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वंदे मातरम् विवाद से पश्चिम बंगाल के मुस्लिम क्यों नाराज: बोले- हम नहीं तो क्या बांग्लादेशी गाएंगे, बस जबरदस्ती न हो

वंदे मातरम् विवाद से पश्चिम बंगाल के मुस्लिम क्यों नाराज:  बोले- हम नहीं तो क्या बांग्लादेशी गाएंगे, बस जबरदस्ती न हो


‘वंदे मातरम् भारत के लोग नहीं गाएंगे, तो क्या बांग्लादेशी आकर गाएंगे। मैं खुद वंदे मातरम् कहता हूं।’

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ये बात कह रहे सैयद सलीम कोलकाता के खिदिरपुर मार्केट में रेहड़ी लगाते हैं और वंदे मातरम् गाने के हिमायती हैं। संसद में 8 और 9 दिसंबर को वंदे मातरम् पर बहस हुई। सैयद इस विवाद को गलत मानते हैं।

8 दिसंबर को लोकसभा में PM मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने वंदे मातरम् के टुकड़े कर दिए। मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए। वंदे मातरम् गीत लिखने वाले बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल से थे। दैनिक भास्कर ने इस पर चल रही बहस और इसके राजनीतिक मुद्दा बनने पर पश्चिम बंगाल के लोगों खासकर मुस्लिमों से बात की। पढ़िए ये ग्राउंड रिपोर्ट…

लोकेशन: कोलकाता का खिदिरपुर मुस्लिम बोले- वंदे मातरम् देश का गौरव, गाने में कोई बुराई नहीं खिदिरपुर में 50% से ज्यादा आबादी मुस्लिम है। ये इलाका भवानीपुर विधानसभा सीट में आता है, जहां से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विधायक हैं। खिदिरपुर में बंगाली और हिंदी बोलने वाले मुस्लिम रहते हैं। यहीं सैयद सलीम मिले। वंदे मातरम् के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘इसे गाने में कोई बुराई नहीं है। ये गीत देश का गर्व है।’

प्रियंका गांधी ने संसद में कहा कि वंदे मातरम् पर इसलिए बहस हो रही है क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनाव हैं। इस पर सलीम कहते हैं, ‘अगर किसी पार्टी के पास मुद्दा नहीं होगा, तो वह चुनाव कैसे लड़ेगी। सभी पार्टियां आपस में एक हैं, जनता उनके बीच पिसती है।’

खिदिरपुर में ही चाय की दुकान पर देवव्रत विश्वास मिले। वे कहते हैं, ‘वंदे मातरम् का इस्तेमाल तो सभी पार्टियां करती हैं। इसका चुनाव से क्या लेना-देना। संसद में भले ही इस पर बहस हो रही हो, लेकिन बंगाल के चुनाव में इसका असर नहीं दिखेगा। इस चुनाव में TMC जा रही है।’

यहीं हमें शेख निजामुद्दीन और अवधेश राय मिले। अवधेश राय संसद में वंदे मातरम् पर बहस को सही मानते हैं। वे कहते हैं, ‘पश्चिम बंगाल में जाति और धर्म पर वोट डाला जाता है। हिंदू, हिंदू नेता को और मुसलमान, मुस्लिम नेता को वोट देते हैं।’

वहीं शेख निजामुद्दीन कहते हैं, ‘देश में सभी को आजादी है कि वह अपनी पसंद से खाए-पिए और जिए। प्यार से तो ठीक है, लेकिन किसी से जबरदस्ती वंदे मातरम् न बुलवाया जाए। यह ठीक नहीं है। सभी काम मोहब्बत से हो सकते हैं, न कि थोपकर।’

वंदे मातरम् पर मुसलमानों के विरोध पर शेख निजामुद्दीन कहते हैं, ‘मुसलमान किसी भी अल्फाज का विरोध नहीं करता है। यह सब नेताओं के बनाए मुद्दे हैं। कोई भी बात होती है, तुरंत मुसलमानों पर थोप दी जाती है।’

‘हम कोई चीज खा नहीं सकते, कुछ अल्फाज बोल नहीं सकते क्योंकि ये हमारा निजी मसला है। देश कैसे चलेगा, यह अलग मामला है। कुछ चीजों पर मेरी आंख बंद करने के बाद भी सवाल होगा। इसलिए हमें समझने की जरूरत है कि आखिर वंदे मातरम् गीत के कुछ लफ्ज मुसलमान क्यों नहीं कहना चाहते हैं।’

शेख निजामुद्दीन और अवधेश राय दोस्त हैं, लेकिन वंदे मातरम् पर उनकी राय एकदम अलग है।

शेख निजामुद्दीन और अवधेश राय दोस्त हैं, लेकिन वंदे मातरम् पर उनकी राय एकदम अलग है।

‘BJP ने वंदे मातरम् को मुद्दा बनाया, उसे चुनाव में फायदा मिलेगा’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 में संस्कृत और बांग्ला में वंदे मातरम् लिखा था। 1882 में ये ‘आनंदमठ’ में पहली बार पब्लिश हुआ। कवि रविंद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान इसे पहली बार गाया था।

8 दिसंबर को हुई बहस के दौरान PM मोदी ने बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय को ‘बंकिम दा’ कहा, तो TMC सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने विरोध किया। उन्होंने कहा, ‘बंगाल के लोग इस तरह का कैजुअल लहजा बर्दाश्त नहीं करेंगे।’

संसद में चल रही बहस पर खिदिरपुर के आशुतोष कुमार राउत कहते हैं, ‘वंदे मातरम् भारत और भारतीयता की पुकार है। इसलिए जब भी हम वंदे मातरम् कहते हैं, तो सीधे भारतीय संस्कृति से जुड़ जाते हैं। इसमें राजनीति नहीं है। वंदे मातरम् को 150 साल पूरे हुए हैं। इसका उत्सव पूरे देश में मनाया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में BJP ने ये मुद्दा उठाया है, उसे चुनाव में इसका फायदा मिलेगा।’

‘दिल में वंदे मातरम्, लेकिन जबरदस्ती बर्दाश्त नहीं’ मोहम्मद इरफान अली ग्रेजुएशन के बाद कोलकाता में मोबाइल की दुकान चला रहे हैं। वे आशुतोष के दोस्त हैं। स्कूल में साथ पढ़े हैं। वंदे मातरम् के बारे में पूछने पर इरफान कहते हैं, ‘यह तो अपने-अपने दिल की भावना है। जिसे जो सही लगता है, वह बोलता है। दिल में तो वंदे मातरम् है ही।’

मुस्लिमों के विरोध पर इरफान कहते हैं, ‘मुसलमानों पर लगातार जुल्म हो रहा है। हमारी कौम हर तरह के जुल्म बर्दाश्त कर रही है। इसी तरह अगर वंदे मातरम् जबरदस्ती थोपा जा रहा है, तो इसे भी बर्दाश्त कर लेंगे।’

संसद में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने वंदे मातरम् पर बहस को बंगाल में होने वाले चुनाव से जोड़ दिया। इस पर इरफान कहते हैं, ‘पार्टियां अपने हिसाब से मुद्दे चुनती हैं। हाल में मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का मामला आया। ममता बनर्जी को मुस्लिमों का हितैषी माना जाता है, लेकिन उनकी पार्टी ने ही बाबरी मस्जिद का विरोध किया है।’

‘BJP के दिन बुरे, इसलिए गीता पढ़ा रही’ संसद में बहस के दौरान तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि यहां वंदे मातरम् पर बहस हो रही है, लेकिन क्या BJP उस गीत की लाइनों को सच में पूरा कर रही है। गीत के मुताबिक, लोगों को साफ हवा, पानी मिले, लोगों को बीच भाईचारा रहे, लेकिन देश के अल्पसंख्यकों की क्या स्थिति है, इससे हम सब वाकिफ हैं।

कोलकाता में रहने वाले राइटर सिराज खान बासती भी इस ओर इशारा करते हैं। 7 दिसंबर को BJP ने कोलकाता में गीता पाठ कराया था। इसमें करीब 5 लाख लोग आए थे। सिराज खान बासती इस पर कहते हैं, ‘जब दिन बहुत खराब हो, तो गीता पढ़ा करो, जब सर पर आफताब हो, तो गीता पढ़ा करो।’

वे आगे कहते हैं, ‘BJP के दिन बुरे हैं, इसलिए वह कोलकाता में गीता का पाठ पढ़ा रही हैं। हमारा देश सेक्युलर है, संविधान से चलता है। संविधान में कही भी वंदे मातरम् और जन गण मन गाने की बाध्यता नहीं है, न ही इससे हमारी नागरिकता साबित होती है।’

‘अब PM मोदी की जिद है कि आप वंदे मातरम् गाएंगे, तभी भारतीय हैं, तो यह गलत है। आखिर आजादी के 75 साल बाद ऐसा कौन सा बवाल हो गया कि वंदे मातरम् गाना जरूरी हो गया है।’

यूनिवर्सिटी स्टूडेंट बोले- अब वंदे मातरम् पर बहस का मतलब नहीं हमने वंदे मातरम् पर युवाओं की राय भी जानी। इसके लिए कोलकाता की जादवपुर यूनिवर्सिटी पहुंचे। थर्ड ईयर में पढ़ रहे सप्तक बांग्ला में बीए कर रहे हैं। आनंद मठ के बारे में पूछने पर कहते हैं, ‘यह प्रोपेगैंडा वाली किताब है। इसमें हिंदुत्व का भाव साफ झलकता है, लेकिन जिस वक्त वंदे मातरम् लिखा गया था, तब देश की स्थिति कुछ और थी। हमें आजादी चाहिए थी। अभी इस पर बहस करने का कोई मतलब नहीं है।’

‘संसद में बेरोजगारी और महंगाई पर भी तो हो सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। संसद में बैठे लोग किस तरह की बहस कर रहे हैं। वे आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहते हैं कि इतने साल पहले जो हुआ, उस पर आज बहस कर रहे हैं।’

इंद्रानुज राय बीए इंग्लिश के थर्ड ईयर के स्टूडेंट हैं। वे कहते हैं, ‘बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् में देश को मां के रूप में दिखाया। देश को मां कहा गया, न कि किसी देवी या मूर्ति की कल्पना की गई थी। इस वक्त वंदे मातरम् पर बहस का मतलब है, देश को असली मुद्दों से दूर करना।’

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय पर इंद्रानुज कहते हैं ‘उनकी किताब आनंद मठ में कुछ ऐसी बातें हैं, जिसे आज सांप्रदायिक माना जा सकता है, लेकिन जो चीज जिस वक्त लिखी जाती है, उसका उस समय के परिवेश का भी प्रभाव रहता है। उसे देखकर आज जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। भले ही उसमें कुछ सांप्रदायिक तथ्य थे, इसके बाद भी वे देश की मुक्ति की बात कर रहे थे।’

‘जिस वक्त यह किताब लिखी गई, तब अंग्रेजों ने वर्नाकुलर एक्ट पास किया था। इसके तहत सेंसरशिप हो रही थी। किताब पब्लिश होने के बाद उसमें से कुछ हिस्से हटा दिए गए। अगर वे उस तरह के शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते, तो अंग्रेज किताब पब्लिश नहीं करने देते।’

वहीं, उजान कहती हैं, ‘वंदे मातरम् से ही इंकलाब जिंदाबाद आया है। जिस वक्त बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ लिखा, उनके विचार हिंदुत्ववादी हो सकते हैं, लेकिन उस वक्त की परिस्थिति अलग थी। हमें वंदे मातरम् को आज की स्थिति के हिसाब से देखना चाहिए।’

एमए के स्टूडेंट जाहिद खान आनंदमठ के बारे में कहते हैं, ‘अगर मैं मुसलमान के तौर पर देखूं तो तो मेरा नजरिया अलग होगा और बंगाली के तौर पर अलग। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय हिंदुत्ववादी मानसिकता के थे, लेकिन इससे उनके काम को नकार नहीं सकते।’

‘वंदे मातरम् का विरोध इस बात पर निर्भर करता है कि कोई इसे कैसे देख रहा है। हमें यही देखने की जरूरत है कि परेशानी कहां पर है। इस्लाम में देवी-देवताओं की पूजा नहीं की जाती। वंदे मातरम् के आखिरी पैराग्राफ में देवी दुर्गा का जिक्र है। अगर देश को मां की तरह पेश किया गया, तो सब ठीक है। भले ही वह देवी है या कुछ और। मौलाना आजाद ने भी इसे माना था।’

मौलाना बोले- देश से मोहब्बत, लेकिन ये खुदा नहीं पश्चिम बर्दवान जिले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के जनरल सेक्रेटरी इमाम मौलाना इमदादुल्लाह रशीदी कहते हैं, ‘यह मुल्क हमारे लिए महबूब की तरह है। हमें देश से मोहब्बत है, लेकिन यह हमारा खुदा नहीं है।’

‘कोई अपनी पसंद से वंदे मातरम् गाता है, तो कोई परेशानी नहीं है, लेकिन जिसने कलमा पढ़ा है, अल्लाह पर ईमान रखा है, वह उसे गाने से परहेज करता है। यही बात है, बाकी इसके गाने से हमें कोई एतराज नहीं है। मुल्क का गाना है, अपने ऐतबार से गाया जा सकता है।’

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संसद में वंदे मातरम्, लेकिन बंकिमचंद्र चटर्जी का घर खंडहर

‘वंदे मातरम्‘ लिखने वाले बंकिम चंद्र चटोपाध्याय की पांचवीं पीढ़ी से आने वाले सजल चट्टोपाध्याय ममता सरकार की बेरुखी से नाराज हैं। वे कोलकाता में बंकिम चंद्र के घर की जर्जर हालत के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हैं। पश्चिम बंगाल में जब लेफ्ट की सरकार थी, तब इस मकान को लाइब्रेरी बना दिया गया। तभी मरम्मत भी की गई थी। ममता सरकार के आने के बाद से हालत बदतर हो गई है। पढ़ें पूरी खबर…



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