चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) में पंजाबी भाषा को लेकर उठे विवाद से पंजाब की राजनीति भी गरमा गई है। इस मामले में अब आम आदमी पार्टी के श्री आनंदपुर साहिब के सांसद मालविंदर सिंह कंग की तरफ से उपराष्ट्रपति एवं यूनिवर्सिटी के चांसलर सीपी राधाकृष्ण्न को पत्र लिखकर तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने साफ कहा है कि पंजाबी भाषा को हर बोर्ड पर सम्मान और प्रमुखता के साथ तुरंत बहाल किया जाना चाहिए। हम अपनी ही संस्था से अपनी मातृभाषा को व्यवस्थित तरीके से मिटाने की कोशिश कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। पंजाब देख रहा है। पंजाब यूनिवर्सिटी की आत्मा को हाईजैक नहीं होने दिया जाएगा। कंग का कहना है कि पंजाब की शान और पहचान पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ एक बार फिर अपनी आत्मा पर हो रहे हमले का सामना कर रही है। यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा लगाए गए नए साइन बोर्ड्स में पंजाबी (गुरमुखी) भाषा को पूरी तरह से हटाकर केवल ऊपर हिंदी और साथ में अंग्रेज़ी को जगह दी गई है। यह कोई गलती नहीं, बल्कि पंजाब की सांस्कृतिक पहचान और इस धरती की मातृभाषा को मिटाने की एक सोची-समझी साजिश है। अब तीन प्वाइंटों में जानिए सारा मामला पंजाबी को मिटाना संस्थान की पहचान मिटाने जैसा
मैं यह पत्र भारी मन और जिम्मेदारी की भावना के साथ लिख रहा हूं। पंजाब के एक बेटे, पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान सांसद होने के नाते, इस यूनिवर्सिटी का मेरे जीवन में खास स्थान है। इस संस्थान ने मुझे नेतृत्व और अपने क्षेत्र के गौरव की सेवा करना सिखाया है। आज मैं आपका ध्यान एक ऐसे मुद्दे की ओर दिलाना चाहता हूं, जो इस महान संस्थान की आत्मा से जुड़ा हुआ है। मुझे जानकारी मिली है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन ने नए साइनबोर्ड और नेमप्लेट लगाए हैं, जिनमें हिंदी और अंग्रेजी को तो जगह दी गई है, लेकिन पंजाबी (गुरमुखी) को जानबूझकर हटा दिया गया है। जिस यूनिवर्सिटी का नाम और पहचान पंजाब की संस्कृति और मिट्टी से जुड़ी हो, वहां पंजाबी भाषा को हटाना सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उस भाषा को मिटाने जैसा है जो इस संस्थान की पहचान है। 3 राज्यों के लिए ज्ञान का केंद्र
पंजाब यूनिवर्सिटी को पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लोगों के लिए ज्ञान का केंद्र बनाया गया था। इसकी विरासत पंजाबी भाषा और संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। ऐसे समय में जब देश भाषाई विविधता का सम्मान कर रहा है, पंजाबी को नजरअंदाज करना छात्रों, शिक्षकों और पूर्व छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। भविष्य के लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए मैं समझता हूं कि दिव्यांगों के लिए बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाना जरूरी है, लेकिन यह अपनी सांस्कृतिक पहचान की कीमत पर नहीं होना चाहिए। सभी साइन बोर्डों पर हिंदी और अंग्रेजी के साथ पंजाबी को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए। यह केवल भाषा का मुद्दा नहीं, बल्कि पंजाब यूनिवर्सिटी के ऐतिहासिक स्वरूप और क्षेत्रीय भावनाओं के सम्मान का विषय है। इसलिए मैं आपसे विनम्र आग्रह करता हूं कि आप इस मामले में हस्तक्षेप करें और यूनिवर्सिटी प्रशासन को निम्नलिखित निर्देश देने की कृपा करें। सभी पुराने और नए साइनबोर्डों पर पंजाबी (गुरमुखी) को तुरंत शामिल किया जाए। भविष्य में क्षेत्रीय भाषा की अनदेखी न हो, इसके लिए स्पष्ट नीति बनाई जाए। छात्रों और पूर्व छात्रों के प्रतिनिधियों से संवाद कर इस विवाद का समाधान निकाला जाए और परिसर में सौहार्द बनाए रखा जाए। मुझे विश्वास है कि आपके नेतृत्व में पंजाब यूनिवर्सिटी अपनी दशकों पुरानी सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को बनाए रखेगी।
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