कोशिश करती रही, पर गांव वालों ने दिनभर लाश किसी को छूने नहीं दी। 12 लाशें जेठ की दोपहरी में भी धूप में पड़ी रहीं। वे लोग बार-बार बदला लेने का नारा लगा रहे थे। पुरुषों के साथ महिलाएं भी उग्र हो गई थीं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्यपाल विनोद चंद्र पांडे ने गांव के लोगों को समझाया। तब जाकर देर शाम अंतिम संस्कार हो पाया।
इस नरसंहार के पीछे अशोक महतो गैंग का हाथ माना गया। अशोक महतो, राबड़ी सरकार में मंत्री और नवादा से निर्दलीय विधायक का खास आदमी था। जिन 12 भूमिहारों का कत्ल हुआ, उनमें से ज्यादातर गैंगस्टर अखिलेश सिंह के रिश्तेदार थे। इस नरसंहार में अखिलेश का भाई राजो सिंह भी मारा गया था।
नरसंहार के बाद अखिलेश की मां ने मीडिया वालों से बताया था- ‘एक दिन पहले कुछ आदमी पुलिस की वर्दी में आए थे। वे लोग अखिलेश के रिश्तेदारों के बारे में पूछ रहे थे। मैंने सबके बारे में बता दिया। मुझे नहीं पता था कि ऐसा कुछ होने वाला है।’
विपक्ष लगातार राबड़ी देवी पर इस्तीफे का दबाव बना रहा था। BJP और जनता दल के नेता मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को अफसढ जाने की मांग कर रहे थे। हालांकि, मुख्यमंत्री नरसंहार के बाद अफसढ नहीं गईं। विपक्ष ने सवाल भी उठाया कि मरने वाले भूमिहार हैं, इसलिए राबड़ी वहां नहीं जा रहीं।
इससे पहले मार्च 1999 के सेनारी में 34 भूमिहारों की हत्या हुई थी, वहां भी राबड़ी देवी नहीं गई थीं। तब उन्होंने कहा था- ‘ऊ लोग हमारा वोटर नहीं हैं, हम क्यों जाएं वहां।’ तब इस बयान पर जमकर सियासत हुई थी। रामविलास पासवान ने राबड़ी के बयान को शर्मनाक बताया था।

ये सेनारी नरसंहार में मारे गए लोगों की लाशें हैं। रणवीर सेना ने मियांपुर में इसी का बदला लिया था। सोर्स : लाइब्रेरी
अफसढ़ नरसंहार के बाद भूमिहार बदला लेने का मन बना चुके थे और 5 दिन बाद ही मियांपुर में नरसंहार हो गया। सवाल उठता है कि अफसढ़ नरसंहार के पीछे तो महतो गैंग यानी कुर्मियों का हाथ था, तो उनके निशाने पर यादव क्यों आए और वो भी नवादा के बजाय औरंगाबाद के…
सीनियर जर्नलिस्ट सुरूर अहमद एक आर्टिकल में लिखते हैं- ‘रणवीर सेना अफसढ़ नरसंहार का बदला यादवों की हत्या करके लेना चाहती थी। इसकी सियासी वजह थी। दरअसल, मध्य बिहार में कुर्मी और भूमिहार समता पार्टी (जो बाद में जदयू बन गई) के बैकबोन थे। अगर रणवीर सेना कुर्मियों को टारगेट करती तो ये कॉम्बिनेशन बिगड़ जाता।
इसलिए रणवीर सेना ने कुर्मियों के बजाय यादवों को निशाना बनाया। उन्होंने मियांपुर नरसंहार के जरिए भूमिहारों को मैसेज दिया कि तुम्हारी लड़ाई कुर्मियों से नहीं, यादवों से है।’
इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही कि मार्च 1999 में माओवादियों ने सेनारी में 34 भूमिहारों को चुन-चुनकर मारा था। रणवीर सेना का मानना था कि हत्या में यादवों का हाथ था। इसलिए भी उनके निशाने पर यादव थे।
13 साल बाद हाईकोर्ट का फैसला, 10 में से 9 आरोपी बरी
औरंगाबाद पुलिस ने पहले 4 सितंबर 2000 और फिर 11 अप्रैल 2002 को दो फेज में चार्जशीट दाखिल की। ट्रायल के दौरान 69 लोगों ने गवाही दी। 20 दिसंबर 2007 को औरंगाबाद सिविल कोर्ट में ने मियांपुर नरसंहार मामले में 10 आरोपियों को उम्रकैद की सजा के साथ ही पांच-पांच हजार रुपए जुर्माना लगाया। जुर्माना नहीं देने पर तीन साल की अतिरिक्त सजा सुनायी गई थी।
इसके बाद आरोपी पटना हाईकोर्ट पहुंच गए। जुलाई 2013 में हाईकोर्ट ने सबूतों की कमी के चलते 10 में से 9 को बरी कर दिया।

मियांपुर नरसंहार के विरोध में पटना में विरोध प्रदर्शन करते हुए CPI-ML के कार्यकर्ता। सोर्स : लाइब्रेरी
जहां नरसंंहार हुआ, वहां 5 साल में NDA, 5 सीट से 12 पर पहुंची, RJD-कांग्रेस 17 से 9 पर सिमटे
बिहार में ज्यादातर नरसंहार मगध इलाके में हुए। यहां कुल 26 सीटें हैं। मियांपुर नरसंहार के बाद 2000 में हुए विधानसभा चुनाव में BJP को 2 और JDU को 3 सीट मिलीं। यानी कुल 5 सीट। जबकि RJD को 17 और कांग्रेस का खाता नहीं खुला।
फरवरी 2005 के चुनाव में भी BJP को 2 और समता पार्टी को 3 यानी कुल 5 सीट मिलीं, लेकिन RJD 11 पर सिमट गई। और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली। अक्टूबर 2005 में BJP ने 5 और समता पार्टी से मिलकर बनी JDU ने 7 सीट जीत लीं। यानी NDA के खाते में 12 सीटें आ गईं। जबकि RJD 8 और कांग्रेस महज 1 सीट ही जीत पाई। यानी कुल 9 सीट।
राबड़ी सरकार के दौरान ही पटना हाईकोर्ट ने ‘जंगल राज’ शब्द का इस्तेमाल किया था। आज भी BJP और NDA जंगल राज को लेकर RJD को घेरती रही हैं। हर चुनाव में BJP इसे मुद्दा बनाती हैं।
मियांपुर नरसंहार के बाद RJD की सीटें लगातार घटती गई। अक्टूबर 2005 में RJD बहुमत से कोसों दूर रह गई। वह 243 में से सिर्फ 54 सीटें ही जीत पाई। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और तब से अब तक हर बार बिहार की सत्ता नीतीश के इर्द-गिर्द ही रही है।
अब सेनारी नरसंहार भी जान लीजिए…
मंदिर ले जाकर 34 भूमिहारों का गला काटा:महिलाओं से बदसलूकी, CM राबड़ी बोलीं-वे लोग हमारे वोटर नहीं, क्यों जाएं वहां

मैं गांव पहुंचा तो भीड़ जुटी थी। ठाकुरबाड़ी के बाहर अधकटी लाशें बिखरी पड़ी थीं। लोग गुस्से में थे। महिलाएं छाती पीट-पीटकर रो रही थीं। जब लाशों की फोटो खींचने लगा, तो दर्जनों लोग खुद के ऊपर कपड़े डालकर लाशों के बीच लेट गए।
एक बुजुर्ग ने गुस्से में कहा- ‘30-35 लाशों की फोटो मत लो। जितने लोग लेटे हैं सबकी फोटो खींचो। लोगों को पता तो चले कि यहां कितना बड़ा नरसंहार हुआ है।’
पुलिस लाशें उठाना चाहती थी, लेकिन गांव वाले तैयार नहीं हुए। भीड़ ने पुलिस को घेर लिया। लोग एमसीसी और लालू यादव के खिलाफ नारा लगाने लगे। पुलिस से कहने लगे- ‘हमें राइफल चाहिए, राइफल। हम लोग खुद सुरक्षा करेंगे। कोई प्रशासन नहीं है यहां। प्रशासन मुर्दा है मुर्दा।’
19 मार्च को ही पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन रजिस्ट्रार पद्मनारायण सिंह सेनारी पहुंचे। यहां उनके परिवार के 8 लोग मारे गए थे। अपने परिवार वालों की लाशें देखकर उन्हें हार्ट अटैक आ गया। कुछ ही देर बाद उनकी मौत हो गई। गांव वाले और नाराज हो गए। पूरी खबर पढ़िए…
कल 9वें एपिसोड में पढ़िए बिहार के एक और बड़े नरसंहार की कहानी…
(यह सच्ची कहानी पुलिस चार्जशीट, कोर्ट जजमेंट, गांव वालों के बयान, अलग-अलग किताबें और इंटरनेशल रिपोर्ट्स पर आधारित है। क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करते हुए इसे कहानी के रूप में लिखा गया है।)
रेफरेंस :
- Ruled or Misruled: Story and Destiny of Bihar
- https://www.tribuneindia.com/2000/20000618/main1.htm?utm_source=chatgpt.com
- https://indiankanoon.org/doc/154883313/
- https://www.telegraphindia.com/india/12-shot-dead-in-bihar-midnight-massacre/cid/895371
