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हाईकोर्ट का आदेश- अपीलीय अदालत खुद को सुप्रीम न समझे: विद्या प्रचारिणी सभा विवाद मामले में कहा, उदयपुर कोर्ट की टिप्पणियों को आदेश से हटाया – Udaipur News

हाईकोर्ट का आदेश- अपीलीय अदालत खुद को सुप्रीम न समझे:  विद्या प्रचारिणी सभा विवाद मामले में कहा, उदयपुर कोर्ट की टिप्पणियों को आदेश से हटाया – Udaipur News

जोधपुर हाईकोर्ट ने विद्या प्रचारिणी सभा (भूपाल नोबल्स संस्थान) उदयपुर के विवाद में कड़ा फैसला सुनाया। जस्टिस शुभा मेहता की एकलपीठ ने अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय (अपर जिला न्यायाधीश संख्या-3, उदयपुर) द्वारा प्रतिवादी संख्या-2 पूर्व राजपरिवार के सदस्य और वीपी सभा अध्यक्ष विश्वराज सिंह मेवाड़ के अधिकारों को लेकर की गई टिप्पणियों को पूरी तरह विधि विरूद्ध और अवांछनीय करार देते हुए आदेश से हटा दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत ने अपने क्षेत्राधिकार की सीमाओं को लांघकर विश्वराज सिंह को वे शक्तियां देने का प्रयास किया, जो न तो उस केस का हिस्सा थीं और न ही प्रतिवादी ने उनकी मांग की थी। दरअसल, 54 नए सदस्यों की सदस्यता को चुनौती देने वाले इस मामले में उदयपुर की एडीजे अदालत ने फैसला सुनाते समय विश्वराज सिंह को स्वतंत्र घोषित कर दिया था कि वे जब चाहें विशेष अधिवेशन बुला सकते हैं, समितियां बना सकते हैं और निर्वाचन तक स्थगित कर सकते हैं। हाईकोर्ट ने इस पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा कि अपीलीय कोर्ट ने इस तरह व्यवहार किया। जैसे वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की सर्वोच्च शक्ति का प्रयोग कर रहा हो। कोर्ट ने आदेश के पैरा संख्या 10(7) और 10(11) सहित निर्णायक भाग से विश्वराज सिंह के विशेषाधिकारों वाले सभी अंशों को अपास्त (निरस्त) कर दिया है। हालांकि निचली अदालत का वह हिस्सा बरकरार रहेगा, जिसमें सदस्यता विवाद पर चुनाव रोकने से इनकार किया गया था। अवांछनीय और क्षेत्राधिकार से बाहर कृत्य माना हाईकोर्ट ने अपने 18 पन्नों के विस्तृत आदेश में उदयपुर की अपीलीय अदालत के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा- जब मूल वाद केवल नए सदस्यों की नियुक्ति की अनियमितता पर था, तो कोर्ट ने वीपी सभा अध्यक्ष विश्वराज सिंह मेवाड़ के सर्वोच्च अधिकारों पर टिप्पणी क्यों की? हाईकोर्ट के अनुसार- विश्वराज सिंह ने खुद भी अपने अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए कोई प्रति-प्रार्थना या क्रॉस-अपील दायर नहीं की थी। ऐसे में अपीलीय अदालत द्वारा अपनी मर्जी से उन्हें निर्वाचन स्थगित करने या स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति देना पूरी तरह से अवांछनीय और क्षेत्राधिकार से बाहर का कृत्य है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि निचली अदालत को केवल सामने मौजूद रिकॉर्ड और तथ्यों तक ही सीमित रहना चाहिए था, न कि अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर नए विशेषाधिकार बांटने चाहिए थे।



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