45 साल पहले जो हाथ पेट भरने के लिए दूसरों के सामने फैलते थे, आज उन्हीं हाथों में देश का प्रतिष्ठित ‘पदमश्री’ सम्मान है। सम्मान के बाद राष्ट्रपति भवन में कलाकारों को चांदी के बर्तनों में खाना खिलाया। अपने अपने क्षेत्र के केंद्रीय मंत्री भी कलाकारों के साथ बैठे। यह कहानी है अलवर के जोगी भपंग वादक गफ़रूद्दीन मेवाती की। कभी भीख मांगने को मजबूर गफ़रूद्दीन आज देश-दुनिया में अलवर का नाम रोशन कर रहे हैं। भपंग की धुन 45 देशों में छोड़ चुके हैं। बल्कि लंदन में क्वीन एलिजाबेथ के जन्मदिन की पार्टी में ऐसा समां बांधा कि एक अंग्रेज महिला खुद को रोक नहीं पाई और उन्हें कसकर गले लगा लिया। हाल ही में पद्मश्री से नवाजे गए गफ़रूद्दीन जब दिल्ली से अलवर लौटे, तो उनका स्वागत गाजे बाजे से किया गया। भास्कर से खास बातचीत में उन्होंने राष्ट्रपति भवन के उन पलों को साझा किया, जो उनके लिए किसी सपने जैसे थे। जब राष्ट्रपति भवन में वीआईपीज़ के बीच बैठे गफ़रूद्दीन गफ़रूद्दीन ने बताया कि अवार्ड लेते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद उनके पास आए और बेहद आत्मीयता से हाथ मिलाकर पूछा— “कैसे हैं आप?” इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने उन्हें बधाई दी। पदमश्री सम्मान मिलने के बाद वीआईपी लोगों के साथ खाना खाने का अवसर मिला। उन पलों को याद करते हुए गफरुद्दीन मेवाती ने कहा कि ऐसा लगा जैसे सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खा रहा हूं” “अवार्ड सेरेमनी के बाद मुझे केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के साथ बगल की टेबल पर बैठकर खाना खाने का मौका मिला। मुझे इतना मान-सम्मान केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की बदौलत मिला। उस पल मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मैं सोने-चांदी के बर्तनों में खाना खा रहा हूं। लंदन का वो किस्सा: जब भपंग सुनकर भावुक हो गई थी अंग्रेज महिला गफ़रूद्दीन ने अपने विदेशी दौरों का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। करीब 12 साल पहले उन्हें लंदन में क्वीन एलिजाबेथ के जन्मदिन की पार्टी में परफॉर्म करने का मौका मिला था। वहां उन्होंने भपंग की ऐसी तान छेड़ी कि वहां मौजूद विदेशी मेहमान मंत्रमुग्ध हो गए। गफ़रूद्दीन ने बताया, “मेरी प्रस्तुति खत्म होते ही एक अंग्रेज महिला इतनी भावुक और प्रभावित हुई कि उसने दौड़कर मुझे कसके गले लगा लिया। दिमाग में छपी है महाभारत: जुबानी याद हैं 2500 दोहे भपंग वादन के साथ-साथ गफ़रूद्दीन लोक गाथाओं के भी ‘इंसाइक्लोपीडिया’ हैं। उन्हें महाभारत लोक गाथा के करीब 2500 दोहे मुंहजुबानी याद हैं। बातचीत के दौरान उन्होंने पूरी ऊर्जा के साथ एक दोहा गाकर भी सुनाया। उन्होंने कहा कि यह कला ही उनकी पूंजी है और इसी ने उनका पूरा जीवन बदल कर रख दिया। अलवर में ढोल-बाजे के साथ जोरदार स्वागत पद्मश्री मिलने के बाद जब गफ़रूद्दीन मेवाती अलवर पहुंचे, तो पूरा शहर उनके स्वागत में उमड़ पड़ा। जगह-जगह ढोल-बाजे बज रहे थे, फूल-मालाओं से उन्हें लाद दिया गया।
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