दिल्ली के लालकिला बम धमाके के धुएं ने सिर्फ आसमान को नहीं, लोगों के दिलों-दिमाग में भी अंधेरा कर दिया है। इसकी पहली मार पड़ी उन मुसलमानों पर, जिनका इस घटना से कोई लेना-देना ही नहीं था। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने एक मुस्लिम पत्रकार का कमेंट बॉक्स गाल
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ब्लैकबोर्ड में इस बार कहानी उन आम मुसलमानों की, जिन्हें देश में आतंकी घटना या हमलों के बाद कुछ लोग टारगेट करने लगते हैं। लोग कमेंट करते हैं। धमकी देने लगते हैं।
शीबा असलम फहमी, जिन्हें वॉट्सऐप ग्रुप में उनके ही दोस्त ने पाकिस्तान जाने को कह दिया।
दिल्ली की तेज-तर्रार टीवी पत्रकार रहीं शीबा असलम फहमी अपने साथ घटा एक किस्सा बताती हैं। वह कहती हैं- ‘दोस्तों का एक वॉट्सऐप ग्रुप था। हम बचपन से एक ही मोहल्ले में बड़े हुए थे। एक ही स्कूल, वही टिफिन, वही शरारतें। हमारी दोस्ती इतनी गहरी थी कि हमें लगता था- इसे कोई नहीं हिला सकता, लेकिन ग्रुप में नोटबंदी को लेकर हमारी मामूली-सी चर्चा ने सब चकनाचूर कर दिया।
जब मैंने नोटबंदी को गलत ठहराया तो मेरे सबसे करीबी दोस्तों में से एक ने लिखा- तुम लोगों को तो 1947 में ही देश से निकाल देना चाहिए था… तुम लोग यहां न होते तो आधी समस्याएं अपने आप खत्म हो जातीं।’
वह वही दोस्त था, जो मेरी मम्मी के हाथ की बिरयानी खाए बिना नहीं रह पाता था। उस दिन मैं मोबाइल की स्क्रीन घूरती रह गई थी।
शीबा एक पल चुप रहती हैं- फिर धीरे से कहती हैं, ‘ये सिर्फ तंज नहीं था… यह एक रिश्ते के मरने की आवाज थी। सोच रही थी क्या हमारी दोस्ती सिर्फ नामों की दोस्ती थी? क्या वह रिश्ता उतना ही था, जितना किसी की पहचान इजाजत दे? हमारी हंसी, वो लड़ाइयां, वो साथ गुजरे साल- सब एक पल में धुंध की तरह उड़ गए और पीछे सिर्फ एक कड़वी हकीकत रह गई-
कुछ तो बदल गया है। और बहुत बुरी तरह बदल गया है।
शीबा जब अपने स्टूडियो में माइक ऑन करती हैं, तो आमतौर पर उनकी आवाज स्थिर रहती है- एक पत्रकार की तरह, लेकिन 10 नवंबर का जिक्र आते ही अचानक हल्की-सी कांप जाती है।
वह धीरे से कहती हैं- ‘उस दिन मैं ठीक उसी रास्ते से गुजरने वाली थी… लालकिले के पास। सोचकर आज भी दिल बैठ जाता है कि कुछ मिनट इधर-उधर हुई होती, तो शायद मैं भी…’
शीबा बताती हैं कि उनके ही मोहल्ले के कुछ लोग धमाके में मारे गए, लेकिन उससे भी ज्यादा डरावना वह था, जो उसके बाद हुआ।
‘ब्लास्ट के कुछ घंटों में ही सोशल मीडिया पर अफवाह फैला दी गई- इसके जिम्मेदार मुसलमान हैं। टोपी पहनने वालों की एक्स्ट्रा चेकिंग हो रही है।
यह कहते हुए उनकी आंखों में दर्द सिर्फ धमाके का नहीं था…दर्द यह था कि लोग इंसानों की मौत भूलकर फिर से नाम, शक्ल और पहचान पर हमला करने लगे।
शीबा मुस्कुराने की कोशिश करती हैं, लेकिन मुस्कान होठों तक आते-आते टूट जाती है। वह धीमे से कहती हैं- ‘एक घटना है, जो आज भी दिमाग में कहीं अटकी हुई है…’
‘एक दिन मैं जेएनयू से एक दोस्त के साथ लौट रही थी। गाड़ी में देश की राजनीति पर बहस चल रही थी- धीरे-धीरे गंभीर, फिर थोड़ी तीखी हुई। जब दोस्त उतरने लगा, तो उसने अचानक हाथ बढ़ाकर डैशबोर्ड से तिरंगा खींच लिया।’
बोला- ‘अब तुम लोग भी तिरंगा लगाने लगे? मुसलमान भी?’
‘मैं उस दिन सन्न रह गई थी। उसे पता था कि मेरे पिता सालों तक रक्षा मंत्रालय में सेवा दे चुके हैं। हमारा पूरा बचपन कैंट में बीता है। फिर भी उसके जेहन में ये बात आ गई कि तिरंगा सिर्फ किसी एक पहचान की जागीर है। उस घटना ने मेरी आत्मा को भीतर तक हिला दिया। जैसे किसी ने यह साबित करने की कोशिश की हो कि देशभक्ति भी मजहब देखकर नापी जाती है।’
शीबा थोड़ा रुककर कहती हैं- सालों तक टीवी डिबेट्स में हिस्सा लिया है। तीन तलाक का हमेशा विरोध किया…क्योंकि हम बहस तर्क, फैक्ट, लॉजिक पर करते थे। यही हमारी दुनिया थी।
लेकिन जेएनयू वाली घटना के कुछ समय बाद सब बदल गया।
एक दिन लाइव डिबेट में वही प्रवक्ता- जो कभी मेरे तर्कों की तारीफ करते नहीं थकते थे, अचानक जैसे किसी और ही चेहरे के साथ सामने आए। बहस चल ही रही थी कि उन्होंने कैमरे की ओर देख कर कहा- ‘आपके नाम से ही पता चलता है कि आप टुकड़े-टुकड़े गैंग का हिस्सा हैं।’
‘एक सेकेंड में समझ आ गया कि मेरे सारे लॉजिक, सारे शब्द, मेरी सारी मेहनत…सब कुछ पीछे रह गया है। अब उनके लिए सिर्फ मेरा नाम ही तर्क बन गया था।’
धर्म को लेकर प्रदर्शन पर शीबा एक दिलचस्प बात बताती हैं- हमारे घर वाले आज भी हिंदू-बहुल इलाके में रहते हैं। हमें कभी नहीं लगा कि मुस्लिम मोहल्ले में जाना चाहिए, लेकिन मैं देख रही हूं कि हाल के सालों में मुसलमानों के व्यवहार में भी बदलाव आया है। अब कहीं भी खुलकर नमाज पढ़ने की घटनाएं बढ़ी हैं- जैसे एयरपोर्ट, पार्क में, ट्रेनों में। ये पहले नहीं होता था। धर्म निजी मामला है। रास्ता रोककर इस तरह नमाज पढ़ना, मुझे सही नहीं लगता।
‘मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें ट्रेन के कॉरिडोर को पूरा ब्लॉक करके नमाज पढ़ी जा रही है। ये देखकर हैरानी हुई कि लोगों का रास्ता रोककर इबादत कैसे की जा सकती है।’
अपनी युवावस्था का जिक्र करते हुए शीबा कहती हैं- जब मैं बड़ी हो रही थी, तब बाबरी मस्जिद गिराई गई। माहौल तनावपूर्ण था, लेकिन समाज में इतनी खाई नहीं थी। कर्फ्यू लगता था तो बस इस बात की चिंता होती थी कि कॉलेज का सेशन न छूट जाए। कभी ये एहसास नहीं होता था कि जान का खतरा है, लेकिन आज तो हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा चरम पर है।
पहले हमारे बुजुर्ग कहते थे कि ये देश हमारा है, लेकिन अब वही कहते हैं कि अगर आपकी हैसियत है तो आप देश छोड़कर चले जाइए। बहुत सारे लोग देश छोड़कर जा भी रहे हैं। इतना ही नहीं, कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि अब हम किसी से यह नहीं कह सकते कि देश मत छोड़ो। जो जाना चाहता है, हम उसे कहते हैं कि चले जाओ।
अंत में उम्मीद करती हूं कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व ऐसे बयान दे जो देश को जोड़े। हिंदू-मुस्लिम एकता की बात करे। समाज को डर से नहीं, भरोसे से चलाया जा सकता है।

शीबा जिन्होंने हमेशा कट्टरवाद का विरोध किया, लेकिन अब उन्हें धर्म की वजह से तरह-तरह की आपत्तिजनक बातें सुनने पड़ती हैं।
स्वतंत्र पत्रकार वसीम अकरम त्यागी दिल्ली के शाहीन बाग में रहते हैं। वह कहते हैं, ‘10 नवंबर को दिल्ली लालकिला के बाहर ब्लास्ट के बाद मेरा कमेंट बॉक्स लोगों की गालियों से भरा हुआ है। कई कमेंट ऐसे हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि धमाका करने वाले हमारे लोग हैं, हमारे ही भाई हैं। मेरी पत्नी और बच्चों को भी घसीटा जा रहा है।’
वसीम कहते हैं, ‘इस देश में कोई भी छोटी-बड़ी आतंकी घटना होती है, तो लोगों की उंगलियां एक साथ मुसलमानों की ओर घूम जाती हैं।’
इस तरह धमाका एक कार में हुआ, लेकिन उसका धुआं उन चेहरों तक पहुंच गया है, जिनका उससे कोई लेना-देना नहीं। उन्हें सिर्फ इसलिए टारगेट किया जा रहा है, क्योंकि वे मुसलमान हैं।
वसीम एक पुरानी घटना याद करते हैं। वह बताते हैं, ‘मैं मेरठ में कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मुंबई में 26/11 का आतंकी हमला हुआ। उसी दिन कॉलेज के डायरेक्टर ने मुझे अपने केबिन में बुलाया। अंदर जाते ही उन्होंने बस एक सवाल किया- ‘ये क्या है?’
वसीम उस पल को याद करते हुए ठहर जाते हैं।
मुंबई में जो हुआ था, उसके बारे में वह उतने ही अनजान थे, जितने उनके आसपास बैठे बाकी छात्र।
फिर भी पूछताछ सिर्फ उनसे हुई- सिर्फ उनकी पहचान की वजह से।
मुझे आज भी वह दिन साफ याद है- अन्ना आंदोलन के शोर के बीच एक धमाके से दिल्ली दहल गई थी। सायरनों की आवाजें गूंज रही थीं, लोग टीवी स्क्रीन से चिपके थे। मैं भी उसी उथल-पुथल के बीच खड़ा था।
तभी मेरा एक साथी तेजी से मेरे पास आया। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था- सिर्फ एक अजीब-सी मुस्कान। उसने कहा, ‘आज तुम तो बहुत खुश होगे।’ उसकी आवाज में जो तंज था, वह शब्दों से ज्यादा गहरा चुभ रहा था। जैसे उसके दिमाग में कहीं यह बैठा था कि उर्दू नाम वाले लोग ऐसे धमाकों से खुश होते हैं।
उस पल मुझे पहली बार इतने करीब से महसूस हुआ कि कुछ लोगों के मन में यह जहर कितना पुराना है। उनके लिए सच मायने नहीं रखता है कि- धमाका किसने किया, क्यों किया… यह सब बाद की बातें हैं। पहले से तय हो चुका होता है कि दोष किसका है।
सच तो यह है कि कोई भी घटना हो, अगर उसमें मुसलमान शामिल है, तो लोग पूरे समुदाय को दोषी मानने लगते हैं। घटना की असलियत जानने के बजाय ध्यान इस पर होता है कि दोष किस पर मढ़ा जाए। यह डर और पूर्वाग्रह, समाज के भीतर एक जहर की तरह फैलता है, जो सीधे हमारे निजी जीवन पर असर डालता है।
इतने सालों में हमने ऐसे तंज, ऐसे शक, ऐसे आरोप इतनी बार सुने हैं कि अब ये सब सामान्य लगने लगे हैं।
और यही बात भीतर तक चुभती है कि हम धीरे-धीरे उस दर्द के भी आदी हो गए हैं, जिसे कभी बर्दाश्त करना मुश्किल लगता था।
सोशल मीडिया का एक किस्सा बताता हूं, चार महीने पुराना- लेकिन आज भी उसका दर्द उतना ही ताजा है। एक दिन मैंने एक पोस्ट देखी- एक लड़के ने एक ईरानी महिला के बारे में घिनौना, अपमानजनक कमेंट लिखा था। मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ। मैंने वही प्लेटफॉर्म पर उसे जवाब दिया- और उदाहरण के तौर पर बीजेपी नेता के अश्लील वायरल वीडियो का जिक्र किया।
लेकिन मुझे अंदाजा नहीं था कि इसके बाद क्या होने वाला है। उसके दोस्तों का पूरा झुंड मेरे पीछे पड़ गया। कमेंट बॉक्स गालियों से पट गया- लेकिन यह सिर्फ शुरुआत थी। अचानक उन्होंने मेरी पत्नी की तस्वीरें निकालकर पोस्ट करना शुरू कर दिया, उन पर अश्लील और बेहूदा बातें लिखीं। फिर उन्होंने मेरे बच्चों तक को नहीं छोड़ा- उनकी तस्वीरें डालकर भी फूहड़ टिप्पणियां कीं।
हद तो तब पार हो गई, जब मुझे फोन आने लगे- हर कॉल में सिर्फ गालियां, धमकियां। उस रात मैंने पहली बार महसूस किया कि ऑनलाइन नफरत कैसे आपकी फोन स्क्रीन से निकलकर आपके घर के अंदर तक पहुंच सकती है।
मैंने थाने में शिकायत की। सब कुछ बताया- तस्वीरें, कॉल, धमकियां। लेकिन नतीजा? कुछ नहीं। बस वही पुरानी खामोशी, जो हर बार ऐसे मामलों को निगल जाती है।
यह सब अब हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है- सिर्फ मेरे लिए नहीं, बल्कि मेरे बच्चों, मेरे परिवार और पूरे समुदाय के लिए। बाहर की दुनिया में फैलती नफरत का असर घर की दीवारों तक आने में अब देर नहीं लगती।
एक दिन मेरी छोटी-सी बेटी मेरे पास आई। उसकी आंखों में मासूमियत थी और उसने कहा, ‘अब्बू, क्या हिंदू बुरे होते हैं?’
उस एक लाइन ने जैसे मुझे अंदर से हिला दिया। यह वही बच्ची थी, जो अभी तक दुनिया को रंग-बिरंगी किताबों और कार्टूनों की नजर से देखती थी और आज वह ऐसा सवाल पूछ रही थी- सिर्फ इसलिए कि उसके आस-पास का माहौल और टीवी मीडिया अपनी नफरत उसके कानों तक पहुंचा चुका था।
मैंने उसे तुरंत अपने पास बैठाया और कहा, ‘नहीं बेटा, अच्छा-बुरा तो इंसान होता है। कोई भी कम्युनिटी अच्छी या बुरी नहीं होती। यही बात मुसलमानों पर भी लागू होती है। हम भी इंसान हैं- हममें भी अच्छे-बुरे लोग होते हैं।’
उस पल मेरे लिए यह सिर्फ एक जवाब नहीं था- यह एक जिम्मेदारी थी। मुझे सुनिश्चित करना था कि मेरे बच्चों का मन इस झूठी, जहरीली धारणाओं से कभी न भर जाए। वे दुनिया को नफरत की नजर से नहीं, इंसानियत की नजर से देखें- भले ही दुनिया उन्हें बार-बार अलग तरह से देखने की कोशिश क्यों न करे।
वसीम धीरे-धीरे बोलते हैं, जैसे हर शब्द का बोझ पहले दिल से उतर रहा हो और फिर ज़ुबान पर आ रहा हो। वह कहते हैं, ‘दरअसल ये सब अब सोशल मीडिया पर एक खुला बिजनेस बन चुका है। कुछ लोग जान-बूझकर हिंदू-मुसलमान को भिड़ाने वाले कंटेंट तैयार करते हैं, और यही कंटेंट उनके लिए कमाई का जरिया है। वे इससे लाखों रुपए कमाते हैं। और ये वीडियो सिर्फ वायरल नहीं होते- नफरत फैलाने के लिए बनाए जाते हैं। उनके पीछे पूरी मशीनरी काम करती है।’
लेकिन उनकी सबसे बड़ी चिंता है- इन वीडियो का बच्चों पर असर। वह कहते हैं, ‘मेरे मोबाइल पर अगर ऐसी रील्स आ जाएं, तो मैं उन्हें देखता भी नहीं, लेकिन मैं जानता हूं- मेरे न देखने से कुछ नहीं बदलता। ऐसे वीडियोज पर मिलियन व्यूज आते हैं। लोग देखते हैं, तभी ये कंटेंट बनते हैं।’
उनके शब्दों में एक खामोश पीड़ा है- मानो नफरत सिर्फ बनती नहीं, खरीदी भी जाती है और इसकी कीमत सबसे पहले बच्चों की मासूमियत चुकाती है।
ऐसे माहौल में माता-पिता की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि नफरत सिर्फ सड़कों पर नहीं फैलती, वह बच्चों के दिमाग में भी जगह बनाने लगती है। हमें यह समझना होगा कि कोई भी पूरी कम्युनिटी बुरी नहीं होती। अगर गलतियां होती हैं, तो वे कुछ लोगों की होती हैं, लेकिन उसकी सजा अक्सर उन लाखों लोगों को मिलती है, जिनका उस गलती से कोई लेना-देना ही नहीं होता।
इसीलिए हमें समझदारी, सहानुभूति और इंसानियत का रास्ता चुनना होगा। यही वह रास्ता है, जिससे हम अपने बच्चों को एक बेहतर, साफ-सुथरा, खूबसूरत समाज दे सकते हैं- जहां वे किसी पहचान से नहीं, इंसान होने से पहचाने जाएं।

स्वतंत्र पत्रकार वसीम अकरम त्यागी कहते हैं- 10 नवंबर को दिल्ली लालकिला के बाहर बम ब्लास्ट के बाद सोशल मीडिया पर उनका कमेंट बॉक्स लोगों की गालियों से भरा हुआ है। वह लोगों को समझदारी, सहानुभूति और इंसानियत के साथ रहने की बात करते हैं।
वाहिद शेख को 9 साल जेल में रहना पड़ा
मुंबई के रहने वाले वाहिद शेख कहते हैं- ‘नफरत अब हवा में घुली हुई है। आप इसे हर गली, हर नजर, हर बातचीत में महसूस कर सकते हैं।’
वह कहते हैं, ‘दिल्ली के लालकिले के पास हुआ हालिया धमाका जैसे ही खबरों में आया, शक सबसे पहले हम पर किया गया। शक का यह बोझ इतना भारी होता है कि बिना कुछ किए भी आप खुद को अपराधी समझने लगते हैं।’
‘कभी-कभी लगता है, हमारे नाम, हमारे चेहरे, हमारी दाढ़ी तक को लोग संदिग्ध की तरह पढ़ने लगे हैं और यही सबसे डरावनी बात है।’
वाहिद बताते हैं कि इसी माहौल की वजह से उनके साथ ज्यादती हुई।
‘मुझे 2006 मुंबई ब्लास्ट में गिरफ्तार किया गया था- एक ऐसे गुनाह में, जिसे मैंने किया ही नहीं था। और फिर शुरू हुआ मुझे 9 साल जेल में रखने का अंधेरा। 9 साल… बिना किसी सबूत के, बिना किसी गलती के जेल में रखा गया। बस इसलिए कि मेरा नाम एक मुसलमान का नाम था।’
‘पुलिस ने उस वक्त कितने ही बेगुनाहों को पकड़कर इसी तरह फंसाया।
जेल के दिन याद करते हुए उनकी आवाज भर आती है- ‘जेल में बहुत टॉर्चर किया गया। हमें कहा जाता- ‘मुसलमान देशद्रोही होते हैं, पाकिस्तान के लिए जीते हैं।’ हर रोज यह सुन-सुनकर लगता था जैसे हमारी पहचान ही अपराध बना दी गई है।
वह धीरे से बताते हैं- ’जेल में मुझे नंगा किया जाता। वहां लोग मेरे प्राइवेट पार्ट की तरफ इशारा करके हंसते थे और गालियां देते थे।’
वार्डन तक नमाज पढ़ने नहीं देता था।
वह रुकते हैं, फिर कहते हैं- ‘जांच एजेंसियां मुझे जबर्दस्ती चरमपंथी संगठन PFI से जोड़ना चाहती थीं। मैं बार-बार कहता कि मैंने कोई गलत काम नहीं किया है, लेकिन मेरी बात सुनने वाला कोई नहीं था। जैसे सच से ज्यादा उन्हें कहानी चाहिए थी और उस कहानी का विलेन मैं था।’
‘जेल में टॉर्चर झेलना एक सजा थी, लेकिन उससे भी बड़ी सजा तब मिली जब मीडिया ने मेरी पहचान को उछाल-उछालकर रौंद दिया। टीवी स्क्रीन पर मेरा चेहरा चमकता और नीचे लाल पट्टी में लिखा आता- ‘आतंकवादी का साथी’। मेरा नाम जैश और लश्कर जैसे संगठनों के साथ जोड़ा जाता।’
वह कहते हैं- ‘अदालत में जब जज मेरे केस की फाइल देखते, तो उनके चेहरे पर एक ही भाव होता- उबाऊ। जैसे फैसला पहले ही हो चुका हो। बिना सुने, बिना पढ़े… और ‘अगली तारीख’ दे देते। और मैं? मैं हर तारीख पर अपनी ही बेगुनाही का गवाह बनकर खड़ा रहता।’
‘9 साल… नौ लंबे साल, जहां हर दिन मैंने अपनी सच्चाई को साबित करने की कोशिश की, लेकिन मुझे बेल नहीं मिली।’
जेल से बाहर आया तो सोचा- अब जिंदगी आसान होगी, लेकिन जिंदगी अब भी दर्द और तंज से भरी हुई है।
‘मेरे इलाके में मस्जिद की अजान बंद करवा दी गई। मैं अब समय देखकर, धीमे कदमों से मस्जिद जाता हूं। सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने की मनाही है।’
वह कहते हैं- हाल ही में, 19 साल बाद, बंबई हाईकोर्ट ने खुद कहा- ‘असली गुनहगार आज भी आजाद घूम रहे हैं और बेगुनाहों ने जेल की सजा काटी।’
इस फैसले के बाद हमारे जख्म पर थोड़ी मरहम लगी है, लेकिन जेलों में जो इतना साल सड़े, उसका क्या?
वह धीमी आवाज में बताते हैं- ‘दिल्ली में हालिया ब्लास्ट के बाद तो माहौल और जहरीला हो गया है। लोग मुझे फोन कर-कर के कह रहे हैं- ‘पुलिस बिना वजह गिरफ्तार कर रही है, पूछताछ के नाम पर धमका रही है। बिना नोटिस फोटो खींच रही है… आधार, पैन, बैंक डिटेल ले रही है। जैसे किसी की पहचान ही उसके खिलाफ सबूत बन गई हो।’
फिर वह एक लंबी सांस लेते हैं- ‘मैंने तो अब खुद को घर में कैद कर लिया है। हर कमरे में कैमरे लगा दिए हैं, ताकि अगर कोई आए… तो कम से कम सच रिकॉर्ड हो जाए।’
‘मैं आज भी उम्मीद कर रहा हूं कि एक दिन नफरत खत्म होगी। लोग फिर से भाईचारे के साथ जिएंगे। एक ऐसी दुनिया होगी, जहां किसी को उसके नाम, उसके मजहब या उसके पहनावे के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जाएगा।’

मुंबई के रहने वाले वाहिद शेख को 9 साल जेल में रखा गया। उन्हें अफसोस है कि सिर्फ मुसलमान होने के नाते उनके साथ गलत किया गया। उन्हें एक दिन चीजें ठीक होने की उम्मीद है।
