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‘जबरन साइन, एक फोटो से पुलिस ने 20 केस बनाए’: दिल्ली दंगे के 5 आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- गवाह भरोसेमंद नहीं

‘जबरन साइन, एक फोटो से पुलिस ने 20 केस बनाए’:  दिल्ली दंगे के 5 आरोपी बरी, कोर्ट ने कहा- गवाह भरोसेमंद नहीं


‘पुलिसवाले कहते थे गुनाह कबूल कर लो, वर्ना ऐसा केस लगाएंगे कि बरी नहीं हो पाओगे। थाने में बहुत पीटा। तीन महीने जेल में रहा। बाहर आया, तब भी पुलिस ने बहुत परेशान किया। मुझे कभी भी थाने बुला लेते थे, वहां पता चलता कि मेरे ऊपर एक नया केस है।’

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यह कहते हुए मोहम्मद खालिद की आवाज भर आती है। खालिद दिल्ली के चांद बाग में रहते हैं। पुलिस ने उन्हें फरवरी 2020 में हुए दंगों के दौरान भजनपुरा में पेट्रोल पंप जलाने के मामले में आरोपी बनाया था। फिर एक के बाद एक 19 केस में उनका नाम शामिल हो गया। 11 दिसंबर को दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट ने खालिद समेत 5 आरोपियों को पेट्रोल पंप वाले केस में बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पुलिस इनके खिलाफ कोई सबूत नहीं दे पाई।

दैनिक भास्कर ने बरी होने के बाद मोहम्मद खालिद, अब्दुल सत्तार और हुनैन से बात की। एक आरोपी आरिफ मीडिया में नहीं आना चाहते और तनवीर अभी दूसरे केस में जेल में है। इन सभी को दिल्ली दंगों के करीब एक साल बाद गिरफ्तार किया गया था। इन पर भजनपुरा पेट्रोल पंप पर हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और पत्थरबाजी करने के आरोप लगे थे। हमने उनके वकील से पुलिस की कार्रवाई और कोर्ट में चले केस के बारे में जाना।

पहले किरदार: मोहम्मद खालिद

मोहम्मद खालिद उत्तर-पूर्वी दिल्ली के चांद बाग में सिलाई का काम करते हैं। ये एरिया भी दंगे की चपेट में आया था। 24 फरवरी, 2020 का एक वीडियो है, जिसमें भीड़ पुलिसवालों को घेरकर पत्थर मार रही है। मोहम्मद खालिद को पुलिस ने दिल्ली दंगों के करीब एक साल बाद 11 जनवरी, 2021 को गिरफ्तार किया था।

खालिद कहते हैं, ‘मुझे घर से गिरफ्तार किया था। पुलिसवाले पीटते हुए ले गए थे। थाने में भी पीटा। मुझसे बोलते रहे कि मैं आरोप कबूल कर लूं, तो मैं तीन महीने में बाहर निकल जाऊंगा। हिरासत से बाहर आया, तब कुछ दिन बाद फिर थाने बुलाया गया। पुलिस ने मुझसे 50 सादे कागज पर साइन करवाए थे। इसके बाद मेरे ऊपर 19 केस और दर्ज हो गए।’

खालिद अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हैं। वे कहते हैं कि केस की वजह से काम नहीं कर पा रहा हूं। महीने में 15-16 बार कोर्ट जाना पड़ता है। एक बार आने-जाने में 500 रुपए खर्च होते हैं।’

दूसरे किरदार: अब्दुल सत्तार

अब्दुल सत्तार चांद बाग में समोसे-कचौरी की दुकान लगाते हैं। सत्तार की कहानी भी खालिद जैसी ही है। वे कहते हैं कि जमानत मिलने के बाद पुलिस ने मुझसे कोरे कागज पर साइन करवा लिए थे। इसके बाद एक-एक करके 20 केस का पता चला।

सत्तार कहते हैं, ‘मैंने इससे पहले कभी थाना अंदर से नहीं देखा था। पुलिसवालों ने जैसा कहा, मैंने कर दिया। प्रदर्शन हो रहा था, इसलिए वहां बहुत लोग थे। उनमें मैं भी था। हां, पेट्रोल पंप पर हुई हिंसा के आरोप गलत हैं। मैं उधर गया भी नहीं था। पुलिस वाले जबरन कबूल करने का बोल रहे थे कि मैंने दंगा भड़काया है। हमारे खिलाफ कोई गवाह नहीं है।’

सत्तार आगे कहते हैं, ‘केस की वजह से बहुत परेशान होना पड़ा। महीने में हर केस की हाजिरी के लिए कोर्ट जाता हूं। अभी 19 और केस हैं। ये सभी भजनपुरा इलाके में हुई हिंसा के हैं।’

तीसरे किरदार: हुनैन

बरी हुए एक और आरोपी हुनैन चांद बाग में कचौरी की दुकान चलाते हैं। उन्हें दुकान से ही गिरफ्तार किया गया था। वे कहते हैं, ‘जहां प्रदर्शन हो रहा था, मैं उसी जगह खड़ा था। उसकी फोटो के आधार पर मेरे खिलाफ चार्जशीट दायर की गई।’

‘पुलिस ने बहुत पीटा। वे फोटो दिखाकर कहते थे कि ये तुम्हारी ही है। मैंने उन्हें बताया था कि मैं प्रदर्शन वाली जगह पर खड़ा था। शुरुआत में सिर्फ एक केस था। बाहर आने के बाद मुझसे बहुत सारे खाली पेज पर जबरन साइन करवा लिए। उन्होंने धमकी दी कि साइन करने ही पड़ेंगे।’

हुनैन करीब डेढ़ महीने तक पुलिस हिरासत में रहे। वे कहते हैं कि बाहर आने के बाद कोर्ट से समन आने शुरू हो गए। एक-एक करके हिंसा से जुड़े 20 केस का पता चला। एक ही फोटो के आधार पर पुलिस ने सारे केस बना दिए।

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हमारे खिलाफ जो गवाह थे, उन्हें खुद नहीं पता था कि वे गवाह हैं। कोर्ट में आने के बाद उन्हें पता चलता कि गवाही देनी है।

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पेट्रोल पंप पर हमले का पूरा मामला 24 फरवरी, 2020 को दिल्ली में कई इलाकों पर नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे। उसी दिन भजनपुरा में हिंसा भड़क गई। लोगों ने एक पेट्रोल पंप पर हमला किया और गाड़ियों में आग लगा दी।

25 फरवरी, 2020 को एक पुलिसवाले की शिकायत पर भजनपुरा थाने में केस दर्ज किया गया। FIR में लिखा कि चांद बाग की तरफ से आए सैकड़ों लोगों ने पेट्रोल पंप में आग लगा दी। भीड़ ने आसपास बाइक, कार, दुकानों और मकानों में भी तोड़फोड़ और आगजनी की। FIR में किसी भी संदिग्ध या आरोपी का नाम नहीं लिखा गया।

दंगों के एक साल बाद केस के सिलसिले में जनवरी-फरवरी 2021 में अलग-अलग तारीखों पर खालिद और बाकी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। ये केस 7 मार्च 2020 को भजनपुरा पुलिस स्टेशन में तरुण नाम के एक शख्स की शिकायत पर दर्ज हुआ था।

तरुण की शिकायत पर दर्ज FIR में किसी आरोपी का नाम नहीं था। शिकायत में तरुण ने लिखवाया था कि 24 फरवरी, 2020 को दोपहर करीब 1.45 बजे मैं बाइक में पेट्रोल डलवाने भजनपुरा पेट्रोल पंप पर गया था। उसी वक्त चांद बाग की तरफ से पथराव होने लगा। कुछ लड़के लाठी-डंडे लेकर पंप की तरफ आए।

वे CAA/NRC के विरोध में नारे लगा रहे थे। उन्होंने गाड़ियों में तोड़फोड़ कर आग लगा दी। मेरी बाइक भी जला दी। मुझे लाठी-डंडों से पीटा। मेरे सिर, पैर और हाथ में चोट लगी। मैं वहीं बेहोश हो गया। होश आया तो पिताजी मुझे सेंट स्टीफन अस्पताल ले जा रहे थे।

भजनपुरा के इसी पेट्रोल पंप को भीड़ ने आग लगा दी थी। हालांकि पुलिस ने जिन 5 लोगों को आरोपी बनाया, सभी बरी हो गए।

भजनपुरा के इसी पेट्रोल पंप को भीड़ ने आग लगा दी थी। हालांकि पुलिस ने जिन 5 लोगों को आरोपी बनाया, सभी बरी हो गए।

दंगों के डेढ़ साल से ज्यादा समय बाद, 2 दिसंबर 2021 को तरुण ने भजनपुरा थाने में आरोपियों की पहचान की। उसने पुलिस को बयान दिया, ‘मैं अपने केस में मुआवजा न मिलने की वजह पूछने थाने आया था। वहां पांच लोगों से पुलिस बात कर रही थी। ये पांचों लोग मेरे साथ मारपीट करने में शामिल थे।’

ट्रायल के दौरान तरुण ने कहा कि मैं किसी आरोपी को न तो पहचान सकता हूं और न इनकार कर सकता हूं क्योंकि मुझे उनके चेहरे याद नहीं हैं। दिल्ली पुलिस ने इस केस को साबित करने के लिए तरुण समेत कुल 16 गवाहों को शामिल किया था। हालांकि, ट्रायल के दौरान गवाहों के बयान विरोधाभासी पाए गए।

कोर्ट ने कहा- केस सिर्फ तीन गवाहों पर टिका, दो भरोसेमंद नहीं 11 दिसंबर को कड़कड़डूमा कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज प्रवीण सिंह ने फैसले के दौरान पुलिस की जांच पर कई सवाल उठाए। इस मामले में गवाह बनाए गए तीन पुलिसवालों ने शुरुआती जांच में आरोपियों को पहचानने की बात कही थी। क्रॉस एग्जामिनेशन में उन्होंने आरोपियों को पहचानने से इनकार कर दिया।

जज ने कहा कि ये पूरा केस तीन गवाहों पर टिका हुआ है। इनमें से दो पर भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों घटना के वक्त पुलिस स्टेशन से दूसरी जगह (नूर-ए-इलाही) के लिए निकले थे।

कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने मैकेनिकल तरीके से केस की जांच की है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि पहली गिरफ्तारी वाले केस को सॉल्व करने के लिए आरोपियों को इस मामले में झूठा फंसाया गया। जांच अधिकारी ने जली बाइक की पहचान करने की भी कोशिश नहीं की। इससे कम से कम ये साबित होता कि शिकायत करने वाले की बाइक जलाई गई है।

हमने नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के DCP आशीष मिश्रा को ई-मेल के जरिए भजनपुरा केस से जुड़े सवाल भेजे हैं। उनकी तरफ से जवाब नहीं मिला है। जवाब आने पर रिपोर्ट में अपडेट करेंगे।

वकील बोले- पुलिस की जांच हास्यास्पद आरोपियों की तरफ से केस लड़ रहे सीनियर वकील अब्दुल गफ्फार बताते हैं कि कोर्ट ने इस मामले में साफ कहा है कि गवाहों के बयान भरोसा करने लायक नहीं हैं। उनमें काफी विरोधाभास हैं।

गफ्फार कहते हैं, ‘पुलिस की जांच हास्यास्पद है। जांच अधिकारी ने जनवरी 2021 में सबसे पहले इन पांचों आरोपियों को FIR नंबर-62 में गिरफ्तार किया था। उसी अधिकारी ने आरोपियों को जून और दिसंबर में गिरफ्तार किया। मजेदार है कि इस केस में गवाह भी वही हैं, जो पहले केस में हैं। घटना वाली जगह से पुलिस कोई सबूत तक नहीं जुटा पाई। ’

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पेट्रोल पंप के कर्मचारी ने बयान दिया था कि हंगामे और हिंसा की आशंका की वजह से सुबह 11:30 बजे ही पंप पर पेट्रोल देना बंद कर दिया था। वहीं तरुण ने बताया था कि वे पेट्रोल लेने के लिए दोपहर 1.45 बजे लाइन में लगे थे। उसे किसी और जगह चोट लगी थी।

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‘पुलिस ने गलत तरीके से कहानी बनाई थी। इसके अलावा तरुण की मेडिकल रिपोर्ट कहती है कि पिता ने उसे एडमिट करवाया। वहीं, डिस्चार्ज समरी बताती है कि उसे पुलिसवाले अस्पताल लेकर आए। चोट किस तरह की है, इसे साबित करने के लिए पुलिस ने डॉक्टर से बात नहीं की।’

गफ्फार कहते हैं, ‘भजनपुरा में तब जितनी भी हिंसा या आगजनी की घटनाएं हुईं, पुलिस ने सारे केस में इन लोगों का नाम जोड़ दिया। 17 केस इन सभी आरोपियों के खिलाफ हैं। बाकी कुछ के खिलाफ एक या दो केस ज्यादा भी हैं।’

अब्दुल गफ्फार दिल्ली दंगों से जुड़े करीब 100 केस देख रहे हैं। वे कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में दिल्ली पुलिस ने सही तरीके से जांच नहीं की है। जो सबूत जुटाए जा सकते थे, वे नहीं जुटाए गए। मैं 100 केस देख रहा हूं, इनमें लगभग 40 में फैसला आ चुका है।’

गफ्फार कहते हैं, ‘कुछ केस में पुलिस के सबूत भरोसेमंद नहीं थे, कुछ मामलों में पुलिस की चार्जशीट को कोर्ट ने इस लायक नहीं समझा कि उस पर ट्रायल किया जाए। ऐसे में लोगों को ट्रायल से पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया। मर्डर जैसे मामलों में कोर्ट ने आरोपियों को डिस्चार्ज किया है। ऐसे केस में भी पुलिस पूरी तरह फेल रही।’

दंगों के 6 साल, आरोपी लगातार बरी हो रहे ये पहली बार नहीं है, जब दिल्ली दंगों से जुड़े केस में लोग बरी या डिस्चार्ज हुए हों। खजूरी इलाके में एक ऑटो ड्राइवर की मौत से जुड़े मामले में कोर्ट ने 18 मार्च, 2025 को 11 आरोपियों को डिस्चार्ज कर दिया था। पुलिस की चार्जशीट फाइल होने के बाद भी कोर्ट को इन लोगों के खिलाफ केस चलाने के लिए सबूत नहीं मिले। फैसला सुनाते हुए जज पुलस्त्य प्रमाचला ने कहा था कि ये लोग विक्टिम की मदद करने आए थे।

इसी तरीके से सुदामापुरी इलाके में मौजूद अजीजिया मस्जिद के पास हुई हिंसा मामले में भी 6 लोगों को अगस्त में बरी कर दिया गया। फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ झूठा मामला गढ़ा। पुलिस की चार्जशीट में कई बयान विरोधाभासी थे।



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