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रिम्स में दवा व्यवस्था की हकीकत चौंकाने वाली है। डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाएं अस्पताल के नि:शुल्क दवा केंद्र, जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी में भी उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं। दैनिक भास्कर की ग्राउंड इन्वेस्टिगेशन में ये बातें सामने आई हैं। इन्वेस्टिगेशन मंगलवार दोपहर 1 बजे से 3:30 बजे के बीच की गई। इस दौरान करीब 60 मरीजों के पर्चे जुटाए गए। हर पर्चे में औसतन 4-5 दवाएं लिखी गई थीं। पर तीनों केंद्र और दुकान मिलाकर भी पूरी दवा देने में फेल रहे। ओपीडी से आईपीडी तक जो दवा रिम्स के डॉक्टर लिख रहे हैं, उनमें से 25% भी नि:शुल्क दवा केंद्र में उपलब्ध नहीं हैं। रिम्स प्रबंधन लगातार दावा करता है कि अस्पताल में दवाओं की कोई कमी नहीं है। मेडिसिन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है। हकीकत यह है कि अस्पताल परिसर में एक साथ संचालित नि:शुल्क दवा केंद्र, जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसी तीनों मिलकर भी पर्चे में लिखी गई पूरी दवा नहीं दे पा रहे हैं। मरीजों को दवा के लिए यहां-वहां भटकना पड़ रहा है। कई जरूरी दवाएं पूरी तरह नदारद हैं। हैरानी… 60 पर्चों में से 13 पर लिखी दवाएं पढ़ ही नहीं सके दुकानदार पड़ताल के दौरान एक और गंभीर पहलू सामने आया। करीब 60 पर्चों में से 13 पर्चे ऐसे थे, जिनमें लिखी दवाओं के नाम तक दुकानदार ठीक से पढ़ नहीं सके। यह बहुत ही हैरानी करने वाली बात थी। यह न सिर्फ मरीजों की परेशानी बढ़ती है, बल्कि इससे गलत दवा मिलने का खतरा भी बना रहता है। केस 1- मरीज को भी नहीं मिली बेसिक दवा : मेडिसिन विभाग में भर्ती चांदनी कुमारी के परिजन दवा के लिए भटकते दिखे। पर्चे में 5 दवाएं लिखी थीं, पर पैरासिटामोल आईवी तक खरीदने को कहा गया। दवा अस्पताल के स्टॉक में नहीं थी। मजबूरन परिजनों को तीन पीसीएम आईवी खरीदनी पड़ी। केस 2- ओपीडी मरीज को भी दवा नहीं मिली ओपीडी में पहुंचे सतेन साहू को डॉक्टर ने 4 दवाएं लिखीं। कैप्सूल डीडीआर 60एमजी, टैबलेट कोबाडेस सीजेड, सिरप लेक्टेहेप और टैबलेट लेसोमेग। इनमें से एक भी दवा नि:शुल्क दवा केंद्र में उपलब्ध नहीं थी। सभी गैस व कब्ज से जुड़ी दवाएं थीं। 66 दवाएं स्टॉक में, पर डॉक्टर कुछ और लिख रहे : नि:शुल्क दवा केंद्र में 66 प्रकार की दवाएं उपलब्ध होने का दावा किया जाता है, जिसमें एमॉक्सीसिलीन, सिटीकोलिन, ऑन्डासेट्रॉन, प्रोप्रानॉल, लीवोफ्लोक्सासिन, मेट्रोनिडाजोल, पेंटापराजोल, कैल्शियम एंड विटामिन डी3, ओआरएस, माउथवाश क्लोरेक्सिडीन, नॉरफ्लोक्सासिन, मॉक्सीफ्लैग, ओलोप्टाडीन, टायसिन शामिल हैं। लेकिन डॉक्टर जिन दवाओं को लिख रहे हैं, उनमें से अधिकांश इस सूची में नहीं हैं। पहले भी रिम्स निदेशक दवा की कमी पर दवा चोरी जैसा दे चुके हैं बयान… डॉ. इरफान अंसारी के निरीक्षण के दौरान एक युवक निजी दुकान से दवा खरीदकर लौट रहा था। मंत्री ने पूछ दिया कि दवा क्यों खरीदकर लानी पड़ रही है। निदेशक ने स्वास्थ्य मंत्री के सामने कह दिया था कि लगता है अस्पताल से दवाएं चोरी हो रही हैं, जिसके कारण स्टॉक में कमी आ जाती है। सिस्टम पर बड़ा सवाल : मरीज को भी दवा नहीं मिल पा रही, जिम्मेदार कौन? रिम्स जैसे बड़े संस्थान में अगर भर्ती मरीज को भी बेसिक दवा नहीं मिल पा रही है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर विफलता है। मरीजों को मुफ्त इलाज का भरोसा देकर अस्पताल बुलाया जाता है, लेकिन अंत में उन्हें जेब से पैसा खर्च कर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
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