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‘जमीन खाली करो’ कहकर 16 लाशें बिछा दीं: मासूमों को भी मार डाला, CM नीतीश को धमकी- मेरे आदमियों को रिहा करो वर्ना मारे जाओगे

‘जमीन खाली करो’ कहकर 16 लाशें बिछा दीं:  मासूमों को भी मार डाला, CM नीतीश को धमकी- मेरे आदमियों को रिहा करो वर्ना मारे जाओगे


20 घंटे पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

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दैनिक भास्कर की इलेक्शन सीरीज ‘नरसंहार’ के 9वें एपिसोड में आज कहानी खगड़िया नरसंहार की…

साल 2009 और तारीख 1 अक्टूबर। गांधी जयंती से ठीक एक रोज पहले। बिहार के खगड़िया जिले का अमौसी बहियार गांव। रात गहरी हो चुकी थी, घड़ी में 11 बज चुके थे। गांव के बाहर खेतों के चारों तरफ सन्नाटा पसरा था।

इसी सन्नाटे को चीरते हुए, 40–50 लोग तेज कदमों से आगे बढ़ रहे थे। उनके हाथों में देसी हथियार और बंदूकें थीं। टॉर्च की हल्की रोशनी में उनका हुलिया झलका। कुछ लुंगी कुर्ता पहने, तो कुछ पुलिस की वर्दी में।

थोड़ी देर बाद वे एक खेत के पास जाकर रुक गए। इधर-उधर टॉर्च जलाई। 40 बरस का एक आदमी इस झुंड का कमांडर था। लंबी कद-काठी, मोटी मूंछें और सिर पर गमछा बांधे।

धीमी आवाज में बोला- ‘सब सो गए होंगे… एकदम धीरे जाना है। जरा भी शोर नहीं।’

वे झोपड़ी तक पहुंचे। एक आदमी आगे बढ़ा, खिड़की से झांका और वापस आकर बोला- ‘काका, अंदर लोग सो रहे हैं… नाक बज रही है। गहरी नींद में हैं सब।’

कमांडर मुस्कुराया, होंठों में खैनी दबाई और बोला- ‘बहुत बढ़िया… अब टूट पड़ो। याद रखो, गोली मत चलाना।’

10–12 लोगों ने झोपड़ी को चारों तरफ से घेर लिया। कुछ दबे पांव अंदर घुसे। तीन लोग सो रहे थे। दो मासूम बच्चे और एक नौजवान। हमलावरों ने गमछा निकालकर उनके मुंह कसकर दबा दिए। किसी ने हाथ पकड़ा, किसी ने पैर बांध दिए। तीनों छटपटाने लगे। पर कुछ कर नहीं पाए। हमलावरों ने सब कुछ इतना जल्दी किया कि वे चीख भी नहीं सके।

कमांडर बोला- ‘दो-तीन किलोमीटर दूर छोटे लाल का डेरा है। इन्हें वहीं ले जाओ। शोर मत करना। कोई भागे तो गड़ासे से काट देना।’

10-12 हमलावर तीनों को कंधे पर उठाकर डेरा की तरफ चल दिए।

खगड़िया नरसंहार : 2 अक्टूबर 2009, एक लाइन से लाशें रखी हैं। घर वाले बिलख रहे हैं। सोर्स : लाइब्रेरी

खगड़िया नरसंहार : 2 अक्टूबर 2009, एक लाइन से लाशें रखी हैं। घर वाले बिलख रहे हैं। सोर्स : लाइब्रेरी

अब 8-10 हमलावरों ने दूसरी झोपड़ी को घेर लिया। वहां दो लड़के सो रहे थे। हमलावरों ने उनके मुंह में जबरन कपड़ा ठूंसा और हाथ-पैर बांधकर घसीटते हुए बाहर लाए। कमांडर बोला- ‘इन्हें भी छोटे लाल का डेरा लेकर चलो।’ हमलावरों ने वैसा ही किया।

हमलावर अलग-अलग झोपड़ियों से 16 लोगों को उठाकर डेरा ले गए। सबको एक लाइन से बिठाया। सब डरे सहमे थे। 5-6 तो स्कूली बच्चे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि उनके साथ क्या हो रहा।

कमांडर बोला- ‘@#$%^@# तुम लोग खेत जोतेगा और हम मजदूरी करेंगे। तुम जमींदार और हम नौकर। ऐसे नहीं चलेगा।’

हाथ जोड़ते हुए एक बुजुर्ग बोला- ‘अरे बाबू, ले लो जमीन। कल से तुम ही जोतना। जान छोड़ दो हमारी।’

‘बहुत होशियार बन रहे हो हर@#$@#, अब जब पकड़े गए तो दानी बन रहे हो।’ इतना कहते हुए उसने लाठी उठाई और जोर-जोर से मारने लगा। थोड़ी देर बाद जब थक गया तो बोला- ‘बहुत हो गया। अब @#$%@# को गोली से उड़ा दो। जो होगा देखा जाएगा।’

तभी एक हमलावर बोल पड़ा- ‘बच्चों को मत मारो, जाने दो इन्हें।’

कमांडर ने गुस्से में कहा- ‘कोई दया नहीं दिखानी। इनके बच्चों को मारोगे, तो इन्हें ज्यादा दर्द होगा। बहुत दर्द दिया है इन लोगों ने, हमें भी उसी अंदाज में सबक सिखाना है।’

पहली गोली कमांडर ने ही मारी। 7-8 साल का मासूम गोली लगते ही कोने में जा गिरा। कमांडर उसके नजदीक गया और सिर पर बंदूक की नोक सटाकर दोबारा गोली मार दी। ये देखकर बाकी लोग कांप गए। मन ही मन अपनी बारी का इंतजार करने लगे।

इसके बाद हमलावरों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। किसी को 2 गोली, तो किसी को 4 गोली। कुछ ही देर में दर्जनभर लाशें बिछ गईं। हमलावरों ने उलट पलटकर देखा कोई जिंदा तो नहीं बचा। जब यकीन हो गया कि सब मर गए, तो वे तेज कदमों से पश्चिम की तरफ चल पड़े।

अब रात के 12 बज चुके थे। कैलेंडर बदल चुका था। 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती का दिन। 45-50 साल का पारो सिंह गोलियों की आवाज सुनकर डेरा की तरफ भागा। डेरा के पास जाकर ठहर गया। टोह लेने लगा कि अंदर हमलावर तो नहीं हैं।

कुछ देर तक अंदर से कोई आवाज नहीं आई। उसने टॉर्च जलाकर देखा- सामने एक दर्जन से ज्यादा लाशें पड़ी थीं। किसी के सीने में गोली लगी थी, तो किसी के सिर में। चारों तरफ खून फैला हुआ था।

सूनी हो गई मां की गोद : 2 अक्टूबर 2009, आखिरी बार अपने बेटे को निहारती हुई मां। सोर्स : लाइब्रेरी

सूनी हो गई मां की गोद : 2 अक्टूबर 2009, आखिरी बार अपने बेटे को निहारती हुई मां। सोर्स : लाइब्रेरी

कांपते हुए पारों सिंह आगे बढ़ा। मरने वालों में उसका 20 साल का बेटा भी था। उसके सिर और छाती में गोली मारी गई थी। बेटे की लाश देखकर पारो चीख उठा। दहाड़ मारकर रोने लगा। थोड़ी देर बाद खुद को संभाला और अपने गांव की ओर भागा।

पारो यहां से करीब 1 किलोमीटर दूर इचरुआ गांव का रहने वाला था। अमौसी में उसकी जमीनें थीं और उसी की रखवाली के लिए वो हर रात यहां रुकता था।

कुछ ही मिनटों में वह गांव पहुंच गया। जोर-जोर से चीखने लगा। बिलखने लगा। उसकी चीख सुनकर गांव के कुछ लोगों ने दरवाजा खोला। पूछा- ‘क्या हुआ, इतना क्यों चीख रहे हो।’

लड़खड़ाती जुबान से पारो बोलने लगा- ‘नक्सलियों ने हमला कर दिया है। डेरा ले जाकर सबको मार दिया। मेरे बचवा को भी मार दिया।’

50-60 गांव वाले रात में ही छोटे लाल का डेरा के लिए निकल गए। वहां जाकर देखा तो 16 लाशें बिखरी पड़ी थीं। इनमें 6 बच्चे, 9 जवान और 1 बुजुर्ग की लाश थी। वे लोग लाश उठाकर इचरुआ लेकर आए। एक चौक पर लाशें रख दीं। इसके बाद तो गांव में चीख-पुकार मच गई।

बार-बार फोन करने पर भी SP ने कॉल रिसीव नहीं की…

अब तक रात के करीब 1.30 बज चुके थे। गांव के मुखिया ने खगड़िया के SP को फोन लगाया, लेकिन बार-बार फोन करने के बाद भी उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की। गांव वालों ने स्थानीय पत्रकार को इसकी सूचना दी। जब पत्रकार ने SP को फोन कर नरसंहार के बारे में बताया तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने फौरन पास के मोरकाहा थाने को खबर दी।

सुबह करीब 5 बजे मोरकाहा थाने की पुलिस गांव पहुंची। भीड़ जुट गई थी। सरकार और प्रशासन के खिलाफ नारे लग रहे थे। लाशों के सामने बैठी महिलाएं छाती पीट-पीटकर रो रही थीं।

थाना प्रभारी मुकेश कुमार ने पूछा- ‘कत्ल करते हुए किसी ने हमलावरों को देखा है क्या?

भीड़ से निकलकर पारो सिंह बोला- ‘साहब मैंने देखा है। उन लोगों ने मेरे बेटे को भी मार डाला है।’

थाना प्रभारी- क्या देखा, पूरी बात बताओ?

पारो बोलने लगा- साहब…‘रात के 11 बजे थे। मैं झोपड़ी में बेटे चंदन के साथ सो रहा था। अचानक कुछ आहट सुनाई पड़ी, तो मैं उठकर बैठ गया। मैंने देखा कि 40 से 50 लोग बंदूक और हथियार लिए दक्षिण-पश्चिम से आ रहे हैं। वे टॉर्च जला रहे थे।

कुछ देर बाद वे लोग अलग-अलग झोपड़ियों गए और वहां से लोगों को पकड़ पकड़कर बाहर लाने लगे। इसके बाद 10-15 लोग मेरी झोपड़ी की तरफ बढ़े। मैं बेटे को जगाया पर वो जगा नहीं। इसके बाद मैं भागकर पास के धान के खेत में छिप गया।’

बेबसी, लाचारी और आंसू : 2 अक्टूबर 2009, अपने बेटे और पति के लिए बिलखती हुई महिलाएं। सोर्स : लाइब्रेरी

बेबसी, लाचारी और आंसू : 2 अक्टूबर 2009, अपने बेटे और पति के लिए बिलखती हुई महिलाएं। सोर्स : लाइब्रेरी

थाना प्रभारी- फिर क्या हुआ?

हांफते हुए पारो बोला- ‘उन लोगों ने मेरे बेटे का हाथ पैर बांधा। मुंह में कपड़ा ठूंस दिया। फिर उसे लेकर छोटे लाल सिंह के डेरा की तरफ चल पड़े। उन्होंने बाकी लोगों के भी हाथ-पैर बांध रखे थे। टॉर्च की रोशनी में मुझे दिख रहा था। मैंने बुधन सडा को पहचान लिया।

बुधन ने गांव वालों से पूछा- ‘तुम लोग डेरा खाली क्यों नहीं कर रहे। हमने कहा था कि न कि डेरा खाली कर दो।’ मेरे बेटे ने कहा कि वह कल डेरा खाली कर देगा, लेकिन बुधन नहीं माना। उसने अपने आदमियों से कहा कि सबको मार दो।’

कैसे मारा?

पारो बोला- ‘साहब… पहले तो सबको लाठी-डंडे से पीटा। लोग चीखते रहे। कोई बचाने नहीं आया। उन लोगों ने बंदूक उठाई और गोली मार दी। फिर उन लोगों ने टॉर्च जलाकर देखा कि कोई बच तो नहीं गया। मैंने टॉर्च की लाइट में 16 लोगों को पहचान लिया।

जब वे चले गए, तब मैं नदी किनारे गया। वहां छोटे लाल सिंह, जयचंद सिंह, अनिरुद्ध सिंह और कामिल मुझसे मिले। ये लोग भी जोर-जोर से रो रहे थे। इनके बेटों को भी उन लोगों ने मार दिया था। फिर हम पांचों ने गांव आकर बताया कि नरसंहार हो गया है।’

पारो सिंह और गांव वालों के बयान पर 2 अक्टूबर की सुबह 7.45 पर FIR दर्ज की गई। इसमें 37 लोगों को आरोपी बनाया गया। आरोप मुसहर जाति के लोगों पर लगा था। दावा किया गया कि वे नक्सली संगठनों से जुड़े थे।

ये खगड़िया नरसंहार था। जिसमें 16 लोगों की हत्या हुई थी। इनमें से 14 दबंग कुर्मी जाति से थे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इसी समुदाय से आते हैं। लिहाजा इस पर सियासत भी खूब हुई।

भीड़ और गुस्सा : 2 अक्टूबर 2009, इचरुआ गांव में चौक पर रखी लाशों को देखने के लिए भीड़ छतों पर भी चढ़ गई थी। सोर्स : लाइब्रेरी

भीड़ और गुस्सा : 2 अक्टूबर 2009, इचरुआ गांव में चौक पर रखी लाशों को देखने के लिए भीड़ छतों पर भी चढ़ गई थी। सोर्स : लाइब्रेरी

2 अक्टूबर 2009, देश गांधी जी की 140वीं जयंती की तैयारी कर रहा था। सुबह लोगों ने जैसे ही अखबार पलटा, बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- ‘खगड़िया में नरसंहार।’ ‘गांव में चूल्हे नहीं, 16 चिताएं जलीं।’… नीतीश राज का ये सबसे बड़ा नरसंहार था।

पूर्व CM लालू यादव और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने CM नीतीश का इस्तीफा मांग लिया। लालू ने कहा- ‘सरकार फेल है। मुख्यमंत्री को जहां नरसंहार हुआ है, वहां जाना चाहिए। सरकार को इस नरसंहार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। ये कोई जातीय नरसंहार नहीं है। ये नक्सली हमला है।’

उसी रोज डिप्टी CM सुशील मोदी नरसंहार वाले गांव पहुंच गए, लेकिन भीड़ उनका विरोध करने लगी। जमकर नारेबाजी हुई। डिप्टी CM उन्हें समझाने की कोशिश करते रहे, पर गांव वाले माने नहीं। आखिरकार सुशील मोदी पटना लौट आए।

पटना पहुंचने के बाद उन्होंने कहा- ‘खगड़िया हत्याकांड भूमि विवाद का परिणाम है। ये इलाका नक्सल प्रभावित रहा है। इसलिए ऐसा लग रहा कि इसमें नक्सलियों का हाथ है। पर इसमें राजनीतिक साजिश भी लगती है, क्योंकि बिहार के दो बड़े नेता लालू प्रसाद और रामविलास पासवान कुछ जातियों का नाम लेकर बयान दे रहे हैं।’

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मिली जान से मारने की धमकी

2 अक्टूबर की सुबह करीब 8.58 बजे एक पत्रकार के फोन पर मैसेज मिला। इसमें कहा गया था- ‘जेल में बंद हमारे दो नेताओं को जल्द रिहा किया जाए। वर्ना हम मुख्यमंत्री को खत्म कर देंगे।’

मैसेज में जिन दो लोगों को जेल से छोड़ने की मांग की गई थी, वे दोनों हार्ड कोर नक्सली थे। पत्रकार ने करीब 1 घंटे बाद यह मैसेज देखा। आनन-फानन में इसकी सूचना जनसंपर्क विभाग को दी। ये खबर आग की तरह फैली। प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए। फौरन CM की सुरक्षा बढ़ा दी गई। हालांकि, बाद में पुलिस ने नंबर ट्रेस कर मैसेज भेजने वाले को गिरफ्तार कर लिया।

सांत्वना : 2 अक्टूबर 2009, तब बिहार के डिप्टी CM रहे सुशील मोदी गांव वालों से बात करते हुए। सामने लाशें रखी हैं।

सांत्वना : 2 अक्टूबर 2009, तब बिहार के डिप्टी CM रहे सुशील मोदी गांव वालों से बात करते हुए। सामने लाशें रखी हैं।

शुरुआत में CM ने इसे नक्सली हमला बताया, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि ये वर्चस्व की लड़ाई है। स्थानीय गुंडों ने इसे अंजाम दिया है। CM ने मृतकों के प्रत्येक परिवार को 1.5 लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया।

3 अक्टूबर को नक्सली फैक्टर की जांच करने के लिए पटना से फोरेंसिक विशेषज्ञों की टीम गांव पहुंची। कई नमूने जुटाए। उसी रोज रात में सरकार ने खगड़िया के SP इंद्रानंद मिश्र और SDOP अजय कुमार पांडेय को लापरवाही के आरोप में सस्पेंड कर दिया।

पुलिस ने आसपास के गांवों से छापेमारी कर एक दर्जन से ज्यादा आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। उसमें एक आरोपी उपेंद्र महतो भी था। पुलिस ने जब उसे थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया तो उसने बताना शुरू किया।

’14 सितंबर को अमौसी के मुखिया के घर रात में हमले की साजिश रची गई। वहां मौजूद लोगों ने कहा कि अमौसी की जमीन पर कुर्मियों ने कब्जा कर रखा है। कोर्ट-कचहरी से कुछ हल निकल नहीं रहा। हमें नक्सलियों की मदद लेनी चाहिए और उन लोगों को हमेशा के लिए खत्म कर देना चाहिए। फिर हमले की रणनीति बनी, लेकिन इसमें मेरी कोई भूमिका नहीं है।’

आखिर खगड़िया नरसंहार हुआ क्यों?

खगड़िया के अलौली ब्लॉक में अमौसी गांव है। यहां करीब 100 घर मुसहर हैं। कुछ घर धानुक हैं। यह दियरा क्षेत्र में है। यहां पहुंचने के लिए कमला नदी पार करके जाना होता है।

1 अक्टूबर को जो कुर्मी अमौसी गांव में मारे गए थे, वे इचरुआ के रहने वाले थे। इचरुआ, नदी के दूसरी तरफ तीन किनारों से घिरा है। दोनों गांव करीब 3 किलोमीटर की दूरी हैं। इचरुआ बड़ा गांव है और यहां करीब 5000 लोग रहते हैं। सड़क तरफ बसे इस गांव में ज्यादातर कुर्मी हैं और वे दबंग हैं।

60 के दशक में नदी पर एक बांध बनाया गया था। इससे नदी ने अपना रास्ता बदल दिया। इससे अमौसी बहियार में खेती वाली जमीन का एक बड़ा हिस्सा उभर आया। समस्तीपुर, मुंगेर और बेगूसराय के ज़मींदारों ने इस जमीन पर अपना अधिकार जता दिया। हालांकि, सरकार के मुताबिक ये गैरमजरूआ जमीनें थीं।

कहा जाता है कि कुर्मी समुदाय के लोगों ने इन जमीनों पर कब्जा कर लिया था।

मनहूस जगह : ये वहीं जगह है जहां खगड़िया नरसंहार हुआ था। 16 लोगों के हाथ-पैर बांधकर गोली मार दी गई थी।

मनहूस जगह : ये वहीं जगह है जहां खगड़िया नरसंहार हुआ था। 16 लोगों के हाथ-पैर बांधकर गोली मार दी गई थी।

यह भी कहा जाता है कि कुछ कुर्मी परिवारों ने जमींदारों से समझौता कर लिया था। समझौता ये कि जिन जमीनों पर विवाद चल रहा है, वहां वे खेती करेंगे और बदले में जमींदार को कुछ रकम देंगे। अगर जमींदार केस जीत जाता है, तो वह जमीन बेच देगा। कुछ जमीनों पर इसलिए भी कब्जा था कि किसी ने वहां दावा नहीं किया।

कुछ बड़े लैंड होल्डर थे। इसमें से कई लोग सत्ताधारी पार्टी से जुड़े थे। दूसरी तरफ अमौसी और आसपास के गांवों में रहने वाले दलित मजदूर थे।

1998 में ये जमीनें कानूनी रूप से सरकार की हो गईं। तब मुसहरों ने दावा कर दिया कि हर परिवार को कम से कम एक एकड़ जमीन मिलनी चाहिए।

करीब 8 परिवार ऐसे थे जिनके पास भूदान का कागज था। उन लोगों ने भूदान लैंड सेटलमेंट के लिए आवेदन दिया था। SDM ने सेटलमेंट के लिए ऑर्डर भी जारी किया था, लेकिन कुछ हुआ नहीं।

सरकार जमीनों का निपटारे के बिना ही मजदूरों के एक गुट खेती शुरू कर दी। कुर्मियों ने इस पर नाराजगी जताई। अमौसी में मुसहरों और इचरुआ के कुर्मियों के बीच छोटी-मोटी झड़पें होने लगीं।

यहां से ही नरसंहार नींव पड़ी। यहां नक्सली संगठन की भी अच्छी-खासी पैठ थी। घटना के बाद ज्यादातर लोगों ने कहा कि मुसहरों ने माओवादियों ने जुटाया और इस नरसंहार को अंजाम दिया।

आरोपी 36, लोअर कोर्ट ने 10 को फांसी की सजा सुनाई, हाईकोर्ट से सभी बरी

टूट गई आस : 2 जनवरी 2014, खगड़िया नरसंहार में कई महिलाओं के पतियों की हत्या हुई थी।

टूट गई आस : 2 जनवरी 2014, खगड़िया नरसंहार में कई महिलाओं के पतियों की हत्या हुई थी।

खगड़िया नरसंहार में 36 लोगों पर आरोप लगा। इनमें से 28 ट्रायल में शामिल हुए। फरवरी 2012 को खगड़िया की स्थानीय अदालत ने 14 लोगों को दोषी करार दिया। 10 को फांसी की सजा और 4 आरोपियों को उम्रकैद। बाकी 14 आरोपियों को बरी कर दिया। फांसी की सजा वाले सभी 10 दोषी मुसहर जाति से थे।

दोषियों ने इसके खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने कहा- ‘मेरे मुवक्किल को जानबूझकर फंसाया जा रहा है। उन्होंने गवाह के बयान पर 3 सवाल उठाए :

  • अगर पारो सिंह ने अलग-अलग डेरों से 12 लोगों को उठाते देखा। क्या उसके पास इतना वक्त नहीं था कि वो अपने बेटे को जगा सके?
  • पारो का कहना है कि टॉर्च की लाइट में उसने चेहरा पहचान लिया। पर साइंस के मुताबिक तो जो व्यक्ति टॉर्च जलाता है, उसकी तरफ रोशनी होती नहीं है।
  • FIR में कई जगह वाइटनर यूज किया गया है। इसलिए ये साबित करना मुश्किल है कि FIR के साथ छेड़-छाड़ की गई है या नहीं।

2 साल बाद यानी जनवरी 2014, लोकसभा चुनाव से 3 महीने पहले। पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया। जस्टिस वीएन सिन्हा और जस्टिस राजेंद्र कुमार मिश्र ने संदेह का लाभ देते हुए सभी 14 आरोपियों को बरी कर दिया।

इस फैसले पर नीतीश कुमार ने कहा- ‘सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। हाईकोर्ट तो सिर्फ अपील की जगह होती है। जब ट्रायल कोर्ट ने उन्हें सजा दे दी, तो इसका मतलब हुआ कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत थे।’

2009 में खगड़िया जिले की चार सीटों में से तीन सीटें जदयू पास थीं। एक सीट लोजपा के पास। 2010 के चुनाव में भी यहां की तीन सीटें जदयू ने जीत लीं। यानी विधानसभा चुनाव पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा, लेकिन लोकसभा में नीतीश की पार्टी को नुकसान हो गया।

नरसंहार से पहले खगड़िया सीट जदयू के पास थी। 2014 के चुनाव में रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा ने जदयू को हरा दिया। 2019 और 2024 में नीतीश NDA के साथ लड़े, लेकिन यह सीट सहयोगी पार्टी लोजपा को मिल गई।

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हमलावर ने औरतों की तरफ इशारा करते हुए बोला- ‘इनकी इज्जत लूट लो और काम तमाम कर दो।’ हमलावरों ने वैसा ही किया। बलात्कार करके महिलाओं और लड़कियों की गर्दन उतार दी। कमला के पिता से यह देखा नहीं गया। वे गाली देते हुए हमलावरों पर झपटे, पर उन लोगों ने दबोच लिया। दो हमलावरों ने उनका पैर पकड़ा और दो ने हाथ।

20 साल के एक लड़के ने उनके पेट में कुल्हाड़ी मार दी। वो चीख उठे। तभी हमलावर ने उनके मुंह में बंदूक का बट ठूंस दिया। चंद मिनटों में वे तड़प-तड़पकर शांत हो गए। अब एक हमलावर बोला- ‘टाइम खराब मत करो। सारे मर्दों को बांध दो और ले चलो बरगद के पेड़ के पास।’ पूरी खबर पढ़िए…

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एक घर के बरामदे में 3 लोग सो रहे थे। पति-पत्नी और बेटी। गोलियों की आवाज सुनकर पति दीवार फांदकर भाग गया, लेकिन उसकी पत्नी और बच्ची पकड़े गए। एक हमलावर ने दोनों पर बंदूक तान दी। तभी पीछे से दूसरा बोल पड़ा- ‘अरे गोली बर्बाद मत करो। तलवार से काट दो।’

हमलावर ने महिला की छाती पर तलवार मार दी। वो जमीन पर धड़ाम से गिर पड़ी। दूसरे ने महिला की गर्दन पर तीन-चार बार वार किया। उसकी गर्दन कट गई।

इसी बीच एक हमलावर ने उसकी बेटी को दबोच लिया। वो कांपने लगी। कहने लगी- ‘भईया हमरा के मत मार.. छोड़ द.. हम तोहरा गोड़ पर गिरत बानी।’

हमलावर दांत पीसते हुए बोला- ‘@#%^& तुम्हें गवाही देने के लिए छोड़ दूं।’ उसने लड़की को जोर से तीन-चार थप्पड़ जड़े। धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया और रेप करने लगा। वो लगातार चीखती रही। फिर दूसरे हमलावर ने भी उसकी इज्जत लूट ली। फिर उसके शरीर के निचले हिस्से में गोली मारकर आगे बढ़ गया। पूरी खबर पढ़िए…

कल 10वें एपिसोड में पढ़िए बिहार के एक और बड़े नरसंहार की कहानी…

(यह सच्ची कहानी पुलिस चार्जशीट, कोर्ट जजमेंट, गांव वालों के बयान, अलग-अलग किताबें और रिपोर्ट्स पर आधारित है। क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल करते हुए इसे कहानी के रूप में लिखा गया है।)

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