मंगलवार की सुबह तेजस्वी यादव ने दो बड़े ऐलान किए। पहला- माई बहिन योजना के तहत हर साल 14 जनवरी को महिलाओं के खाते में एकमुश्त 30 हजार रुपए डाले जाएंगे। यानी 5 साल में कुल 1.5 लाख रुपए। दूसरा- चीफ मोबलाइजर जीविका दीदी को परमानेंट करने और हर महीने 31 हज
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तेजस्वी का ये वादा महागठबंधन के साझा मैनिफेस्टो में भी था। अंतर बस इतना कि तब हर महीने 2500 रुपए देने की बात थी और अब एकमुश्त साल के 30 हजार रुपए।
क्या NDA के महिलाओं को 10 हजार रुपए देने की योजना पर भारी पड़ेगा तेजस्वी का वादा…जानेंगे आज की स्टोरी में…
सवाल-1ः नीतीश सरकार की महिला रोजगार योजना क्या है और वह कितने पैसे दे रही?
जवाबः मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के के पहले चरण में महिलाओं को सीधे बैंक खाते में 10,000 रुपए दिया जा रहा है। ये पैसे महिलाओं को अपना रोजगार शुरू करने के लिए दिए जा रहे हैं। बाद में उनके काम को आकलन करके 2 लाख रुपए तक की और मदद सरकार देगी।
सरकार के मुताबिक यह रकम कोई लोन नहीं है। यानी इसे सरकार को वापस नहीं करना है। अब तक करीब 1.20 करोड़ महिलाओं के बैंक खातों में 10-10 हजार रुपए भेजे जा चुके हैं। बाकी पात्र महिलाओं को दिसंबर 2025 तक रकम भेज दी जाएगी।
सवाल-2 : महिलाओं को लेकर तेजस्वी और महागठबंधन ने क्या घोषणाएं की हैं?
जवाब : आरजेडी ने माई बहन मान योजना इसी साल फरवरी में हर महिला को हर महीने 2,500 रुपए देने का ऐलान किया था। RJD और कांग्रेस ने इसका फॉर्म भी भरवाना शुरू कर दिया है। अब मंगलवार को तेजस्वी ने इस योजना में नया ऐलान किया कि वो साल भर की रकम एकमुश्त ही देंगे। यानी हर साल 30 हजार रुपए।
सवाल-3 : क्या 30 हजार रुपए देने की स्कीम महागठबंधन के लिए गेम चेंजर साबित होगी?
जवाब : इसे समझने के लिए 2 आंकड़े देखिए :
पहला : 2020 में महागठबंधन को सिर्फ 1% महिलाओं ने कम वोट किया था
सर्वे एजेंसी लोकनीति-CSDS की एक रिपोर्ट मुताबिक 2020 के बिहार चुनाव में 38% महिलाओं ने NDA को और 37% महिलाओं ने महागठबंधन को वोट किया था। यानी सिर्फ 1% का फासला था।
दूसरा : 2020 में NDA से सिर्फ 0.03% कम वोट महागठबंधन को मिले थे
2020 के चुनाव ओवर ऑल NDA और महागठबंधन को मिले वोटों का अंतर सिर्फ 11 हजार 250 वोट था। यानी 0.03% कम वोट महागठबंधन को मिले थे।
एक्सपर्ट मानते हैं कि एकमुश्त 30 हजार रुपए के वादे से NDA और महागठबंधन को मिले वोटों के अंतर को पाटा जा सकता है। यानी तेजस्वी का ये वादा महागठबंधन के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। पिछले 2 साल में 10 में से 9 राज्यों में ऐसा हो चुका है।
नवंबर 2023 से अब तक 13 राज्यों में चुनाव हुए हैं। इनमें 10 में ‘महिलाओं को पैसे देने वाली कैश स्कीम लागू की गई या वादा किया गया। इनमें से 9 राज्यों में योजना कारगर रही। स्ट्राइक रेट 90% रहा।
9 में से 5 राज्य ऐसे रहे, जहां कैश स्कीम ने सरकारें पलट दीं। यानी वादा करने वाली पार्टी ने सत्ता पक्ष को हराकर सरकार बनाई। 4 राज्य ऐसे रहे, जहां वादा करने वाली पार्टी अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रही।
सवाल-4 : मुफ्त की योजनाओं का वादा सरकार और विपक्ष दोनों ने किया, तब क्या हुआ?
जवाबः इसको लेकर भी 2 अहम फैक्ट हैं :
पहला : जिस सरकार ने पहले रकम भेज दी, उसे फायदा हुआ
आंकड़े बताते हैं कि जिस भी सरकार ने चुनाव से पहले एक या दो किस्त महिलाओं के खाते में डाली, उसकी वापसी हुई। जैसे-झारखंड, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश।
झारखंड की हेमंत सरकार ने मईंया सम्मान योजना की दो किस्त वोटिंग (20 नवंबर 2024) से पहले महिलाओं के खाते में डाल दी। इससे महिलाओं ने हेमंत पर भरोसा जताया और वह चुनाव जीत गए। ऐसा ही मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी हुआ।
इसका मतलब यह हुआ कि जब लोगों को एक या दो किस्त मिल जाती है तो सरकार के प्रति भरोसा जगता है। ऐसे में वह पार्टी नहीं देखते। चूंकि, विपक्ष सिर्फ वादा कर सकता है, चुनाव से पहले फंड नहीं दे सकता।
बिहार के सीनियर जर्नलिस्ट इंद्रभूषण भी मानते हैं कि नीतीश ने महिलाओं के खाते में पैसे डालकर मामला सेट कर लिया है। वे कहते हैं- ‘तेजस्वी को पता है कि लालू के रहते महागठबंधन की सरकार नहीं बनी, तो आगे बहुत मुश्किल होगा। बाद में आरजेडी में टूट भी हो सकती है। इसीलिए तेजस्वी खुद को सीएम बनाने के सारे पत्ते खोल रहे हैं। सालाना 30 हजार रुपए देने की घोषणा इसी का हिस्सा है। हालांकि, इससे उन्हें बहुत फायदा नहीं होने वाला, क्योंकि नीतीश सरकार तो पहले से ही 10 हजार रुपए जीविका दीदियों को दे चुकी है।
दूसरा : विपक्ष में रहते हुए भी बीजेपी ने वादा करके सरकार बना ली
पिछले 2 साल के आंकड़ों को देखें तो बाकी पार्टियों के वादे की तुलना में भाजपा के वादे पर लोगों ने ज्यादा भरोसा जताया है। जैसे-दिल्ली, छत्तीसगढ़ और राजस्थान। इन तीनों राज्यों में बीजेपी सरकार में नहीं थी। यानी बीजेपी योजना लागू करने की स्थिति में नहीं थी। वादा किया और लोगों ने उस पर सत्ताधारी पार्टी से ज्यादा भरोसा जताया।
एक्सपर्ट के मुताबिक इसकी बड़ी वजह यह भी है कि बीजेपी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में योजना लागू कर चुकी है। इसलिए लोग उस पर भरोसा कर लेते हैं।

CSDS की रिपोर्ट के मुताबिक 38% महिलाओं ने 2020 के बिहार चुनाव में NDA को वोट किया था और 37% महिलाओं ने महागठबंधन को।
महिलाओं की कैश स्कीम जीत का फॉर्मूला क्यों है; 4 पॉइंट्स में समझते हैं…
1. पैसों की इतनी तंगी कि कैश हजार-दो हजार भी बड़ी राहत
कोविड के बाद से भारतीय परिवारों की माली हालत बिगड़ी है। केंद्र सरकार करीब 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दे रही है।
प्रोविडेंड फंड के आंकड़ों के मुताबिक, इस साल 4.45 करोड़ पीएफ क्लेम अप्रूव किए गए हैं, जो पिछले साल से 7.8% ज्यादा हैं। आमतौर पर कोई रास्ता न बचने पर ही लोग पीएफ से पैसा निकालते हैं।
बिहार की जातीय सर्वे-2022 के मुताबिक, राज्य में 94 लाख परिवार गरीबी रेखा (BPL) से नीचे हैं। ये वो परिवार हैं, जिनकी आमदनी 6,000 रुपए महीने से भी कम है।
इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘देश में प्रति व्यक्ति आय करीब एक लाख रुपए सालाना है। यानी करीब 8500 रुपए महीने। अगर किसी परिवार में महिलाओं को दो हजार रुपए महीने मिल रहे हैं तो ये उस परिवार की कमाई में 25% की ग्रोथ है। इसके लिए न तो कुछ करना है और न ही किसी को घूस देनी है। एक सिंपल फॉर्म भरना है, जिसके बाद सीधे खाते में पैसे आने लगते हैं।’
दिल्ली की अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर अभय कुमार दुबे बताते हैं, ‘1500 रुपए महीने का मतलब हुआ रोजाना महज 50 रुपए। इससे पता चलता है कि भारत के ज्यादातर वोटर्स कितने गरीब हैं कि इतनी छोटी रकम से भी वे राहत महसूस करते हैं।’
2. सालों से अनदेखी झेल रही महिलाएं एक नया वोटबैंक बनी
- लोकनीति-सीएसडीएस की विभा अत्री ने भारत में महिला वोटर्स ने रिसर्च की। उनके मुताबिक, महिला वोटर्स ने अपने वोट की ताकत को समझना और विश्वास करना शुरू कर दिया है। 69% महिला वोटर्स का मानना है कि वोटिंग देश में चीजों को चलाने के तरीके में बदलाव लाती है।
- दिसंबर 2023 में SBI-रिसर्च की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2047 तक महिलाओं की वोटिंग में 55% बढ़त हो सकती है। वहीं पुरुषों में 45% की गिरावट आ सकती है।
अमिताभ तिवारी मानते हैं कि ऐसी योजनाओं के कारण महिलाओं को बढ़ावा मिला है। वे कहते हैं, ‘लंबे समय से महिलाओं को अनदेखा किया जा रहा था, आज उन्हें अहमियत मिली है। अब महिलाएं परिवारों में अपनी बात मजबूत से कह पा रही हैं। इससे महिलाओं का वोटिंग पैटर्न भी बदला है।’
3. बीजेपी ने ‘महिला वोटबैंक’ को पहचाना, इससे सत्ता विरोधी रुझान को मात दी
जिन 10 राज्यों में ‘लाडली बहना’ जैसा फैक्टर था, उनमें से 8 राज्यों में बीजेपी या NDA को फायदा मिला। केंद्र से लेकर राज्यों तक बीजेपी ने महिलाओं को पहचान देने के कई कदम उठाए…
- महिलाओं-बच्चियों के लिए 3 लाख करोड़ रुपएः जुलाई 2024 में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में महिलाओं और बच्चियों की मदद करने वाली योजनाओं के लिए 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा देने का ऐलान किया।
- 11 लाख नई लखपति दीदीः मोदी सरकार 3.0 ने पहले 100 दिनों में 11 लाख नई ‘लखपति दीदियों’ को सर्टिफिकेट दिए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक करोड़ से ज्यादा ‘लखपति दीदियां’ अब हर साल एक लाख रुपए से ज्यादा कमा रही हैं।
- हर 10 में से 7 मकान महिलाओं कोः प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 70% से ज्यादा घर महिलाओं को दिए गए हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत उभरती बिजनेस विमेंस को 30 करोड़ रुपए लोन दिया गया है।
- 10 करोड़ महिलाओं को फ्री गैस सिलेंडरः प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को मुफ्त गैस सिलेंडर दिया गया है। साथ ही हायर एजुकेशन में महिलाओं के रजिस्ट्रेशन में 28% के बढ़त हुई है।
- अल्पसंख्यक महिलाओं पर भी फोकसः अगस्त 2019 में बीजेपी की मोदी सरकार ने ‘तीन तलाक’ को खत्म करने के लिए कानून बनाया। ऐसा कर पीएम मोदी ने मुस्लिम महिलाओं को बीजेपी की ओर लामबंद करने की कोशिश की।
- महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षितः सितंबर 2023 में मोदी सरकार ने महिला आरक्षण बिल पास किया। इसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की गईं। यानी 543 सीटों वाली लोकसभा में 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
4. आगे क्याः जब तक योजनाएं नई, तभी तक पार्टियों को फायदा
अमिताभ तिवारी बताते हैं, ‘भारत में आज इतनी असमानता बढ़ी है कि ऐसी योजनाएं लानी पड़ रही हैं। ऐसा करने से पार्टियां अगर सरकार बना पा रही हैं तो वे ऐसा आगे भी कर सकती है। पार्टियों ने सीधा फॉर्मूला बना लिया है कि पैसा बांटने की योजनाएं लाओ और चुनाव जीतो।’
अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘कैश ट्रांसफर जैसी योजनाएं जब तक नई होती है, तब तक वोटों में तब्दील होती रहती हैं, क्योंकि लाभ पहुंचाने वाली सरकारी पार्टी का आभार मानते हैं। जब योजना पुरानी हो जाती है तो वे उस तत्परता से बदले में वोट नहीं देते। लोकसभा चुनाव और 2022 में यूपी चुनाव में बीजेपी इस मुश्किल का सामना कर चुकी है।’
