ग्वालियर में बच्चों की कस्टडी को लेकर चल रहे एक मामले में ग्वालियर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी पुरुष के साथ हाथ पकड़े हुए फोटो होने मात्र से किसी महिला का चरित्र खराब नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साढ़े तीन और डेढ़ साल के दो बच्चों की कस्टडी उनकी मां को सौंपते हुए कहा कि बच्चों के विकास के लिए मां की ममता और सानिध्य जरूरी है। साथ ही पति को पत्नी और बच्चों के भरण पोषण के लिए 15 हजार रुपए प्रति माह देने का आदेश दिया है। मामले की सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी पर चरित्रहीनता के आरोप लगाते हुए एक स्क्रीनशॉट पेश किया था। इस पर हाईकोर्ट की युगल पीठ ने कहा- फोटो में दिख रहा व्यक्ति महिला का भाई, पिता या कोई मित्र भी हो सकता है। महज हाथ पकड़ने से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वह दोहरा जीवन जी रही है। कोर्ट ने पति द्वारा लगाए गए इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। महिला ने दायर की थी याचिका
ग्वालियर निवासी एक महिला ने कोर्ट में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ रिट दायर की थी। महिला का आरोप था कि उसके पति, सास और ननद ने उसे प्रताड़ित कर घर से निकाल दिया है। उसके दो बच्चों को जबरन अपने कब्जे में रख लिया। काउंसलिंग के दौरान यह भी सामने आया कि पति खुद पत्नी के साथ मारपीट और गाली-गलौज की बात स्वीकार कर चुका था। ‘मां ही बच्चों की प्राकृतिक संरक्षक’
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी के मामलों में पिता के कानूनी अधिकार से कहीं ऊपर ‘बच्चों का हित’ होता है। इतने छोटे बच्चों के लिए मां ही उनकी प्राकृतिक संरक्षक है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और मानसिक विकास के लिए मां का साथ होना सबसे महत्वपूर्ण है। पति को कानूनी स्वतंत्रता दी
कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया है, लेकिन पति को यह छूट दी है कि वह भविष्य में ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट’ के तहत कस्टडी के लिए नियमित कानूनी प्रक्रिया अपना सकता है। चरित्र हनन पर कोर्ट की फटकार
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पत्नी को कुछ बातों के लिए फटकार भी लगाई, लेकिन बच्चों के भविष्य को सर्वोपरि रखा। कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल एक फोटो के आधार पर किसी महिला के आचरण को गलत मान लेना न्यायसंगत नहीं है।
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