उत्तराखंड ने रजत जयंती पूरी कर ली है, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार गिरीश गुरुरानी मानते हैं कि राज्य को स्थिर राजनीति की जरूरत है। उनके अनुसार पिछले 25 सालों में मैदानी जिलों में विकास हुआ, लेकिन पहाड़ों के कई जिलों में शिक्षा का स्तर अभी बेहतर नहीं है।
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दैनिक भास्कर एप से की गई बातचीत में गुरुरानी कहते हैं कि अगले 25 सालों में उत्तराखंड का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार पहाड़ों के लिए बागवानी, नकदी फसलें, फूड प्रोसेसिंग और छोटे कलेक्शन सेंटर जैसी योजनाओं को कितनी गंभीरता से अपनाती है। उनका दावा है कि यहां फल और ऑर्गेनिक उत्पादों की अपार क्षमता है, लेकिन वह आज भी दिल्ली-एनसीआर बाजार तक नहीं पहुंच पा रहीं।
उन्होंने राज्य की राजनीति, शिक्षा, टूरिज्म और वित्तीय अनुशासन पर भी कई अहम सुझाव दिए हैं… सवाल-जवाब में पढ़िए पूरा इंटरव्यू…
सवाल: आने वाले 25 सालों में आप उत्तराखंड को कहां देखते हैं? जवाब: राज्य आज जहां खड़ा है उसकी शुरुआत 2002 में मुख्यमंत्री रहते एनडी तिवारी ने की थी। उन्होंने बहुत से विजनरी काम किए। पांच सालों में तरक्की हुई। इसी तरह आगे भी उत्तराखंड सही हाथों में और स्थिर राजनीति में होगा तो तरक्की करेगा। आज हिमाचल प्रदेश प्रति व्यक्ति आय में हमसे पीछे है। सही हाथों में नेतृत्व रहेगा तो हम भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में होगें। और अगर हम पर्वतीय जिलों के लिए भी बागवानी, छोटे उद्योग जैसे काम कर पाएं तो 25 सालों में हम विकसित राज्यों की सूची में शामिल होंगे।
सवाल: पर्यटन से अच्छी आय होती है, इसे सबके लिए बेहतर कैसे बनाया जा सकता है? जवाब: उत्तराखंड का बजट का आकार और स्टेट जीडीपी काफी बढ़ी है। पहाड़ पर टूरिज्म काफी बढ़ा है, रोजगार से जोड़ कर इसे और बेहतर किया जा सकता है। पूरे उत्तर भारत को देखें तो उत्तराखंड में सबसे ज्यादा पर्यटक आते हैं। जम्मू कश्मीर से दो गुना व हिमाचल प्रदेश से तीन गुना पर्यटक आते हैं। हम इसको लोगों की आमदनी बढ़ाने से जोड़ सकते है, बड़े होटलों में पर्यटकों के लिए स्थानीय ऑर्गेनिक उत्पाद के काउंटर बनाए जा सकते हैं। ऑर्गेनिक उत्पादों की कीमत में पहाड़ व मैदान के बीच कीमत में अंतर दो गुना है। इसे किसान के लाभ में बदला जा सकता है।

सवाल: पहाड़ी जिलों की प्रतिव्यक्ति आय बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए? जवाब: प्रतिव्यक्ति आय में पहाड़ी और मैदानी जिलों में अंतर तो है, लेकिन पहाड़ी जिलों में इसे बढ़ाने के लिए बागवानी, नकदी फसलें व फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स लगानी होंगी। राज्य के तीन मैदानी जिलों में विकास तेज हुआ है यह अच्छा है, लेकिन अब पर्वतीय जिलों के विकास के लिए फूड प्रसंस्करण उद्योग सहित वहां के अनुकूल उद्योगों को लगाने पर सोचना चाहिए। फल उत्पादन भी बढ़ाना होगा, हमें पहाड़ों में छोटे-छोटे कलेक्शन सेंटर्स बनानें चाहिए, जैसे हिमाचल प्रदेश ने एचपीएमसी बना कर किया है सवाल: कई बड़े स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों के खुलने से राज्य की शिक्षा बेहतर हुई है, क्या आपको लगता है ऐसा है? जवाब: हां, शिक्षा बेहतर हुई है लेकिन देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में ही, कुछ हल्द्वानी में भी। हमें स्कूल और कॉलेज नहीं शिक्षा का स्तर बढ़ाने की जरूरत है। लेकिन पहाड़ों पर सरकारी स्कूल ही हैं, उन स्कूलों से बच्चों का मोहभंग इसलिए हो रहा है क्योंकि वहां समुचित पढ़ाई की व्यवस्था नहीं हो पा रही है। बेहतर करने के लिए हमें पहली कक्षा से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानी चाहिए। देहरादून के निजी विश्वविद्यालय अच्छे हैं। पूरे देश के विभिन्न राज्यों से बच्चे यहां पढ़ने आ रहे हैं। लेकिन जब हम चंपावत, चमोली, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग में जाते हैं तो वहां शिक्षा का हाल ठीक नहीं है।
सवाल: क्या कर्ज भी सरकार के लिए चुनौती हैं? जवाब: राज्य के पास देहरादून में एक विधानसभा है, जिसमें काम चल रहा है, गैरसैंण में एक और बन गया, तीसरा विधानसभा रायपुर में क्यों बनाना चाह रहें है। 25 साल में राजधानी को लेकर असमंजस है। राजनीतिक दबाव काम कर रहा है। राजधानी तय होने पर राज्य की दिशा भी तय हो जाएगी।

सवाल: विधानसभा में इस बार पहाड़ बनाम मैदान, कुमाऊ बनाम गढ़वाल की बातें उठी थीं, क्या वो सही था? जवाब:राज्य बनने के बाद भी बंटवारे की राजनीत ठीक नही हैं। राजनीतिक लाभ के लिए जो उत्तराखंड को पहाड़ बनाम मैदान, या कुंमाऊ बनाम गढ़वाल में बांटते हैं वे राज्य के हितैषी नही हैं ऐसे लोग उत्तराखंड राज्य के शत्रु हैं, ऐसा राजनैतिक लाभ के लिए करते हैं, लेकिन यह राज्य के लिए बहुत घातक है।
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