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अनुवाद इतना अच्छा कि दोबारा पंजाबी में लिखने का मन हुआ – Chandigarh News

अनुवाद इतना अच्छा कि दोबारा पंजाबी में लिखने का मन हुआ – Chandigarh News

कहानी पढ़ते-पढ़ते इसमें इतना खो गया कि लोग इसे हिंदी से पंजाबी में लिखा जाए। मगर बाद में याद आया कि ये तो पहले से ही पंजाबी से हिंदी में अनूदित है। ये लेखक का कमाल है कि उन्होंने कैसे खूबसूरती से हिंदी में कहानी की वास्तविकता को गहराई दी। लेखक भगत वीर सिंह ने कुछ इन्हीं शब्दों में कहानी संग्रह “नयन भोग’ पर अपने विचार रखे। शनिवार को संग्रह को विमोचन सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी-17 में किया गया। साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति द्वारा आयोजित इस विमोचन कार्यक्रम में संग्रह के मूल लेखक गोवर्धन गब्बी और अनुवादक डॉ. जसविंदर बिंद्रा भी शामिल हुए। संग्रह में स्त्री-पुरुषों के संबंधों पर आधारित 10 कहानियां हैं। जिसे गोवर्धन ने वर्ष 2002 से 2023 तक लिखा। उन्होंने कहा – सभी कहानियां पुरुष और स्त्री संबंधों को वैसे ही सामने रखती हैं जैसे हमेशा से रहें हैं। ये आईने की तरह सामने आएंगी, पाप और पुण्य से परे जीवन को विश्लेषित करती हुई। इसे लोग अश्लील कहते रहे, मगर उन्हें समझना होगा कि अब लिव इन से लेकर सिचुएशन शिप तक रिश्तों में आ चुकी है। ऐसे में ये वर्तमान को भी उसी रूप से बताती हैं। डॉ. जसविंदर ने कहा – सभी कहानियां पुरुष-स्त्री के संबंधों को अलग दृष्टिकोण से पेश करती है। इनका सिलसिला आदिम जगत से चला आ रहा है। इसलिए यह संबंध न नवीन है न ही आधुनिक दौर की उपज। वरिष्ठ साहित्यकार विजय कपूर ने कहा कि ये कहानियां आधुनिक जीवन की विसंगतियों का संपूर्ण लेखा-जोखा है। समालोचक डॉ विमल कालिया ने संग्रह को प्रयोगात्मक और समाज की तरह गतिशील बताया। साथ ही कहानियों को खुले मन से पढ़ने की जरूरत पर बल दिया। डॉ अश्वनी शांडिल्य ने इसे अनैतिक यौन संबंधों के परिप्रेक्ष्य में मनुष्य के चरित्र का चित्रण बताया। कवयित्री सीमा गुप्ता ने कहानियों में पीड़ित स्त्री को भी आत्मविश्वासी के रूप में दिखाने पर बात की। कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें गीतकार गिन्नी दीवान ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने कविता “ कुछ भी पहले जैसा कहां रहा? की प्रस्तुति दी। अर्चना आर सिंह ने “जब औरत चुप हो जाती है, तो लफ्ज कहीं सो जाते हैं, विजय ने “​जब आसमान से लोहे की बारिश होती है, और जमीन अपने ही बच्चों का रक्त पीने लगती है और रवीन्द्र टंडन ने “मां चौंके में होती थी जब, बहती थी अविरल तब’ का पाठ किया। परमिंदर सोनी ने सम्मेलन आगे बढ़ाते हुए कविता “यह यादों की चुभन, आरके सौंध ने “कुछ तो रह गई होगी कमी तेरे निजाम में एक खुदा, एसके सिंह ने “मैं रोज पहनकर निकलता हूं एक लोहे का जूता’ और कुसुम धीमान ‘कलिका’ ने “मां की सेवा है प्रभु सेवा’ का पाठ किया। इसके बाद अन्नू रानी शर्मा, आरके “सुख़न’, अशोक वडेरा, शीनू वालिया, शिप्रा सागर, शहला जावेद, राजिंदर सराओ, डॉ पारस बमोला, रश्मि शर्मा “रश्मी, निर्मल सूद, मीना सूद, ममता ग्रोवर, करीना मदान, डॉ. नीरू मित्तल नीर, दर्शना सुभाष पाहवा, बीबी शर्मा और अलका कांसरा ने कविताओं का पाठ किया। गोष्ठी के तीसरे सत्र में विमल कालिया ने “जमीन-आसमान’ कहानी का पाठ किया।



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