मुख्य बातें

4 करोड़ लाशों पर बैठा था यूरोप: 76 साल पहले कैसे बना NATO, क्या अब बिखरना तय है; आखिरी कील ठोक रहे ट्रम्प

4 करोड़ लाशों पर बैठा था यूरोप:  76 साल पहले कैसे बना NATO, क्या अब बिखरना तय है; आखिरी कील ठोक रहे ट्रम्प


ग्रीनलैंड की सबसे मशहूर इंफ्लूएंसर हैं क्युपानुक ओलसेन। वो अपने 5 लाख फॉलोअर्स को बर्फ पर सूखती मछलियां, पारंपरिक सूप और 24 घंटे लंबी बर्फीली रातों की कहानियां सुनाती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों से उनकी टाइमलाइन बदल गई है। अब उसमें एक नया विषय घुस

.

करीब 21 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल वाला ग्रीनलैंड दुनिया का सबसे बड़ा आइलैंड है। इसका 80% हिस्सा बर्फ से ढका हुआ है। यहां करीब 56 हजार लोग रहते हैं। यहां डेनमार्क का शासन था, लेकिन 2009 में स्वशासन लागू हुआ। यहां दुर्लभ खनिज और दुनिया का 10% ताजा पानी मौजूद है। ट्रम्प इसे अमेरिका में मिलाना चाहते हैं।

थोड़ा पीछे चलते हैं। तारीख- 4 मार्च 2025। वॉशिंगटन डीसी की एक शाम। अमेरिकी कांग्रेस का संयुक्त सत्र चल रहा था। ट्रम्प मंच पर खड़े बोल रहे थे। उन्होंने अचानक कहा कि अमेरिका को हर हाल में ग्रीनलैंड लेना पड़ेगा। बात इतनी बेहिचक थी कि संसद में बैठे सांसद हंस पड़े, लेकिन ट्रम्प मजाक नहीं कर रहे थे।

14 जनवरी 2026, उन्होंने डेनमार्क और ग्रीनलैंड के विदेश मंत्री से साफ कह दिया- ग्रीनलैंड नेशनल सिक्योरिटी का मसला है। उस पर पूरी तरह अमेरिकी अधिकार चाहिए। फिर उन्होंने चेतावनी की तरह वेनेजुएला का नाम लिया, जिसके राष्ट्रपति मादुरो को उन्होंने उठवा लिया था। मतलब साफ था कि जरूरत पड़ी तो ताकत का इस्तेमाल करने में हिचक नहीं होगी।

ट्रम्प के इन बयानों ने यूरोप के डिफेंस हेडक्वार्टर्स में भी हलचल मचा दी। डेनमार्क ने ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिक तैनात किए। जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी अमेरिका के खिलाफ एकजुटता दिखाई। कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने धमकी भरे लहजे में कह दिया- ‘दोस्तों, अब तख्तियां उतार देने का समय आ गया है।’

नाटो के 76 साल के इतिहास में यह दृश्य कभी नहीं देखा गया था। एक ऐसा सैन्य गठबंधन, जो इस वादे पर खड़ा था कि ‘एक पर हमला, सब पर हमला’। अब उसके सदस्य एक-दूसरे पर हमलावर हैं।

नाटो का जन्म द्वितीय विश्व युद्ध के मलबे से उपजी एक कड़वी मजबूरी थी। 3.65 करोड़ लोगों की मौत के बाद यूरोप एक कब्रिस्तान बन चुका था।

सोवियत रूस के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन को इस तबाही में एक अवसर नजर आया। उनका मानना था कि पूंजीवादी व्यवस्था यूरोप को इस हाल तक लाई है और अब सिर्फ कम्युनिस्ट विचारधारा ही इस डूबते महाद्वीप को बचा सकती है।

1948-49 के बीच सोवियत संघ ने दो बड़े कदम उठाए। पहला- फरवरी 1948 में चेकोस्लोवाकिया की लोकतांत्रिक सरकार को गिराकर सोवियत समर्थक कम्युनिस्टों के हाथों में सत्ता सौंप दी गई।

दूसरा कदम और भी ज्यादा डरावना था। 24 जून 1948 की शाम, सोवियत संघ ने पश्चिमी बर्लिन की नाकेबंदी शुरू कर दी। रेल लाइनों पर ताले लग गए, सड़कें बंद हो गईं, जलमार्ग सूख गए। पश्चिमी बर्लिन भूख और अंधेरे में डूब गया था।

इसी बीच वॉशिंगटन में बैठे अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने एक ऐसा फैसला लिया, जो इतिहास बन गया- बर्लिन एयरलिफ्ट। अमेरिकी विमान महीनों तक आसमान के रास्ते बर्लिन में खाना, दवाइयां और ईंधन पहुंचाते रहे। यह केवल राहत अभियान नहीं था, यह सोवियत दबाव के खिलाफ खुली चुनौती थी।

यूरोप समझ चुका था कि सोवियत संघ एक-एक करके देशों को झुकाने की कोशिश कर रहा है। और यह भी साफ था कि बिना सामूहिक सुरक्षा के वह टिक नहीं पाएगा।

इसी मजबूरी में 4 अप्रैल 1949 को वॉशिंगटन में 12 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी NATO का जन्म हुआ। तस्वीर ये रही…

1949 में नाटो एग्रीमेंट पर दस्तखत करते अमेरिकी प्रेसिडेंट हैरी एस ट्रूमैन और उनके पीछे खड़े अन्य 11 नाटो सदस्य।

1949 में नाटो एग्रीमेंट पर दस्तखत करते अमेरिकी प्रेसिडेंट हैरी एस ट्रूमैन और उनके पीछे खड़े अन्य 11 नाटो सदस्य।

इस दौरान मौजूद ब्रिटिश जनरल और नाटो के पहले महासचिव लॉर्ड इस्मे ने इसके मकसद को एक ही वाक्य में समेट दिया- ‘रूसियों को बाहर रखना, अमेरिकियों को अंदर रखना और जर्मनों को दबाकर रखना।’

इसे ‘इस्मे डॉक्ट्रिन’ के नाम से जाना जाता है। इस पूरे समझौते की आत्मा थी नाटो का आर्टिकल 5। इसके तहत एक सदस्य पर हमला, सभी पर हमला माना जाएगा।

नाटो के जन्म के महज पांच महीने बाद, 29 अगस्त 1949 की सुबह, कजाखस्तान के सेमिपालातिंस्क मैदान में जमीन कांप उठी। एक जबरदस्त धमाका हुआ- सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कर दिया था। इसी के साथ परमाणु हथियारों पर अमेरिका का एकाधिकार खत्म हो गया।

नाटो की आत्मा माने जाने वाले अनुच्छेद-5 को लेकर अमेरिका कभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं था। जब यह अनुच्छेद लिखा जा रहा था, तब अमेरिकी सीनेट के भीतर एक गहरी बेचैनी थी। सीनेटरों को डर था कि कहीं यह समझौता अमेरिका को ऐसे युद्ध में न धकेल दे, जहां से लौटने का कोई रास्ता न बचे।

इसलिए अनुच्छेद-5 की भाषा जानबूझकर धुंधली रखी गई। उसमें साफ लिखा गया कि हर देश ‘वही कार्रवाई करेगा, जिसे वह आवश्यक समझे।’

इस धुंधलेपन की असली तस्वीर 1949 के एक छोटे, लेकिन बेहद अहम किस्से में दिखती है। समझौते पर बातचीत के दौरान अमेरिकी विदेश उप-सचिव रॉबर्ट लवेट से सीधा सवाल पूछा गया- अगर लंदन पर हमला होता है, तो क्या उसे वॉशिंगटन पर हमला माना जाएगा?

लवेट ने बिना हिचक जवाब दिया- ’नहीं, सर।’

यह जवाब नाटो की उस कमजोरी को उजागर करता है, जिसे बाद में ‘पवित्र गठबंधन’ जैसे शब्दों से ढक दिया गया। आज डोनाल्ड ट्रम्प इसी अंतर्विरोध और कमजोरी का राजनीतिक फायदा उठाते नजर आते हैं।

1950 के दशक की शुरुआत में नाटो ने खुद को एक संगठित मिलिट्री मशीन में बदलना शुरू किया। 19 दिसंबर 1950 को अमेरिका के राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर को नाटो का पहला सुप्रीम कमांडर नियुक्त किया गया, लेकिन आइजनहावर इस भूमिका से उत्साहित नहीं थे।

1951 में नाटो के पहले सुप्रीम कमांडर अमेरिकी प्रेसिडेंट आइजनहावर (दाएं से पहले) नाटो के हेडक्वार्टर पर लगने वाले पहले झंडे के साथ।

1951 में नाटो के पहले सुप्रीम कमांडर अमेरिकी प्रेसिडेंट आइजनहावर (दाएं से पहले) नाटो के हेडक्वार्टर पर लगने वाले पहले झंडे के साथ।

1951 की सर्दियों में आइजनहावर ने अपने सलाहकारों को चेतावनी दी- ‘हम अपनी सेनाओं के साथ दूर-दराज की सीमाओं की रखवाली करने वाला आधुनिक रोम नहीं बन सकते।’ विडंबना यह है कि अगले 76 वर्षों में अमेरिका धीरे-धीरे पूरी दुनिया की पुलिसिंग में उलझता चला गया।

शीत युद्ध की असली रीढ़ परमाणु हथियार थे। 1950 और 1960 के दशक में यूरोप हर रात इसी डर में जीता था कि कहीं कोई बटन न दब जाए। ‘म्युचुअल एश्योर्ड डिस्ट्रक्शन’ यानी MAD का सिद्धांत यही कहता था- अगर तुम मारोगे, तो हम भी मरेंगे, और तुम्हें भी साथ ले जाएंगे।

नाटो परमाणु बम के साए से बचने के लिए और ज्यादा परमाणु बम जमा करता चला गया।

MAD नीति के तहत नाटो ने हजारों परमाणु हथियार रखने का लक्ष्य तय किया था। रणनीति साफ थी- इतनी क्षमता होना कि सोवियत संघ की लगभग 30% आबादी और 70% औद्योगिक ढांचे को नष्ट किया जा सके। यह सुरक्षा की भाषा नहीं थी, यह विनाश के संतुलन की भाषा थी।

7 मार्च 1966 को फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने नाटो से बाहर निकलने की घोषणा कर दी थी। डी गॉल का सवाल सीधा था- अगर सोवियत मिसाइलें पेरिस की ओर बढ़ें, तो क्या अमेरिका न्यूयॉर्क को दांव पर लगाकर फ्रांस को बचाएगा? उन्हें इस पर जरा भी भरोसा नहीं था।

डी गॉल ने अमेरिकी सैनिकों को फ्रांस छोड़ने का आदेश दे दिया। कहा जाता है कि उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन ने व्यंग्य में पूछा था- ‘क्या हमें फ्रांस में दफन अपने सैनिकों की कब्रें भी साथ ले जानी होंगी?’ यह तंज नाटो के भीतर मौजूद गहरी भावनात्मक और रणनीतिक दरारों को उजागर करता है।

कई दशकों की दूरी के बाद, साल 2009 में फ्रांस दोबारा नाटो की इंटिग्रेटेड मिलिट्री स्ट्रक्चर का हिस्सा बना, लेकिन डी गॉल का सवाल आज भी हवा में तैर रहा है- सुरक्षा के वादे पर कितना भरोसा किया जा सकता है?

26 दिसंबर 1991 की एक बर्फीली शाम, मॉस्को के क्रेमलिन में इतिहास ने चुपचाप करवट बदली। जिस किले से दशकों तक दुनिया की किस्मत तय होती रही थी, वहां से सोवियत संघ का लाल झंडा हमेशा के लिए उतार लिया गया। 40 साल से चला आ रहा शीत युद्ध, जिसमें देशों को मोहरे बनाकर खेला गया, आखिरकार खत्म हो गया। ऐसा लगा मानो नाटो का काम पूरा हो चुका हो।

लेकिन नाटो इतिहास का हिस्सा बनने के बजाय और फैलने लगा। यही वह दौर था, जिसे बाद में ‘मिशन क्रीप’ कहा गया, यानी रेंगते हुए रूस के आंगन तक पहुंचने का अभियान। ये एक कसम के टूटने जैसा था।

दरअसल, 9 फरवरी 1990 की दोपहर, अमेरिकी विदेश मंत्री जेम्स बेकर सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव से मिलने पहुंचे। बातचीत का मुद्दा था- जर्मनी से सोवियत सेनाओं की वापसी। बदले में एक वादा किया- अगर रूस जर्मनी खाली कर देता है, तो नाटो रूस की सीमा की ओर एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा।

यह वादा कभी कागज पर नहीं उतरा, लेकिन रूस की सामूहिक याद्दाश्त में यह एक टूटी हुई कसम बनकर रह गया। जब 1999 से 2004 के बीच नाटो पूर्वी यूरोप तक फैलता चला गया, तो मॉस्को में इसे एक ऐतिहासिक विश्वासघात के रूप में देखा गया।

प्रसिद्ध अमेरिकी रणनीतिकार जॉर्ज केनन ने 1997 में ही चेतावनी दी थी कि नाटो का यह विस्तार अमेरिका की सबसे घातक रणनीतिक भूल साबित होगा। उनकी चेतावनी उस समय अनसुनी कर दी गई।

7 मई 2000 को जब व्लादिमीर पुतिन सत्ता में आए, तब तक पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य नाटो में शामिल हो चुके थे। इसके बावजूद पुतिन शुरुआती वर्षों में पश्चिम से टकराव से बचते रहे। उन्होंने यहां तक कहा कि रूस नाटो की सदस्यता की संभावना से इनकार नहीं करता, लेकिन नाटो रूस को बराबरी का भागीदार मानने को तैयार नहीं था- उसे सिर्फ एक थर्ड रेट पावर समझा गया।

साल 2004 में नाटो ने एस्टोनिया, लातविया और लिथुआनिया समेत सात पूर्व सोवियत गणराज्यों को अपने साथ जोड़ लिया। यह केवल विस्तार नहीं था- यह रूस की दहलीज तक सीधी दस्तक थी। पुतिन ने इसे रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देखा।

10 फरवरी 2007 की शाम, म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में पुतिन का संयम टूट गया था। मंच से उन्होंने नाटो देशों से तीखे शब्दों में पूछा- ‘उन वादों का क्या हुआ कि नाटो एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगा? आखिर रूस के करीब आप अपने आप को किसके खिलाफ फैला रहे हैं?’ यहीं से सहयोग की बची-खुची उम्मीद भी खुली दुश्मनी में बदलने लगी थी।

2008 के बुखारेस्ट शिखर सम्मेलन शुरू होने से पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ऐलान कर दिया कि जॉर्जिया और यूक्रेन भी ‘नाटो के सदस्य बनेंगे।’ पुतिन के लिए यह बयान ऐसा था, मानो उनके आंगन में अमेरिकी मिसाइलें लगाने की घोषणा कर दी गई हो।

2008 के बुखारेस्ट समिट में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश। पुतिन को आशा थी बुश अपने बयान पर कायम नहीं होंगे।

2008 के बुखारेस्ट समिट में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश। पुतिन को आशा थी बुश अपने बयान पर कायम नहीं होंगे।

राजनीति विज्ञान में इसे ‘सुरक्षा दुविधा’ कहा जाता है- जहां नाटो का हर ‘रक्षात्मक’ कदम रूस को सीधा ‘आक्रामक’ दिखाई देता है। यही सोच 2008 के जॉर्जिया युद्ध और आगे चलकर यूक्रेन संकट की बुनियाद बनी। पुतिन अपनी नाराजगी पहले ही उजागर कर चुके थे।

साल 2011 में, लीबिया के शासक मुअम्मर गद्दाफी को सत्ता से हटाने के लिए नाटो ने हवाई हमले किए। रूस ने इसे केवल एक अमानवीय हस्तक्षेप नहीं माना, बल्कि अपने रणनीतिक हितों, खासतौर पर तेल और गैस व्यापार पर सीधा हमला समझा। अविश्वास और गहराता चला गया।

फिर 2014 आया। यूक्रेन में पश्चिम समर्थक सरकार के सत्ता में आते ही पुतिन ने क्रीमिया का विलय रूस में कर लिया। यहीं से नाटो और रूस के बीच ‘छद्म युद्ध’ की शुरुआत मानी जाती है। अमेरिका और नाटो के देश यूक्रेन को हथियार देने लगे और रूस युद्ध के मौके तलाशने लगा।

साल 2017। राष्ट्रपति बनते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने नाटो सहयोगियों को साफ शब्दों में सुना दिया- अपने हिस्से का पैसा खर्च करो, नहीं तो सुरक्षा भूल जाओ। उनके लिए नाटो कोई विचारधारा नहीं था, बल्कि एक कारोबारी सौदा था। इसी सोच ने नाटो की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी- भरोसा।

यूरोप ने पहली बार गंभीरता से सोचना शुरू किया कि मुश्किल समय में अमेरिका पर भरोसा किया जा सकता है क्या?

नवंबर 2019 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक ऐसी बात कही, जिसने पूरी अटलांटिक दुनिया को झकझोर दिया- ‘नाटो ब्रेन-डेड है।’ असल में अमेरिका ने नाटो सहयोगियों से सलाह किए बिना ही सीरिया से अपनी सेना वापस बुला ली थी। दरअसल, वो यह बता रहे थे कि अगर गठबंधन में संवाद और भरोसा मर जाए, तो शरीर जीवित तो दिख सकता है, पर वो कुछ कर नहीं सकता।

29 अगस्त 1949 के सोवियत परमाणु परीक्षण से लेकर ग्रीनलैंड पर ट्रम्प के बयानों तक, नाटो एक ही सवाल से जूझता रहा है- सुरक्षा भरोसे से आती है या ताकत से? ट्रम्प के दौर में इस सवाल ने और भी डरावना रूप ले लिया। उन्होंने नाटो की सबसे कीमती पूंजी भरोसे को धीरे-धीरे छीलना शुरू कर दिया।

इस भरोसे पर पहला सार्वजनिक प्रहार 25 मई 2017 को ब्रसेल्स में दिखा। नाटो मुख्यालय के उद्घाटन समारोह में ट्रम्प मंच पर खड़े थे। चारों ओर यूरोप के नेता, सामने कैमरे। यह वही मौका था जब हर अमेरिकी राष्ट्रपति परंपरागत रूप से अनुच्छेद 5 को दोहराता है- ‘एक पर हमला, सब पर हमला।’ लेकिन ट्रम्प ने वह वाक्य बोला ही नहीं।

समारोह खत्म होते ही यूरोपीय राजनयिक एक-दूसरे से फुसफुसाने लगे- ‘क्या यह भूल थी, या संकेत?’ उसी शाम जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने कह दिया- अब हमें अपनी किस्मत खुद अपने हाथ में लेनी होगी। यह बयान नाटो के भीतर एक मानसिक भूकम्प था।

इसके बाद जुलाई 2018 की ब्रसेल्स समिट आई। नाटो के इतिहास की सबसे असहज बैठकों में से एक। बंद कमरे में ट्रम्प ने सीधे जर्मनी पर हमला बोला। उनका आरोप था कि जर्मनी रूस से गैस खरीदता है और हम उसे रूस से बचाने की उम्मीद करते हैं। आप रूस के कैदी हैं। कमरे में सन्नाटा पसर गया। नाटो का आर्थिक इंजन कहलाने वाला जर्मनी अचानक समस्या बना दिया गया।

2018 की G-7 मीटिंग की इस तस्वीर में नाटो सदस्य ट्रम्प को घेरते हुए।

2018 की G-7 मीटिंग की इस तस्वीर में नाटो सदस्य ट्रम्प को घेरते हुए।

यहीं से यूरोप को पहली बार साफ दिखने लगा कि अमेरिका की नाराजगी अब रूस से ज्यादा अपने ही सहयोगियों पर है। ट्रम्प ने नाटो को कभी ‘खराब बिजनेस डील’ कहा, कभी ऐसा क्लब बताया, जहां अमेरिका बेवकूफ बनता आया है।

अक्टूबर 2018 में यूरोप की ठंड अचानक और गहरी हो गई। ट्रम्प ने कहा कि अगर कोई छोटा नाटो देश रूस से उलझता है, तो ‘सोचना पड़ेगा’ कि अमेरिका उसकी मदद करे या नहीं। लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया जैसे देशों के लिए यह बयान किसी अलार्म से कम नहीं था।

नीदरलैंड्स के शहर द हेग में मई 2025 की एक सुबह। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों के नेता यहां जमा थे। माहौल में नाटो के 75 साल पूरे होने का जश्न नहीं, बल्कि गहरी बेचैनी थी। सम्मेलन कक्ष के भीतर एक मेज पर एक पतली-सी फाइल रखी थी, जिस पर लिखा था- अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटजी 2025।

यह नाटो के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसा लग रहा था। ट्रम्प की इस रणनीति में नाटो को अब स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं, बल्कि कंडीशनल सर्विस कहा गया है। फरमान सीधा, ठंडा और कठोर था- अपनी जीडीपी का 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करो, वरना पुतिन के टैंकों के सामने अकेले खड़े रहने के लिए तैयार रहो।

कमरे में सन्नाटा था। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह चेतावनी है, सौदा है, या नाटो के अंत की घंटी।

क्या एक दिन ऐसा आएगा जब ग्रीनलैंड में तैनात अमेरिकी बंदूकें पश्चिमी यूरोप की ओर मुड़ जाएंगी? क्या आदेश आएगा- फायर? और अगर ऐसा हुआ, तो क्या दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत नाटो को उसी क्षण खत्म मान लिया जाएगा?

अखिरकार नाटो की सैन्य ताकत में अमेरिका अकेले 42% का हिस्सेदार है। नाटो के करीब 35 लाख सैनिकों में अकेले अमेरिका के 13 लाख हैं। कुल 22400 विमानों में अमेरिका के 14000 हैं। अमेरिका निकला तो नाटो सच में ‘पेपर नाटो’ हो जाएगा।

आज नाटो के अंत की अटकलें सिर्फ अखबारों की सुर्खियों या टीवी डिबेट तक सीमित नहीं हैं। यह सवाल अब रणनीतिक दस्तावेजों, सैन्य मुख्यालयों और राष्ट्राध्यक्षों के भाषणों में घूम रहा है- क्या नाटो सच में खत्म हो सकता है? और अगर हुआ, तो क्या दुनिया नए-नए गठबंधनों में बंट जाएगी?

नाटो पर दशकों तक काम करने वाले इतिहासकार मार्क ट्रेचटेनबर्ग अपनी किताब ए कंस्ट्रक्टेड पीस में लिखते हैं कि गठबंधन अक्सर किसी धमाके के साथ नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे, भरोसे के घटने से खोखले होते हैं।

अगर नाटो कमजोर पड़ेगा, तो वह किसी एक तारीख को बंद नहीं होगा। उसके झंडे फहराते रहेंगे, शिखर सम्मेलन होते रहेंगे, घोषणाएं जारी रहेंगी, लेकिन अनुच्छेद 5 का भरोसा सिर्फ एक औपचारिक वाक्य बन जाएगा। यही वह स्थिति है जिसे कई विश्लेषक पेपर नाटो कहते हैं।

2022 की नाटो समिट की ये तस्वीर ऐतिहासिक है क्योंकि नाटो सदस्यों की नजरें एक तरफ हैं और ट्रम्प की बिल्कुल अलग

2022 की नाटो समिट की ये तस्वीर ऐतिहासिक है क्योंकि नाटो सदस्यों की नजरें एक तरफ हैं और ट्रम्प की बिल्कुल अलग

कुछ रणनीतिकार मानते हैं कि आज अमेरिका की असली चुनौती चीन है, रूस नहीं। इसलिए रूस से तनाव कम करके चीन को संतुलित करना चाहिए। इसे ‘रिवर्स निक्सन स्ट्रैटजी’ कहा जाता है।

जैसे- 1970 के दशक में राष्ट्रपति निक्सन ने चीन को सोवियत संघ से अलग किया था। आज डोनाल्ड ट्रम्प जब पुतिन को ‘दोस्त’ कहते हैं, तो इसी रणनीति की झलक दिखती है, लेकिन समस्या यह है कि रूस खुद को अपमानित महसूस करता है।

राजनीतिक वैज्ञानिक जॉन मियर्सहाइमर साफ कहते हैं- ‘महाशक्तियां अपमान को भूलती नहीं हैं, वे उसका जवाब देती हैं।’ यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के लिए बराबरी का भरोसा और भी दूर चला गया है।

भविष्य की दुनिया शायद साफ-सुथरे खेमों में बंटी नहीं होगी। यह एक अस्थिर बहुध्रुवीय व्यवस्था होगी, जहां चीन आर्थिक और तकनीकी शक्ति बनेगा, अमेरिका सैन्य और वित्तीय ताकत रखेगा, रूस ऊर्जा और सैन्य बल से प्रासंगिक रहेगा और यूरोप लगातार तय करता रहेगा कि वह शक्ति बनना चाहता है या सिर्फ बाजार।

नाटो का भविष्य इसी अस्थिरता में छिपा है। अगर नाटो बचा, तो पहले जैसा नहीं रहेगा। वह ज्यादा यूरोपीय और कम अमेरिकी होगा। अगर वह टूटा, तो दुनिया ज्यादा सुरक्षित नहीं, बल्कि ज्यादा अनिश्चित हो जाएगी। जैसा कि विंस्टन चर्चिल ने चेताया था-

‘मित्र देशों के आपसी असुरक्षा से लड़ने से भी बदतर केवल एक ही चीज है और वह है मित्र को साथ लिए बिना दुश्मन से लड़ना।’

———

References…

  • इज देयर लाइफ आफ्टर नाटो- मार्क ट्राख्टेनबर्ग
  • ऐसेसिंग नाटोज रूल-अमेरिकी कांग्रेस रिसर्च सर्विसेज
  • नाटो एंड ट्रम्प- फैबराइस पोथियर
  • ए न्यू फॉरेन पॉलिसी- जेफ्री डी साक्स
  • द ट्रैजेडी ऑफ ग्रेट पावर पॉलिटिक्स- जॉन मियर्सहाइमर



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *