पश्चिम बंगाल में पहली बार बीजेपी की सरकार होगी। दोपहर 1 बजे तक के रुझानों में बीजेपी 184 सीटों के साथ बहुमत से कहीं आगे है, जबकि टीएमसी 91 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 2021 के मुकाबले बीजेपी के महज 7% वोट बढ़े, लेकिन सीटें 117 बढ़ती दिख रही हैं।
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ममता अपना गढ़ भी नहीं बचा पाईं। जिन 119 सीटों पर टीएमसी पिछले 15 साल से लगातार काबिज थी, उनमें से 65 सीटें यानी करीब 55% सीटें बीजेपी छीनती दिख रही है। लेकिन ये सब कैसे हुआ, जानेंगे इलेक्शन एक्सप्लेनर में…
सबसे पहले वो आंकड़ा, जो बीजेपी की जीत की गहराई को बताता है…

अब जानिए बीजेपी की जीत के 5 बड़े फैक्टर…

2011 में खाता न खोल पाने वाली बीजेपी ने 2021 में 77 सीटें जीतीं और अब बंगाल में सरकार बनाने वाली है। पिछली दो बार आंकड़े साफ बताते हैं कि बीजेपी को 50% से ज्यादा हिंदुओं का वोट मिला।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है- हिंदू वोटर्स का अपने पक्ष में ध्रुवीकरण। हिंदुओं को लामबंद करने के लिए इस चुनाव में बीजेपी ने कई दांव चले…
हिंदू ध्रुवीकरण के आड़े आ रहे ‘माछ-भात’ को हथियार बनाया
- 29 मार्च को ममता बनर्जी ने पुरुलिया में चुनावी सभा में कहा, ‘अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो मछली, मांस और अंडा खाना बंद हो जाएगा।’ उन्होंने चेताया कि बीजेपी ‘माछे-भात बंगाली’ (मछली और चावल खाने वाला बंगाली) की पहचान को खत्म कर देगी।
- इसे काउंटर करने के लिए बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने सार्वजनिक तौर पर मछली खाई। कुछ बीजेपी उम्मीदवारों ने मछली के साथ प्रचार किया। शाह ने भी कहा कि माछ-भात खाने वाला ही बंगाल का सीएम होगा।
- दरअसल, उत्तर भारत में हिंदुत्व अक्सर शाकाहार और सात्विकता से जुड़ा होता है, लेकिन बंगाल में ‘शाक्त परंपरा’ (शक्ति की पूजा) सर्वोपरि है, जिसमें मछली को ‘महाप्रसाद’ माना जाता है।
- बीजेपी ने संदेश दिया कि उनका हिंदुत्व बंगाल की मिट्टी और थाली के अनुकूल है। ‘मछली-भात’ हर बंगाली का हक है, चाहे वह किसी भी पार्टी को वोट दे।

21 अप्रैल को कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने सार्वजनिक तौर पर माछ-भात खाया।
‘काबा बनाम मां काली’ का नैरेटिव बनाया
- टीएमसी सांसद सायानी घोष ने मुस्लिम बहुल इलाकों में रैलियों के दौरान ‘मेरे दिल में है काबा, और मेरी आंखों में मदीना’ गीत गाया। इसका वीडियो खूब वायरल हुआ।
- अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे बीजेपी नेताओं ने इसे ‘काली बनाम काबा’ की तरह पेश किया। उन्होंने कहा कि टीएमसी के दिल में काबा-मदीना हो सकता है, लेकिन बंगाल के दिल में केवल मां काली और मां दुर्गा बसती हैं।
- हिंदी पट्टी में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वाली बीजेपी ने बंगाल में ‘जय मां काली’ को मजबूती से पकड़ा। ताकि वो बंगाली परंपराओं में शामिल दिखे।
- पिछले चुनाव में टीएमसी ने बीजेपी के ‘जय श्री राम’ के नारे को ‘जय मां काली’ से काउंटर किया था, जिसका उसे फायदा हुआ। इसी से बीजेपी ने सीख ली और ‘जय मां काली’ का नारा लगया।
- बीजेपी ने तर्क दिया कि बंगाली अस्मिता की बात करने वाली ममता बनर्जी की पार्टी ‘काबा-मदीना’ को बंगाल पर थोप रही है।

ममता ने बतौर नेता और सीएम अपना महिला वोट बैंक तैयार किया। टीएमसी में 9 महिला सांसद और 39 महिला विधायक भी हैं।

बीजेपी ने ममता के इसी कोर वोटबैंक को साधा…
महिलाओं को ₹3000 देने का वादा, सरकारी नौकरी में 33% आरक्षण
- ममता ने महिलाओं के लिए 9 वादे किए थे। सबसे बड़ा वादा था- लक्ष्मीर भंडार योजना के तहत 500 रुपए बढ़ाकर सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1500 और SC/ST महिलाओं को 1700 रुपए हर महीने देना। 2.4 करोड़ महिलाओं को ये रकम मिलती है।
- बीजेपी ने हर महीने 3 हजार रुपए देने का वादा किया। मेनिफेस्टो में महिलाओं से जुड़े 15 वादे किए। जैसे- सरकारी नौकरी में 33% आरक्षण, फ्री बस सर्विस।
- नवंबर 2023 के बाद से 11 राज्यों में चुनाव से पहले महिलाओं को कैश देने की योजनाएं लागू की गई या वादा किया गया। इनमें से 10 राज्यों में ये सत्ता दिलाने में कामयाब रही।
महिला आरक्षण बिल के नाम पर टीएमसी को महिला-विरोधी बताया
- चुनाव से ठीक पहले केंद्र की बीजेपी सरकार ने संसद का विशेष सत्र बुलाया। इसमें 3 बिल लाए गए। कहा गया कि ये बिल महिला आरक्षण को लागू करने के लिए जरूरी है।
- इनमें से दो बिल लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने और तीसरा बिल परिसीमन करने से जुड़ा हुआ था।
- सभी विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध किया और बिल पास नहीं हो सके।
- बीजेपी ने नैरेटिव बनाया कि वे महिलाओं को सत्ता में 33% हिस्सेदारी दे रहे हैं, लेकिन कांग्रेस, टीएमसी समेत पूरा विपक्ष विरोध कर रहा है।
- इसने ममता बनर्जी के उस नैरेटिव को कमजोर किया कि बीजेपी महिला-विरोधी या पुरुष-प्रधान पार्टी है।
पीड़ित महिलाओं के परिजनों को टिकट दिए
- संदेशखाली और आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटनाओं ने बंगाल में महिला सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े किए। बीजेपी ने इस नैरेटिव को साधने के लिए इन मामलों के बड़े चेहरों को टिकट दे दिया।
- संदेशखाली आंदोलन का चेहरा बनीं रेखा पात्रा को हिंगलगंज सीट और आरजी कर रेप केस में पीड़िता की मां रत्ना देबनाथ को पनिहाटी सीट से टिकट दिया।

24 अप्रैल को दमदम में पीएम नरेंद्र मोदी ने आरजी कर रेप केस की पीड़िता की मां और बीजेपी कैंडिडेट रत्ना देबनाथ के लिए रैली की थी।
- बीजेपी ने पूरे चुनाव में बार-बार महिला सुरक्षा के मुद्दे को हवा दी। 14 अप्रैल को पनिहाटी की रैली में ऐलान किया कि बीजेपी सरकार आने पर बंगाल की माताओं-बहनों को रात 2 बजे भी घर से निकलने में डर नहीं लगेगा।
- पीएम मोदी ने ममता के 12 अक्टूबर 2025 के उस बयान सीधा हमला किया था, जिसमें ममता ने सलाह दी थी कि महिलाओं को रात में बाहर नहीं निकलना चाहिए।

- चुनाव से पहले बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR हुआ, जिसमें 91 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए। पहले चरण में 64 लाख और फिर लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर 27 लाख। कुल वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई।
- द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक हटाए गए नामों में से 57.47 लाख हिंदू हैं, यानी 63% और 31.1 लाख मुस्लिम है, यानी 34%। जबकि 2011 की जनगणना के हिसाब से राज्य में 27% मुस्लिम आबादी है।
- पॉलिटिकल साइंटिस्ट आशुतोष वार्ष्णेय मानते हैं कि बीजेपी की जीत में एक भूमिका बंगाल में SIR से मुस्लिम वोटरों की घटी संख्या भी है। यह केवल व्यावहारिक राजनीति का मामला नहीं है, बल्कि दुनिया में लोकतंत्र पर होने वाली बहसों का हिस्सा बनने वाला है।
- दरअसल, 2021 में 69 सीटों पर जीत का अंतर 10 हजार से कम था। SIR की न्यायिक प्रक्रिया के बाद करीब 45 सीटों पर मार्जिन से ज्यादा वोट कट गए।
- सबसे ज्यादा नाम मुर्शिदाबाद (4.55 लाख), उत्तर 24 परगना (3.25 लाख) और मालदा (2.39 लाख) जैसे जिलों से कटे हैं, जो मुस्लिम बहुल हैं और टीएमसी के मजबूत गढ़ माने जाते हैं।
- बीजेपी ने वोटर लिस्ट से हटाए गए नामों को अवैध घुसपैठियों और ब्लैक वोट्स के रूप में पेश किया। तर्क दिया कि ये ‘शुद्धिकरण अभियान’ है, जिन्हें टीएमसी ने वोटबैंक बनाने के लिए संरक्षण दिया था।

- पिछली बार बीजेपी नेताओं ने ‘दीदी-ओ-दीदी’ जैसे नारों लगाए तो ममता बनर्जी को सहानुभूति मिली। सबक लेकर बीजेपी ने इस बार ममता पर व्यक्तिगत हमले लगभग बंद कर दिए।
- बीजेपी ने टीएमसी के सेकंड-इन-कमांड और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी और सिंडिकेट राज को निशाना बनाया। संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं को सिस्टम की नाकामी बताया।
- कोलकाता के सीनियर जर्नलिस्ट जयंता घोषाल मानते हैं कि बीजेपी का चुनाव प्रचार आक्रामक और खुले तौर पर लड़ाकू रहा है। उन्होंने मैसेज दिया कि वे बंगाल से गुंडों को हटा देंगे और उनका सत्ता में आना तय है। इसको लेकर ममता बनर्जी कुछ डिफेंसिव नजर आईं।
- टीएमसी ने चुनाव आयोग के पक्षपाती होने और SIR को मुद्दा बनाने की कोशिश की, जबकि बीजेपी ने बेरोजगारी, घुसपैठ, सुरक्षा जैसे मुद्दे उठाए।
- 16 अप्रैल को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने पश्चिम मेदिनीपुर की रैली में कहा, ‘टीएमसी ने बंगाल को भारत की सांस्कृतिक राजधानी से अपराध की राजधानी बना दिया है।’
- अगले दिन महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ममता सरकार पर बंगाल में इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स न लाने का आरोप लगाया।
- VoteVibe के सर्वे के मुताबिक, पश्चिम बंगाल में तीन मुद्दे सबसे अहम रहे- बेरोजगारी (36.6%), कानून और महिला सुरक्षा (19.4%) और भ्रष्टाचार (11.4%), जबकि SIR का मुद्दा महज 2.9% लोगों के बीच रहा।

पीएम, 12 सीएम, 15 केंद्रीय मंत्रियों ने मांगे वोट
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, शिवराज सिंह चौहान, धर्मेंद्र प्रधान समेत 15 केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों ने बंगाल में रैलियां कीं।
- योगी आदित्यनाथ, देवेंद्र फडणवीस, हिमंता बिस्व सरमा, डॉ. मोहन यादव समेत 12 मुख्यमंत्रियों ने प्रचार किया। वोट मांगने के लिए अनुराग ठाकुर, मनोज तिवारी, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, कंगना रनौत जैसे दर्जनों नेताओं की फौज उतार दी।
- पीएम मोदी ने 19, शाह ने 30 से ज्यादा, राजनाथ ने 6, योगी ने 11, स्मृति ने 13 और हिमंता ने 8 रैलियां और रोड शो किए। बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन ने भी 10 रैलियां कीं।

19 अप्रैल को झाड़ग्राम में बंगाल में पॉपुलर स्नैक्स झालमुरी की एक दुकान पर पीएम मोदी पहुंचे।
15 दिन तक बंगाल में रहे शाह
- अमित शाह ने खुद पूरे चुनाव की कमान संभाली। चुनाव से 6 महीने पहले ही बंगाल के दौरे शुरू किए। चुनाव में 15 दिन तक बंगाल में कैंप किया। रात 3 बजे तक मैराथन बैठकें कीं।
- टीम के साथ 80 हजार पोलिंग स्टेशनों का डेटा एनालिसिस कर 3 कैटेगरी बनाई- मजबूत, मध्यम और कमजोर। मध्यम वे बूथ थे, जहां 2021 में हार-जीत का अंतर बहुत कम था।
- वोटिंग से पहले 21 अप्रैल को शाह ने स्ट्रैटजी मीटिंग कर हर सीट पर बीजेपी के पक्ष में 20 हजार वोट बढ़ाने का टारगेट दिया। 2021 और 2024 के बूथ लेवल परफॉर्मेंस और स्विंग वोटर्स के कैलकुलेशन पर इसे तय किया था।

23 अप्रैल को पहले फेज की वोटिंग के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने कोलकाता के सॉल्ट लेक में बने बीजेपी के इलेक्शन वॉर का दौरा किया।
4 केंद्रीय + 4 बंगाली नेताओं का कोर ग्रुप बनाया
- दिसंबर 2025 में अमित शाह ने तीन दिन के बंगाल दौरे में बीजेपी का चुनावी कोर ग्रुप बनाया था। इसमें 4 केंद्रीय नेता- सुनील बंसल, भूपेंद्र यादव, बिप्लव देव, अमित मालवीय और 4 बंगाली नेता- समिक भट्टाचार्य, सुवेंदु अधिकारी, दिलीप घोष, सुकांत मजूमदार थे।
- 2021 में टीएमसी ने बीजेपी पर बाहरी नेताओं को थोपने का आरोप लगाया था। इस बार भी ऐसी कोशिशें हुई, लेकिन बीजेपी ने दांव पलट दिया।
- जब बीजेपी ने 40 स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी की, तो उसमें 15 बंगाली और 25 दूसरे राज्य के नेताओं के नाम थे। टीएमसी ने इसे मुद्दा बनाया, तो बीजेपी ने 24 घंटे के भीतर 6 दूसरे राज्यों के नेताओं का नाम हटाकर बंगाली नेताओं को शामिल किया।
- ममता ने कहा कि बीजेपी किसी बाहरी को सीएम बनाएगी, तो मोदी और शाह ने ऐलान किया कि बीजेपी का सीएम बंगाल की मिट्टी का ही बेटा होगा।
बूथ से जिले तक का माइक्रो-मैनेजमेंट
- बीजेपी ने यूपी वाला सफल मॉडल बंगाल में उतारा। ‘पन्ना प्रमुख’ सिस्टम लागू किया गया, जिसके तहत एक कार्यकर्ता को 30-60 वोटर्स की जिम्मेदारी दी गई।
- राज्य के 80 हजार से ज्यादा बूथों पर कार्यकर्ता तैनात किए, जिनका काम सिर्फ प्रचार नहीं, बल्कि पोलिंग के दिन एक-एक वोटर को घर से निकालकर बूथ तक लाना था।
- पूरे राज्य को 5 जोन में बांटकर हर जोन पर 2 से 3 सीनियर लीडर्स तैनात किए। कम-से-कम 3-3 बड़े नेताओं को हरेक जिले की जिम्मेदारी सौंपी।
बीजेपी के बंगाल जीतने से नेशनल पॉलिटिक्स पर क्या असर पड़ेगा?
- 83 साल बाद बंगाल में हिंदू राजनीति: 1941 में कृषक प्रजा पार्टी और हिंदू महासभा के नेतृत्व में बने प्रोग्रेसिव कोएलिशन की बंगाल में सरकार बनी, जो 1943 तक चली। इसके बाद से राज्य में कांग्रेस, लेफ्ट और टीएमसी की सत्ता रही। अब बीजेपी सरकार बनने से बंगाल में 83 साल बाद हिंदुत्व की राजनीति की वापसी होगी।
- चरम पर बीजेपी, 17 मुख्यमंत्री: मार्च 2018 में बीजेपी अपने पीक पर थी। तब बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA की 21 राज्यों में सरकार थी, लेकिन अब बंगाल, असम और पुडुचेरी जीतने के बाद NDA की 22 राज्यों में सरकार बनने वाली है। इनमें से 17 में बीजेपी के और 5 में सहयोगी दलों के मुख्यमंत्री है। यानी बीजेपी फिर से पीक पर पहुंच गई है।
- विपक्ष का बड़ा गढ़ ढहा: ‘स्ट्रीट फाइटर’ की इमेज वाली ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा और सबसे मजबूत मुख्यमंत्री थीं, लेकिन अब उनकी हार से विपक्ष को तगड़ा झटका लगा है। इससे विपक्ष का उत्साह कम होगा। विपक्षी गुट में राहुल गांधी के बाद ममता को ही पीएम कैंडिडेट के तौर पर देखा जाता है, लेकिन अब उनकी उम्मीदवारी कमजोर हो सकती है।
- अंग-बंग-कलिंग का लक्ष्य पूरा: 24 अप्रैल को अमित शाह ने कहा था, ‘बंगाल जीतने के साथ बीजेपी अपना अंग, बंग और कलिंग जीतने का लक्ष्य पूरा कर लेगी।’ अंग यानी बिहार, बंग यानी बंगाल और कलिंग यानी ओडिशा तीनों जगह बीजेपी के मुख्यमंत्री होने वाले हैं। 1970 के दशक के बाद अब ऐसा होगा कि इन तीनों जगह पर किसी एक विचारधारा का शासन हो। तब कांग्रेस की यहां सरकारें थीं।
- महिलाएं निर्णायक वोटबैंक: हर चुनाव में पुरुषों के मुकाबले 2-3% महिलाएं ज्यादा वोट डाल रही हैं। उन्हें चुनावों का रुख तय करने वाला अहम वोटबैंक माना जा रहा है। पार्टियां भी महिलाओं से जुड़े वादे कर चुनाव जीत रही हैं। बंगाल में भी महिलाओं को कैश देने वाली स्कीम का वादा किया गया। इसका असर नतीजों पर दिखा। VoteVibe के फाउंडर और इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी मानते हैं कि महिलाएं निर्णायक वोटबैंक बन गई हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश भर की महिलाओं के लिए कैश ट्रांसफर स्कीम शुरू हो सकती है।
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ग्राफिक्स- दृगचंद्र भुर्जी ——————-
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