भोपाल-जबलपुर नेशनल हाईवे पर मंडीदीप का पुल जैसे ही क्रॉस करते हैं, 80 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली गाड़ियों की स्पीड 30 से 40 किमी प्रति घंटे हो जाती है। दरअसल, पुल क्रॉस करने के बाद इस हाईवे पर गायों का जमघट लगा रहता है। गायों को बचाने के
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ये केवल एक हाईवे की कहानी नहीं है बल्कि बारिश के मौसम में मध्यप्रदेश के हाईवे जानलेवा हो जाते हैं। सरकार में बैठे जिम्मेदारों के मुताबिक मप्र में करीब 40 लाख गायें सड़कों पर होती है, हालांकि इनमें निराश्रित के साथ दुधारू गायें भी शामिल हैं। सरकार के मुताबिक निराश्रित गोवंश का आधिकारिक आंकड़ा करीब 9 लाख है।
सड़कों से गायों के हटाने के लिए मप्र सरकार ने पिछले पांच साल में करीब 1 हजार करोड़ रुपए खर्च किए, लेकिन समाधान नहीं निकला। अब सरकार इसके लिए नई पॉलिसी लेकर आई है। पॉलिसी को कैबिनेट की मंजूरी मिल चुकी है। इसके तहत हर जिले में स्वावलंबी गोशालाएं बनाई जाएंगी। क्या है पॉलिसी और इससे आवारा पशुओं की समस्या कैसे दूर होगी? पढ़िए रिपोर्ट…
इन तीन केस से समझिए कैसे जानलेवा बन रहे हाईवे
केस-1: गायों की मौत हुई तो हाईवे जाम किया राजगढ़ में आगरा-मुंबई नेशनल हाईवे पर दो महीने पहले 31 जुलाई को तेज रफ्तार वाहनों ने सड़क पर बैठी गायों को कुचल दिया। इसमें चार गायों की मौके पर ही मौत हो गई थी। इस घटना से गुस्साए गोसेवकों ने हाईवे पर प्रदर्शन किया और सड़क जाम कर दी। तीन किमी लंबे जाम को खोलने के लिए पुलिस को 5 घंटे तक मशक्कत करना पड़ी।
केस-2: तीन दिन में 16 गायों की मौत पिछले महीने मंडीदीप से गुजरने वाले भोपाल-जबलपुर हाईवे पर तीन दिन में 16 से ज्यादा गायों की मौत हो गई। हाईवे पर एक ट्रक ने रात के अंधेरे में गायों को कुचल दिया। गुस्साई भीड़ ने ट्रक में आग लगा दी। वहीं ओबेदुल्लागंज में तीन गायों से टकराने के बाद दूध से भरा टैंकर पलट गया। हाईवे के नजदीक डुंगरिया के पास 11 गायों की एक साथ मौत हो गई।
केस-3: गाय से टकराकर पिता की मौत, बेटी घायल छतरपुर से गुजरने वाले झांसी-खजुराहो एनएच-39 पर 10 सितंबर को गाय से टकराने के बाद मोराहा गांव के रहने वाले गिरजा पटेल की मौत हो गई। गिरजा पटेल अपनी 3 साल की बेटी के साथ बाइक से जा रहे थे। रटिया घूरा के पास हाईवे पर बैठी गायों से गाय टकरा गई। इसमें बेटी को मामूली चोटें लगीं। अस्पताल में गिरिजा पटेल ने दम तोड़ दिया।

10 सवालों के जवाब से समझिए सरकार की ‘कामधेनु’ स्कीम
सड़कों से गायों को हटाने के लिए सरकार ने 8 अप्रैल 2025 को कैबिनेट में स्वावलंबी गोशालाओं की नीति को मंजूरी दी है। इसे कामधेनु निवास नाम दिया गया है। इस नीति के तहत हर जिले में आधुनिक गोशालाएं बनाई जाएंगी। जिस जिले में निराश्रित गोवंश की संख्या ज्यादा है, वहां एक से ज्यादा गोशालाओं का निर्माण किया जा सकता है।
सवाल-1: एक गोशाला में कितनी गायों को रखा जा सकेगा? नई पॉलिसी के मुताबिक एक गोशाला में 5 हजार गायों को रखना अनिवार्य है। इसमें 30 फीसदी गाय या गोवंश उन्नत दुधारू नस्ल के हो सकेंगे।
सवाल-2: क्या विदेशी नस्ल की गाय या भैंस को रखा जा सकेगा? नहीं, नीति में ये प्रावधान नहीं है। गोपालक संस्था 30 फीसदी गाय या गोवंश दुधारू नस्ल के रख सकेंगे, लेकिन इसमें विदेशी नस्ल या संकर गायें या भैंसों को रखने की इजाजत नहीं होगी।
सवाल-3: गोशाला के लिए जमीन कौन देगा? गोशाला के संचालन के लिए 125 एकड़ सरकारी जमीन यूजर राइट (उपयोग के अधिकार) के आधार पर सरकार देगी। अतिरिक्त 1 हजार गोवंश की बढ़ोतरी पर 25 एकड़ अतिरिक्त जमीन दी जाएगी। साथ ही व्यवसायिक गतिविधियों के लिए 5 एकड़ अतिरिक्त जमीन दी जा सकेगी।

सवाल-4: 125 एकड़ जमीन कैसे मिलेगी? पशुपालन और डेयरी विभाग इसके लिए लैंड बैंक तैयार कर रहा है। गोशाला के लिए दी गई जमीन पशुपालन और डेयरी विभाग के स्वामित्व में रहेगी और विभाग की तरफ से मध्यप्रदेश गो संवर्धन बोर्ड और गोपालक संस्था के बीच इस्तेमाल को लेकर काॅन्ट्रैक्ट बनाया जाएगा। जमीन अपनी मूलभूत अवस्था (जैसी है वैसी के आधार पर) उपलब्ध कराई जाएगी।
सवाल-5: जमीन पर शेड या निर्माण कार्य कौन कराएगा? जमीन पर विकास का काम गोपालक संस्था को करवाना होगा। इसमें फेंसिंग, जलप्रबंधन, बिजली और गोशाला तक पहुंचने वाली सड़क का काम भी शामिल है। इसके लिए सरकार कोई अतिरिक्त खर्च नहीं करेगी। यदि संस्था प्रोजेक्ट शुरू करने के बाद यहां किसी अन्य निवेशक साथ नई गतिविधि की योजना बनाती है तो उसे पशुपालन विभाग से अनुमति लेना जरूरी होगा।
सवाल-6: गोशाला का संचालन कौन-कौन कर सकता है? कोई भी रजिस्टर्ड संस्था जैसे कि फर्म, ट्रस्ट, सोसाइटी, कंपनी या उनके समूह इस योजना में शामिल हो सकते हैं। अधिकतम 5 संस्थाओं के समूह को मान्यता मिलेगी। इससे ज्यादा संख्या वाले समूह को अयोग्य माना जाएगा। संस्था को पहली बार में 20 साल तक जमीन का उपयोग करने का अधिकार दिया जाएगा। इसके बाद एग्रीमेंट को 5–5 साल के लिए बढ़ाया जाएगा।

सवाल-7: गोशाला में व्यवसायिक गतिविधियां कैसे संचालित होगी? पशुपालक संस्था पॉलिसी के तहत गो पालन के साथ नस्ल सुधार, पंचगव्य( गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी), मिल्क प्रोसेसिंग यूनिट, खेती, चारा विकास, उद्यानिकी, ऊर्जा, जैविक खाद, आयुष और पर्यटन जैसी गतिविधियां भी संचालित कर सकती है। इन परियोजनाओं के संचालन के लिए अधिकतम 5 एकड़ जमीन को भी एग्रीमेंट में शामिल किया जा सकेगा।
सवाल-8: गायों को न रखने पर क्या कोई जुर्माना लगेगा? नीति के मुताबिक संस्थाओं को एग्रीमेंट के अनुसार कुल गोवंश का 70% निराश्रित और 30% दुधारु गाय रख सकेगा। निराश्रित गोवंश उपलब्ध कराए जाने के बाद यदि इनकी संख्या कम पाई जाती है या संस्था ऐसे गोवंश को लेने से इनकार करेगा तो पेनॉल्टी लगेगी। तय संख्या से जितने गोवंश कम पाए जाने पर प्रति गोवंश 75 रुपए हर दिन के हिसाब से पेनॉल्टी देना पड़ेगी।

सवाल-9: गोशालाओं की मॉनिटरिंग कौन करेगा? इसकी मॉनिटरिंग का जिम्मा गोसंवर्धन बोर्ड के पास रहेगा। गोशाला से जुड़ी सारी अनुमतियां और फैसले लेने का अधिकार बोर्ड के पास ही रहेगा। साथ ही बोर्ड के सदस्य समय-समय पर जाकर गोशाला का निरीक्षण कर सकेंगे। इसके साथ ही संस्था को गोशाला में चल रही व्यवसायिक गतिविधियों की जानकारी संबंधित जिले के प्रशासन को देना होगी।
सवाल-10: क्या भीमराव अंबेडकर कामधेनु योजना इसमें शामिल होगी?
नहीं, ये योजना पूरी तरह से अलग है, क्योंकि इस योजना के तहत 3.5 एकड़ के किसान हितग्राही है। उन्हें अपनी आय बढ़ाने के लिए सरकार की तरफ से सब्सिडी दी जाएगी। इस योजना में 25 गोवंश या भैंसवंश देने का प्रावधान है, जबकि निराश्रित गायों की कामधेनु निवास योजना में भैंसवंश को पालना प्रतिबंधित है।
सीएम बता चुके सड़क पर क्यों बैठती हैं गाय बारिश के दिनों में गोमाता को मक्खी, मच्छर, कीड़े-मकोड़े परेशान करते हैं, इसलिए वह सूखी सड़क पर बैठती है। जो मक्खी, मच्छर बैठते हैं उन्हें वह पूंछ से हटाने की कोशिश करती है। हाईवे से जो वाहन गुजरते हैं उनकी हवा से मक्खी, मच्छर भाग जाते हैं। वो अपने कष्ट के निवारण के लिए सड़क पर बैठ रही है। वाहनों की टक्कर लगने से कई बार गोवंश की मौत भी हो जाती है।

