देवास की पटाखा फैक्ट्री में हुआ धमाका सिर्फ एक हादसा नहीं है… यह सिस्टम की चुप्पी, लापरवाही और मिलीभगत का विस्फोट है। 5 मजदूरों की मौत हो चुकी है…कई जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। 90 से 99 प्रतिशत तक झुलसे मजदूर हर सांस के साथ संघर्ष कर रहे हैं। बिहार और यूपी से आए इन गरीब मजदूरों ने सोचा था कि मेहनत करेंगे, परिवार पालेंगे… लेकिन यहां तो उनकी पूरी जिंदगी ही राख हो गई। अब सवाल यह है कि आखिर इन मौतों का जिम्मेदार कौन है? सिर्फ फैक्ट्री मालिक? नहीं… यह पूरा सिस्टम कटघरे में खड़ा है। फैक्ट्री संचालक ने कम बारूद के लाइसेंस पर टनों विस्फोटक जमा कर लिया। सैकड़ों मजदूरों को बिना सुरक्षा के बारूद के ढेर पर बैठा दिया। जब मजदूर कम पड़े तो दूसरे राज्यों से लोगों को बुला लिया गया… लेकिन उनकी सुरक्षा, उनकी जिंदगी किसी की प्राथमिकता नहीं थी। फिर आता है राजनीतिक संरक्षण… पटाखा फैक्ट्री संचालक की स्थानीय सांसद से करीबी की चर्चा पूरे इलाके में थी। सोशल मीडिया पर तस्वीरें थीं, पहचान थी, पहुंच थी… और शायद यही वजह थी कि किसी अधिकारी ने हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। सवाल उठता है – क्या सिस्टम डर गया था? या फिर दबाव में था? अब प्रशासन की भूमिका देखिए कलेक्टर कार्यालय से लाइसेंस जारी होता है। विस्फोटक नियम 2008 के तहत सीमित मात्रा के लिए अनुमति दी जाती है, लेकिन मौके पर टनों बारूद मिला। क्या किसी अधिकारी ने छह महीने में एक बार भी जाकर नहीं देखा कि वहां क्या चल रहा है? अगर देखा नहीं, तो लापरवाही है। अगर देखकर भी आंख बंद रखी, तो यह अपराध है। …और यह सिर्फ एक विभाग की विफलता नहीं है राजस्व विभाग को देखना था कि आसपास आबादी तो नहीं, सुरक्षा मानक पूरे हैं या नहीं। पुलिस को जांचना था कि फैक्ट्री से कानून-व्यवस्था या सुरक्षा का खतरा तो नहीं। बिजली विभाग को देखना था कि हाईटेंशन लाइन या तकनीकी खतरे तो नहीं हैं। श्रम विभाग को मजदूरों की सुरक्षा, बीमा और सुरक्षा उपकरणों की निगरानी करनी थी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को रासायनिक कचरे और पर्यावरणीय खतरे का आकलन करना था। PWD को फैक्ट्री के स्ट्रक्चर और इमरजेंसी एग्जिट की जांच करनी थी। लेकिन हुआ क्या? कागजों में सब ठीक चलता रहा… और जमीन पर बारूद का पहाड़ खड़ा होता रहा। आज जब लाशें सामने हैं, तब कार्रवाई की बातें हो रही हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या सिर्फ फैक्ट्री मालिक पर कार्रवाई काफी होगी? क्या उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी जिन्होंने आंखें बंद रखीं? क्या उन राजनीतिक संरक्षण देने वालों से सवाल होंगे? क्या इस सामूहिक लापरवाही को सिर्फ ‘दुर्घटना’ कहकर दबा दिया जाएगा? हादसे के बाद अधिकारी बयान दे रहे हैं। जांच की बातें कर रहे हैं। मुआवजे की घोषणा हो रही है। लेकिन क्या किसी अफसर पर हत्या जैसी धाराएं लगेंगी? क्या लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारियों की भूमिका की जांच होगी? क्या यह पता लगाया जाएगा कि निरीक्षण रिपोर्ट किसने बनाई और किस आधार पर बनाई? सच्चाई यह है कि यह सिर्फ फैक्ट्री ब्लास्ट नहीं… सिस्टम द्वारा गरीब मजदूरों की सामूहिक हत्या है। अगर इस बार भी केवल छोटे लोगों को बलि का बकरा बनाया गया और असली संरक्षक बच गए, तो आने वाले समय में फिर कोई फैक्ट्री फटेगी… फिर मजदूर जलेंगे… और फिर सिस्टम दो मिनट का मौन रखकर आगे बढ़ जाएगा।
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