पंजाब के बरनाला में अपने पौधों के बीच हरजिंदर सिंह।
मोगा-अमृतसर नेशनल हाईवे पर स्थित बरनाला जिले के चीमा गांव के किसान हरजिंदर सिंह गेहूं-धान पर आधारित पारंपरिक खेती को अलविदा कह फूलों की खेती करते हैं। 10 साल पहले उन्होंने एक कनाल जमीन में फलों की खेती और नर्सरी शुरू की थी, जो आज 13 एकड़ में फैली है।
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यह बदलाव न केवल उनकी आमदनी को कई गुना बढ़ा रहा है, बल्कि ग्रामीणों के लिए रोजगार का भी बड़ा साधन बन गया है। वह प्रतिमाह लाख-डेढ़ लाख रुपए कमाते हैं। वह क्षेत्र में विविधीकरण के जरिए मिसाल बने हुए हैं।
खेतीबाड़ी का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया
54 वर्षीय हरजिंदर ग्रैजुएशन हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने खेतीबाड़ी का कोई औपचारिक प्रशिक्षण हासिल नहीं किया। पहले वह पारंपरिक खेती करते थे। कुछ समय तक मधुमक्खी पालन भी काम किया, जिसमें वह विफल हो गए। उसके बाद उन्होंने पारंपरिक खेती की तरफ मुड़ने की बजाय वर्ष 2015 में छोटे स्तर पर, एक कनाल में, फूलों की खेती और नर्सरी शुरू की।
पहले साल घाटा हुआ, प्रयास जारी रखा
इस काम की जानकारी की कमी के चलते पहले साल कमाई की बजाय घाटा हुआ, लेकिन उन्होंने अपने प्रयास जारी रखे। धीरे-धीरे जैसे-जैसे जानकारी बढ़ती गई, वैसे-वैसे विविधीकरण से लैस इस खेती काे बढ़ाते रहे। शुरुआत उन्होंने गुलाब, गेंदा और अन्य सजावटी पौधों से की। धीरे-धीरे इसमें आम, अमरूद, नींबू, पपीते जैसे फलदार पौधों को भी शामिल किया।
दूसरे राज्यों में भी करते हैं सप्लाई
आज उनके यहां हजारों पौधे तैयार किए जाते हैं, जिन्हें आसपास के जिलों के अलावा अन्य राज्यों तक सप्लाई किया जाता है। पौधों की गुणवत्ता और सही देखभाल की बदौलत उनकी नर्सरी को खास पहचान मिली है, जिसमें आधुनिक तकनीक और जैविक खाद का उपयोग किया जाता है। उनके पास ऑनलाइन ऑर्डर भी आते हैं। इस कारोबार में पत्नी का सहयोग रहता है। परिवार में बेटा-बेटी भी हैं।
सफलता और समृद्धि के नए रास्ते खुले
इस प्रगतिशील किसान के अनुसार, यदि सोच बदल दी जाए तो गांव-देहात में भी सफलता और समृद्धि के नए रास्ते खुल सकते हैं। आज प्रदेश के हजारों युवा लाखों रुपए खर्च कर विदेश तो कुछेक गांव छोड़कर बड़े शहरों में कामयाब होने के लिए जाते हैं। अगर गांव में ही रहकर अपने काम पर ही फोकस किया जाए तो तरक्की के नए रास्ते खुल सकते हैं।
