मानव जीवन के विकास के लिए जिस तरह भोजन, पानी और ऑक्सीजन जरूरी है, ठीक उसी तरह सकारात्मक ऊर्जा भी उतनी ही आवश्यक है। शरीर, मन और चेतना को कुछ छोटे-छोटे प्रयोगों और साधना से पूरी तरह बदला जा सकता है। यह बात सन टू ह्यूमन फाउंडेशन के संस्थापक परम आलय ने कानपुर में आयोजित साधना सत्र के दौरान कही। पुरुषोत्तम मास की षष्ठी के मौके पर शहर के करीब चार हजार से अधिक साधक इस अनूठे आयोजन का हिस्सा बने। कल शाम और आज सुबह के सत्रों में कानपुर की जागरूक जनता इस ज्ञान और सकारात्मक ऊर्जा को पाकर निहाल हो उठी। इंसानी मन के चार स्तर,बच्चा सिर्फ अचेतन मन के साथ लेता है जन्म कार्यक्रम में साधकों को संबोधित करते हुए परम आलय जी ने इंसानी दिमाग और मन की परतों को बेहद आसान शब्दों में समझाया। उन्होंने बताया कि इंसानी मन मुख्य रूप से चार स्तरों में बंटा होता है। इसमें मूलाधार चक्र में हमारा अवचेतन मन निवास करता है, जबकि स्वाधिष्ठान चक्र में अचेतन मन होता है। इसी तरह मणिपुर चक्र हमारे चेतन मन का केंद्र है और अनाहत चक्र पर महाचेतन मन जाग्रत होता है। उन्होंने एक बेहद दिलचस्प बात साझा करते हुए कहा कि जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो उसका सिर्फ अचेतन मन ही सक्रिय रहता है। बाकी के स्तरों को मनुष्य जीवन में अपने कर्मों, विचारों और क्रियाकलापों के जरिए खुद जाग्रत करता है। जानिए कैसे काम करती हैं सूर्य और चंद्र नाड़ी परम आलय जी ने शरीर के विज्ञान को नाड़ी तंत्र से जोड़ते हुए बताया कि हमारा मस्तिष्क दाएं और बाएं दो हिस्सों में विभाजित है। हमारी नाक का दाहिना हिस्सा ‘सूर्य नाड़ी’ कहलाता है, जो दिमाग के बाएं हिस्से को एक्टिव रखता है। वहीं, नाक का बायां हिस्सा ‘चंद्र नाड़ी’ है, जिससे दिमाग का दाहिना हिस्सा सक्रिय होता है। अगर हम अपनी सांसों और नाड़ियों के इस विज्ञान को समझ लें, तो आधे से ज्यादा मानसिक और शारीरिक तनाव यूं ही खत्म हो जाते हैं।
Source link
