मेरा बेटा घर से बैढ़न तक ही गया था। वह रात में वापस लौटने वाला था, लेकिन पता नहीं था कि अब वह कभी नहीं आएगा। दो साल पहले उसकी शादी हुई थी। एक साल का बेटा है। अब उसके परिवार का क्या होगा? ये सवाल सिंगरौली जिले के कमला प्रसाद शाह का है। जिनके 25 साल के बेटे पंकज की 8 जनवरी को सड़क हादसे में मौत हो गई। घर का इकलौता कमाने वाला सदस्य पंकज एक कोयला डंपर की चपेट में आ गया था। सिंगरौली में ऐसे हादसे बेहद कॉमन हो चुके हैं। यहां 10 से ज्यादा कोल माइंस और 10 थर्मल पावर प्लांट हैं। हर दिन हजारों की संख्या में भारी-भरकम डंपर और ट्रेलर, कोयला और राख लेकर संकरी और जर्जर सड़कों से गुजरते हैं। ये अब सड़क हादसों का कारण बन गए हैं। आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि हर साल 200 लोग सड़क हादसों में जान गवां रहे हैं। लगातार हो रहे सड़क हादसे और लोगों की मौत को देखते हुए सिंगरौली के समाजसेवी राजेश सोनी ने हाईकोर्ट में एक याचिका भी लगाई है। इस याचिका पर अभी सुनवाई जारी है। आखिर कैसे सिंगरौली की सड़कों पर डंपर और भारी वाहन यमदूत बनकर दौड़ रहे हैं? पढ़िए रिपोर्ट… दो केस से समझिए हर घर का दर्द और बेबसी केस-1: बेटा सब्जी लेने गया था, वापस नहीं लौटा
पिछले साल 30 नवंबर को सोनमती के बेटे सूरज सिंह की भी एक कोयला डंपर की टक्कर से मौत हो गई थी। सोनमती रोते हुए कहती हैं, ‘मेरा बेटा अपने चाचा के साथ बाजार सब्जी लेने गया था। जब वो दोनों लौट रहे थे, तभी पीछे से कोयले वाले डंपर ने उनकी गाड़ी में टक्कर मार दी। मेरा बेटा तो वहीं तुरंत ही खत्म हो गया। मेरे देवर को भी चोटें आईं। आए दिन यहां कोयला गाड़ियों से कोई न कोई हादसा होता रहता है, लेकिन सरकार और प्रशासन को इस बात से कोई मतलब नहीं। हम जैसे लोग बस अपने बच्चे खो देते हैं। केस-2: डंपर ने सामने से टक्कर मारी, बाल-बाल बचे
सिंगरौली के ही आसाराम वैश्य का अनुभव बताता है कि यह खतरा हर पल, हर सड़क पर मौजूद है। वे बताते हैं, मैं कुछ महीने पहले अपने बच्चों को डीएवी स्कूल छोड़ने जा रहा था। सड़क के एक तरफ 10-15 कोयला डंपर लाइन से खड़े थे। मैं अपनी साइड से जा रहा था, लेकिन तभी सामने से एक और कोयला डंपर आ गया। रास्ता ही नहीं बचा तो मैंने गाड़ी रोक दी। मैंने डंपर वाले से कहा कि भाई, यहां से कैसे निकल सकते हैं, तुम अपनी गाड़ी पीछे कर लो। लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी और मेरी गाड़ी को टक्कर मारते हुए निकल गया। गाड़ी में बच्चे भी थे, हम बुरी तरह घबरा गए। जब आसाराम इसकी शिकायत करने कोल यार्ड गए, तो उन्हें मदद के बजाय गालियां और धमकियां मिलीं। उन्हें यह कहकर भगा दिया गया कि तुम ही लोगों की वजह से बिजली उत्पादन कम हो रहा है। पुलिस थाने में भी उनकी सुनवाई नहीं हुई। आसाराम कहते हैं, मैंने दीपावली में ही गाड़ी खरीदी थी। मेरा नुकसान तो हुआ, लेकिन इस बात का सुकून था कि हम जिंदा बच गए। सिंगरौली की सड़कें क्यों बनीं ‘किलिंग जोन’? मौतों से गुस्साई भीड़ ने किया पथराव, गाड़ियों में आग लगाई प्रशासन की उदासीनता और लगातार हो रही मौतों से परेशान सिंगरौली के लोग कई बार सड़कों पर उतर चुके हैं। कई बार ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, लेकिन जब सब्र का बांध टूटा तो ये हिंसक रूप भी ले चुका है। 14 फरवरी 2025: इस दिन अमिलिया के जंगल में एक ट्रेलर ने बाइक को टक्कर मार दी, जिससे बाइक सवार रामलालू यादव और रामसागर प्रजापति की 20 फीट गहरी खाई में गिरकर मौके पर ही मौत हो गई। इस घटना के बाद लोगों का गुस्सा भड़क उठा। गुस्साई भीड़ ने 5 बसों और 3 ट्रकों को आग के हवाले कर दिया। यह आगजनी बधोरा गांव में एसआर पावर कंपनी के गेट के पास हुई, और जिन वाहनों में आग लगाई गई, वे अडानी की कोलमाइंस और पावर कंपनी के थे। हालात इतने बेकाबू हो गए कि 200 से ज्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात करना पड़ा। जून 2025: एक और सड़क हादसे में 22 वर्षीय विनय पांडे की ट्रक की टक्कर से मौत हो गई। विनय अपने घर के इकलौते बेटे थे। इस मौत के बाद जनआक्रोश फिर फूट पड़ा। स्थानीय लोगों ने बैढ़न-सीधी मुख्य मार्ग पर शव रखकर 11 घंटे तक चक्काजाम किया, जिससे पूरे क्षेत्र में कर्फ्यू जैसे हालात बन गए। भीड़ ने पथराव किया और ट्रक में आग लगाने की भी कोशिश की। सिंगरौली से 4 हजार करोड़ की कमाई, फिर भी टूटी सड़कें जब जिला प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक किसी ने सुध नहीं ली, तो सिंगरौली के सामाजिक कार्यकर्ता राजेश सोनी ने इस लड़ाई को जबलपुर हाईकोर्ट तक ले जाने का फैसला किया। उन्होंने सिंगरौली में हो रहे सड़क हादसों के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की है। राजेश सोनी कहते हैं, सिंगरौली जिले में लगातार सड़क दुर्घटनाओं में मौतें हो रही हैं और इसका मुख्य कारण शहर की मुख्य और पतली सड़कों पर भारी संख्या में कोयला और राख के वाहनों का दौड़ना है। यह जानते हुए कि सिंगरौली जिले से सालाना 4000 करोड़ का राजस्व आता है, फिर भी इन भारी वाहनों के लिए अलग सड़क का निर्माण नहीं किया जा रहा है। जब शासन-प्रशासन सोया रहा, तो हमने उच्च न्यायालय में एक रिट पिटीशन लगाई है। मौतों के बीच कलेक्टर और ट्रैफिक की अपनी दलीलें एक तरफ आए दिन होने वाले सड़क हादसों को लेकर लोग गुस्से में हैं, तो वहीं प्रशासन आंकड़ों में सुधार का दावा कर रहा है। सिंगरौली जिले के यातायात प्रभारी दीपेंद्र कुशवाहा बताते हैं, 2024 की तुलना में 2025 में सड़क हादसों में हुई मौतों में लगभग 9% की गिरावट आई है। दुर्घटनाओं में 11% और घायलों की संख्या में 16% की कमी आई है। मध्य प्रदेश के अंदर सड़क हादसों में कमी लाने वाले टॉप 6 जिलों में हम शामिल हैं। इसका मतलब है कि हम सड़क हादसों को रोकने के लिए काम कर रहे हैं। जिला कलेक्टर गौरव बैनल भी कार्रवाई का आश्वासन देते हैं। वे कहते हैं, रोड एक्सीडेंट कम करने के लिए हम लगातार कंपनियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। एक अलग बायपास की भी योजना है। वहीं हम प्रॉपर निगरानी के लिए एएनपीआर (ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन) और जेडटीएमसी (जोनल ट्रैक मैनेजमेंट सिस्टम) जैसी तकनीक भी ला रहे हैं।
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