राजस्थान की पारंपरिक ‘ओरण’ (पवित्र उपवन) भूमि के संरक्षण को लेकर चल रहा वर्षों पुराना संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट में विधी सेतु फाउंडेशन द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन (IA) के बाद अब इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 9 जजों की संविधान पीठ कल यानी 7 अप्रैल को सुनवाई करेगी। यह सुनवाई न केवल राजस्थान बल्कि पूरे देश में ‘आस्था आधारित पर्यावरण संरक्षण’ के लिए एक नई मिसाल बन सकती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि ओरण केवल सरकारी रिकॉर्ड में ‘डीम्ड फॉरेस्ट’ मात्र नहीं हैं, बल्कि यह ‘भूमि-आधारित धर्म’ का अभिन्न हिस्सा हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत ग्रामीण समुदायों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के पालन का अधिकार है। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, ओरण में पेड़ों की कटाई और शिकार पर धार्मिक प्रतिबंध है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन परंपराओं को ‘अनिवार्य धार्मिक अभ्यास’ मानते हुए संवैधानिक सुरक्षा दी जानी चाहिए। सोलर-विंड प्रोजेक्ट्स के कारण संकट में विरासत जैसलमेर और आस-पास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सोलर और विंड एनर्जी प्रोजेक्ट्स के कारण ओरण भूमि का विचलन हो रहा है। पर्यावरण प्रेमियों का तर्क है कि यदि सुप्रीम कोर्ट इसे धार्मिक अधिकारों के तहत संरक्षण देता है, तो इन परियोजनाओं के नाम पर होने वाली भूमि की बंदरबांट और पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह रोक लग सकेगी। एडवोकेट धर्मवीर सिंह ने बताया- “हम चाहते हैं कि माननीय न्यायालय ओरणों के धार्मिक महत्व को समझे। 9 सदस्यीय पीठ की यह सुनवाई हमें उम्मीद देती है कि अब ओरणों को वन कानूनों से ऊपर उठकर मौलिक अधिकारों का कवच मिलेगा।” 725 किलोमीटर की पदयात्रा का असर तनोट माता मंदिर से शुरू हुई 725 किलोमीटर लंबी ‘ओरण बचाओ पदयात्रा’ पिछले 75 दिनों से जारी है। पदयात्री पार्थ जगाणी के अनुसार, यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि उस विरासत की है जिसे पुरखों ने ‘ईश्वर का बगीचा’ मानकर संरक्षित किया था। कल होने वाली सुनवाई पर अब पूरे प्रदेश, विशेषकर पश्चिमी राजस्थान के ग्रामीणों की निगाहें टिकी हैं। टीम ओरण के पदयात्री व पर्यावरण प्रेमी पार्थ जगाणी ने बताया- “सड़कों पर शुरू हुआ यह जन-आंदोलन अब देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया है। ओरण का संरक्षण हमारी संस्कृति को बचाने जैसा है।” क्या होती है ओरण भूमि? राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति में ‘ओरण’ वह संरक्षित भूमि है, जिसे किसी स्थानीय देवी-देवता या संत के नाम पर समर्पित कर दिया जाता है। इसे ‘ईश्वर का बगीचा’ माना जाता है। जैसलमेर में ओरण संघर्ष की कहानी जैसलमेर में ओरण को बचाने का संघर्ष पिछले कुछ वर्षों में एक बड़े जन-आंदोलन में बदल गया है। इस संघर्ष की मुख्य वजह अक्षय ऊर्जा (सोलर और विंड पावर) का विस्तार है।
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