साल 1990। अगस्त का महीना। ज्योति बसु की लेफ्ट सरकार ने बस का किराया बढ़ा दिया। विरोध में लोग सड़कों पर उतर आए। भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस ने गोली चलाई और तीन लोग मारे गए।
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कांग्रेस ने हड़ताल का ऐलान किया। दक्षिण कोलकाता के हाजरा इलाके से मार्च निकालने की जिम्मेदारी मिली बंगाल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी को।
‘माय अनफॉरगेटेबल मेमोरीज’ में ममता लिखती हैं- ‘हाजरा में CPI(M) कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी पहले से मौजूद थी। जैसे ही हम आगे बढ़े, उन्होंने हमला कर दिया। सबसे पहले लालू आलम ने मेरे सिर पर लोहे की रॉड मारी। मैं खून से भीग गई। फिर कई और वार हुए। होश आया तो अस्पताल में थी। डॉक्टरों को लग रहा था कि मौत तय है, लेकिन मैं बच गई।’
कुछ दिन बाद ममता फिर रैलियों में नजर आईं। सिर पर पट्टियां और उनके ऊपर कपड़ा बांधे। उस तस्वीर ने बंगाल की राजनीति में एक नई ‘दीदी’ को जन्म दिया।
इस घटना के 8 साल बाद 1998 में ममता ने कांग्रेस छोड़ दी और 1998 में तृणमूल कांग्रेस यानी TMC बनाई। 2011 में TMC ने 34 साल से जारी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका और तब से बंगाल की सत्ता पर ममता बनर्जी का ही राज है।
जैसे बंगाली रसुगुल्ले की चाशनी कपड़ों पर गिर जाए, तो जल्दी छूटती नहीं है। वैसे ही बंगाल में एक बार जो सरकार में आता है, सालों तक टिकता है।
आजादी के बाद से पश्चिम बंगाल में सिर्फ तीन पार्टियों ने सत्ता संभाली है। कांग्रेस ने 20 साल, CPI(M) ने 34 साल और TMC ने 15 साल। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है।
आज के इलेक्शन एक्सप्लेनर में इसी पैटर्न से जुड़े 2 सवालों को समझेंगे…
पहला- आखिर बंगाल में जो आता है, लंबे वक्त तक छा क्यों जाता है?
दूसरा- कांग्रेस, लेफ्ट, TMC के बाद क्या बंगाल में अब BJP की बारी है?
पहले सवाल का जवाब इन 5 वजहों में छिपा है…
वजह-1: बंगाल में सबसे बड़ा कैडर बेस
- आजादी के बाद देश के 12 राज्यों में कांग्रेस लगातार 15 साल तक सत्ता में रही। उनमें से एक पश्चिम बंगाल भी था। माना जाता है कि तब लोग कांग्रेस के आजादी दिलाने की कोशिशों के लिए एहसानमंद थे।
- बंगाल का सोशल स्ट्रक्चर दो हिस्सों में बंटा है। पहला- भद्रलोक, यानी जमींदार और शिक्षित मध्यवर्ग। वहीं दूसरा है- भूमिहीन किसान और मजदूर। कांग्रेस ने भद्रलोक के जरिए राज्य में पकड़ बनाई।
- लेकिन यह पकड़ टॉप-टू-बॉटम थी, यानी ऊपर से नीचे की ओर। इसीलिए जब लेफ्ट ने जमीनी काम शुरू कर मजदूरों, किसानों और गरीबों को लामबंद किया, तो कांग्रेस टिक नहीं पाई। 1977 के बाद से कांग्रेस बंगाल की सत्ता में नहीं लौटी।
- लेफ्ट सरकार के दौरान बंगाल में ‘कैडर राज’ शुरू हुआ। हर गांव, मोहल्ले, बूथ पर पार्टी पहुंची। कार्यकर्ता नियुक्त हुए, जो वोटरों की मांगें सीधे कोलकाता तक पहुंचाते।
- कहा जाता है कि गांव-शहर में मौजूद पार्टी ऑफिस, सरकार से ज्यादा ताकतवर बन गया था। राशन कार्ड, सड़क, नौकरी, जमीन से लेकर पुलिस केस, झगड़े तक सब पार्टी तय करती।
- 2011 में TMC आई, तो उसने लेफ्ट की इसी मशीनरी को हथिया लिया। लेफ्ट ने आरोप लगाया था कि 2011 के चुनाव के बाद TMC ने 1000 से ज्यादा दफ्तरों पर कब्जा कर लिया।

2011 में जीत के बाद TMC ने लेफ्ट के कई कार्यालयों पर कब्जा कर लिया था। ऐसे ही एक कार्यालय को वापस हासिल करने के बाद लेफ्ट पेंटिंग करवा रहा है।
- लोकल क्लब, पाड़ा के नेताओं को TMC ने रातोंरात पार्टी में शामिल कर लिया। सत्ता में आकर ममता ने लोकल क्लबों को सरकारी फंड और पावर देकर अपना वफादार बना लिया।
- आज भी कहा जाता है कि TMC पार्टी और कैडर की मंजूरी के बिना सरकार कोई फैसला नहीं करती।
कोलकाता के सीनियर जर्नलिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं कि कोई पार्टी जब लंबे समय तक सत्ता में रहती है। तो उसका खासकर गांवों में संगठन मजबूत हो जाता है। पहले इसका फायदा लेफ्ट को मिला और आज TMC को।
वजह-2: दिल्ली बनाम बंगाल का नैरेटिव
- बंगाल के लोगों के दिल में एक बात गहरी बैठी है- हम बंगाली हैं और दिल्ली हमें समझती नहीं।
- लेफ्ट ने इसी भावना को राजनीतिक हथियार बनाया। 1980 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद ज्योति बसु ने नैरेटिव बनाया कि दिल्ली कभी भी हमारी चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर सकती है।
- हल्दिया पेट्रोकेमिकल्स से लेकर बकरेश्वर थर्मल पावर स्टेशन तक। केंद्र के ‘भेदभाव’ की हर मिसाल गिनाई गई। 34 साल यही ढोल पीटा गया।
- ममता बनर्जी ने इस नैरेटिव को एक कदम और आगे ले जाकर इसे अपने टीएमसी नेताओं के भ्रष्टाचार के आरोपों से बचाव की ढाल बना लिया।
- CBI जब पुलिस कमिश्नर के घर पहुंची, तो ममता ने धरना दिया। मनरेगा और पीएम आवास का फंड रोकने का आरोप लगाया। इसे ‘आर्थिक नाकेबंदी’ करार दिया।
- 2021 में बीजेपी की बढ़ती ताकत के जवाब में ममता ने चुनाव को ‘बंगाली बनाम बाहरी’ में बदल दिया और यह काम आया।

3 फरवरी 2019 को धरने पर बैठीं सीएम ममता बनर्जी के साथ कोलकाता पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार (सबसे बाईं ओर)।
सीनियर जर्नलिस्ट प्रभाकर मणि तिवारी बताते हैं कि पश्चिम बंगाल के लोगों के दिमाग में ‘बंगाली अस्मिता’ सबसे अहम है। वे अपना हीरो बनाना जानते हैं। चाहे वो रविंद्रनाथ टैगोर हों या सुभाष चंद्र बोस। या फिर कोई हीरो या खिलाड़ी।’
वजह-3: पर्सनैलिटी कल्ट यानी चेहरे को चुनता है बंगाल
बंगाल के चुनाव हमेशा एक चेहरे के इर्द-गिर्द घूमते हैं…
- डॉ. बिधानचंद्र रॉय: महात्मा गांधी और नेहरू के पर्सनल डॉक्टर रहे। ‘आधुनिक बंगाल के निर्माता’ कहलाए। बिधाननगर, कल्याणी, दुर्गापुर जैसे शहर, IIT खड़गपुर जैसी संस्थाएं उनकी विरासत हैं। उनके चेहरे पर कांग्रेस ने 14 साल राज किया।
- ज्योति बसु: एक स्टेट्समैन जो किसी व्यक्तिगत कल्ट में यकीन नहीं करते थे, फिर भी उनका कल्ट बन गया। 1996 में PM का ऑफर मिला, पार्टी में विवाद हुआ तो ठुकरा दिया। उनके चेहरे पर लेफ्ट ने लगातार पांच चुनाव जीते। 23 साल से ज्यादा CM रहे।
- ममता बनर्जी: हवाई चप्पल, सूती साड़ी और सीधा आम आदमी से कनेक्शन। लोग TMC को नहीं, ‘दीदी’ को वोट देते हैं। 2021 में नारा दिया- ‘बांग्ला निजेर मेयेकेई चाये’ यानी बंगाल अपनी बेटी चाहता है। तीन बार लगातार सरकार बनाई।

2007 में एक जॉइन्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ज्योति बसु और ममता बनर्जी।
पश्चिम बंगाल की सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं, ‘पश्चिम बंगाल में सारे चुनाव चेहरे पर लड़े जाते हैं। आजादी के बाद कांग्रेस के पास आंदोलन से निकले नेता थे, जिसके चलते कांग्रेस ने 20 साल तक सत्ता संभाली। फिर लेफ्ट के ज्योति बसु का कल्ट बना। इसके बाद ममता बनर्जी TMC का चेहरा हैं। पिछले कुछ चुनावों से ममता के सामने लेफ्ट या कांग्रेस के पास कोई चेहरा नहीं है।’
वजह-4: वोटबैंक की सटीक चुनावी इंजीनियरिंग
- कांग्रेस ने भद्रलोक को साधा, लेकिन बहुसंख्यक गरीब आबादी को नहीं।
- लेफ्ट ने जाति की जगह वर्ग को साधा। 1978 में ऑपरेशन बर्गा के तहत 15 लाख बटाईदारों को 11 लाख एकड़ जमीन बांटी, जिनमें आधे से ज्यादा दलित, आदिवासी और मुस्लिम थे।
- ममता ने इससे भी आगे जाकर दो नए वोटबैंक बनाए- महिलाएं और मुस्लिम।
- कन्याश्री, रूपश्री, लक्ष्मीर भंडार, स्वास्थ्य साथी जैसी योजनाओं से महिला वोटबैंक पक्का किया। राज्य की 27% मुस्लिम आबादी के लिए 10 हजार मदरसों को मान्यता और ‘ऐक्यश्री’ स्कॉलरशिप। आज TMC के विधानसभा में 39 महिला और 43 मुस्लिम विधायक हैं।
वजह-5: बिखरा हुआ विपक्ष
- कांग्रेस के दौर में विपक्ष बिखरा हुआ था। CPI(M), फॉरवर्ड ब्लॉक, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी सब अलग-अलग चुनाव लड़ते थे, लेकिन उनका संगठन और पैठ दोनों ही कमजोर थी। उस वक्त ऐसा कोई एकजुट अल्टरनेटिव नहीं था, जो कांग्रेस को चुनौती दे सके।
- फिर जब वामपंथी पार्टियों ने एकजुट होकर लेफ्ट फ्रंट बनाया तो कांग्रेस अकेली पड़ गई और पिछड़ती चली गई।
- 1967 में कद्दावर नेता अजय मुखर्जी ने कांग्रेस छोड़ अपनी पार्टी ‘बांग्ला कांग्रेस’ बना ली। 1997 में कद्दावर नेता ममता बनर्जी की कांग्रेस से अनबन हो गई। जनवरी 1998 तक उन्होंने अपनी पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ बना ली।
- TMC के बनने से कांग्रेस काफी कमजोर हो गई और चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय हो गया। 2001 में TMC ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और उसे 30.7% वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 8%, यानी TMC को 22% ज्यादा।
- 2011 आते-आते मुकाबला ‘लेफ्ट बनाम TMC’ हो गया और कांग्रेस ने TMC से अलायंस कर लिया। इस चुनाव में ममता ने 184 सीटों के साथ सरकार बनाई।
- 2016 के चुनाव से लेफ्ट और कांग्रेस के बनाए गैप को बीजेपी ने भरा और अगले ही चुनाव में सिर्फ TMC और बीजेपी के बीच टक्कर हुई।
सीनियर जर्नलिस्ट शिखा मुखर्जी बताती हैं, ‘बंगाल के ज्यादातर चुनाव बाइपोलर, यानी दो पार्टियों के बीच हुए हैं। जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब लेफ्ट विपक्ष में था। फिर लेफ्ट सत्ता में आई, तो कांग्रेस विपक्ष में चली गई। TMC के आने के बाद भी पहले लेफ्ट, फिर कांग्रेस विपक्ष में बैठी। अब बीजेपी उसे टक्कर दे रही है।
क्या कांग्रेस, लेफ्ट, टीएमसी के बाद अब बंगाल में बीजेपी की बारी है?
2016 में बीजेपी के पास बंगाल विधानसभा में सिर्फ 3 सीटें थीं। 2021 में 77 हो गईं। वोट शेयर 10% से 38% तक पहुंचा। यह छलांग कैसे लगी?
पांच चीजें काम आईं- लेफ्ट-कांग्रेस का वोट बीजेपी की तरफ शिफ्ट होना, हिंदुत्व कार्ड, मतुआ समुदाय को CAA का वादा, RSS का जमीनी नेटवर्क और सुवेंदु अधिकारी जैसे TMC के बड़े नेताओं का पार्टी में आना।

सुवेंदु अधिकारी की कहानी तो बंगाल की राजनीति में अलग ही अध्याय है। नवंबर 2020 में ममता के सबसे करीबी सिपहसालार ने इस्तीफा दिया। दिसंबर में अमित शाह ने मेदिनीपुर के मंच पर उनके गले में बीजेपी का गमछा डाला। TMC ने उन्हें ‘मीरजाफर’ कहा। ममता ने सीधे उनके गढ़ नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान किया।
सुवेंदु ने जवाब दिया- अगर 50,000 वोटों से नहीं हराया, तो राजनीति छोड़ दूंगा।
2 मई 2021 को गिनती हुई। 16वें राउंड तक ममता 800 वोट आगे थीं। 17वें राउंड में पासा पलट गया। सुवेंदु 1956 वोटों से जीत गए। पहली बार किसी ‘सिटिंग CM’ ने अपनी सीट गंवाई।
अब 2026 में सुवेंदु ने ममता के गढ़ भवानीपुर से पर्चा भरा है।

चुनाव प्रचार के दौरान एक रैली में पीएम नरेंद्र मोदी और सुवेंदु अधिकारी।
बीजेपी की गणित सीधा है- 2021 में BJP ने 294 में से 77 सीटों जीतें थी और 75 सीटें सिर्फ 10% से कम मार्जिन से हारी थी। 2026 में इस बार BJP अगर TMC के 5% वोट शेयर भी अपने पाले में कर ले, तो मोटा-मोटी 77+75 यानी 152 सीटें जीत सकती है। यानी बहुमत के 148 सीटों से 4 ज्यादा।
लेकिन रास्ता आसान नहीं है। सेफोलॉजिस्ट से नेता बने योगेंद्र यादव का आकलन है कि 2021 के मुकाबले जमीन पर बीजेपी कमजोर हुई है और SIR के बावजूद बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब नहीं होगी।
बंगाल का इतिहास बताता है कि जब भी कोई पार्टी यहां सत्ता में आई, उसने दशकों तक राज किया। कांग्रेस 20 साल, लेफ्ट 34 साल।
सीनियर जर्नलिस्ट सुमन भट्टाचार्य कहते हैं- ‘बंगाल के लोग बेहद वफादार होते हैं। एक बार पसंद कर लिया तो लंबे समय तक जिताते हैं। अगर बीजेपी एक बार ध्रुवीकरण में सफल हो गई, तो अगले 15-20 साल तक वह जीतती रह सकती है।’
लेकिन यह ‘अगर’ बड़ा है।
बंगाल में हर जीतने वाली पार्टी की पांच खूबियां रही हैं- मजबूत कैडर, बंगाली अस्मिता का नैरेटिव, एक करिश्माई चेहरा, सटीक वोटबैंक, और बिखरा हुआ विपक्ष। बीजेपी के पास अभी इनमें से कुछ हैं, कुछ नहीं।
सुवेंदु जैसा चेहरा है। RSS का नेटवर्क है। हिंदुत्व का नैरेटिव है। लेकिन गहरा जमीनी कैडर अभी भी TMC के मुकाबले कमजोर है। बंगाली अस्मिता का नैरेटिव अभी भी ममता के पास है। और ममता खुद एक ऐसा ‘पर्सनैलिटी कल्ट’ हैं, जिसका कोई विकल्प बीजेपी के पास नहीं।
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1952 में पहली बार पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए। 238 में से 150 सीटें कांग्रेस ने जीतीं। लेफ्ट फ्रंट को 41 और जनसंघ वाले राइट ब्लॉक को 13 सीट मिलीं। पं. नेहरू और महात्मा गांधी के पर्सनल डॉक्टर रहे बिधान चंद्र रॉय मुख्यमंत्री बने। लगातार 20 साल और कुल 25 साल कांग्रेस सरकार में रही, लेकिन 1977 के बाद वो अपना सीएम नहीं बना पाई। अब कोई विधायक भी नहीं है। वोट शेयर भी सिमटकर 3% से कम हो गया। पूरी खबर पढ़िए…
