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ब्लैकबोर्ड-लड़के को पेड़ से जंजीर में बांधा, ताला जड़ा: कहा- खाट में बांधने पर खाट सिर पर लेकर घूमता है, मां को जंजीर में बांधा

ब्लैकबोर्ड-लड़के को पेड़ से जंजीर में बांधा, ताला जड़ा:  कहा- खाट में बांधने पर खाट सिर पर लेकर घूमता है, मां को जंजीर में बांधा

खेत के बीचोबीच एक पेड़ से जंजीरों में बंधा युवक जोर-जोर से चीख रहा है- भाग जाऊंगा… भाग जाऊंगा… नाम है- पीरे खान। वह बीच-बीच में पेशाब जाने के लिए कह रहा है। तभी घर से एक महिला बाहर निकलती हैं। नाम है चांदनी। यह पीरे की भाभी हैं। वह पीरे के पास पहुंचती हैं। पहले जंजीर में लगा ताला खोलती हैं, फिर पीरे को खोलती हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे किसी जानवर को खोला जा रहा हो। चांदनी, पीरे को पकड़कर खेत में ले जाती हैं। कुछ देर बाद वापस लौटती हैं। फिर उन्हें उसी पेड़ से जंजीर में बांध देती हैं… और ताला लगा देती हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में मैं नीरज झा इस बार कहानी लाया हूं राजस्थान के बाड़मेर से, जहां अस्पताल न होने से मानसिक रूप से बीमार लोगों को जंजीरों में बांधकर रखा गया है। बाड़मेर की शिव तहसील से 40 किलोमीटर दूर कानासर गांव। तापमान करीब 48 डिग्री। यहां एक घर के चारों तरफ जहां तक नजर जा रही है, सिर्फ रेत नजर आ रही है। दुपट्टे से चेहरा छुपाए चांदनी बताती हैं, ‘एक महीने से सोई नहीं हूं। पीरे की मानसिक हालत बहुत खराब है। रोज शाम को जोर-जोर से चीखते हैं। कंकड़-पत्थर जो हाथ लगे, उसी से मारने दौड़ते हैं। जंजीर खोल दूं, तो रात में भाग जाते हैं। अब तो जिंदगी पहाड़ लगने लगी है,’ यह कहकर चांदनी घर में पानी लाने चली जाती हैं। 22 साल के पीरे खान चारपाई पर बेसुध लेटे हैं। करीब ही उनकी 65 साल की मां कम्मी खातून मटमैले कपड़े पहने बैठी हैं। मेरी नजर पेड़ में बंधी जंजीर और उसमें लगे ताले पर पड़ी। पूछने पर कम्मी खातून मारवाड़ी लहजे में कहती हैं- ‘क्या करूं? बेटे को भेड़-बकरी की तरह इसी पेड़ में जंजीर से बांधकर रखती हूं। जब भी इसकी जंजीर खुली छोड़ी, कई-कई दिन गायब रहा। बड़ी मुश्किल से मिलता है। अब जंजीर में ताला लगा देती हूं, ताकि यह खोलकर भाग न सके। मैं क्या ही बताऊं। बाड़मेर और जोधपुर के अस्पतालों से लेकर दरगाहों तक के चक्कर लगा चुकी हूं, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। पिछले दो सालों से इसे ऐसे ही पेड़ से बांधकर रखा है। खाना-पीना, सोना-जागना, लैट्रिन-पेशाब, सब इसी पेड़ के आस-पास करता है।’ मेरी मोटी जंजीर बंधे पीरे खान के पैर पर जाती है। जंजीर की रगड़ से उनके पैरों की चमड़ी काली पड़ चुकी है। कई जगह छिली हुई है। कम्मी बताती हैं, ‘यह बड़ा बेटा है। 10 साल पहले बीमारी से पति की मौत हो गई। उसके बाद यह भेड़ चराकर कुछ कमाई करता था। अप्रैल 2022 की बात है। अचानक यह बड़बड़ाने लगा। कुछ दिन बाद एक खेत से दूसरे खेत तक दौड़ने लगा। घर के पास ही एक श्मशान घाट है। वहां भी जाता था। गांववाले कहने लगे- यह जरूर श्मशान गया होगा, तभी इसके ऊपर कोई भूत-प्रेत आ गया है। इसे किसी तांत्रिक के पास ले जाओ। एक मौलवी के पास गई। उन्होंने कई ताबीज दिए। बोले- ‘इसके ऊपर भूत का साया है, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।’ हम भी उसी उम्मीद में इसे घर ले आए, लेकिन कुछ ही महीनों में हालत पहले से भी ज्यादा बिगड़ गई। अब यह अचानक जोर-जोर से चीखने लगा। सामने जो भी आता- ईंट, पत्थर या कोई सामान, उठाकर फेंककर मारता। आखिर मजबूर होकर हमने इसे रस्सियों से खाट में बांधना शुरू कर दिया, लेकिन रस्सियां भी ज्यादा देर इसे रोक नहीं पाती थीं। कई बार तो पूरी खाट सिर पर उठाकर गांव की गलियों में निकल पड़ता। एक बार इसे एक दरगाह पर ले गई। मौलाना ने हल्की झाड़-फूंक के बाद कहा- सुबह ठीक से झाड़-फूंक करूंगा। रातभर वहीं रही। सुबह उठी, तो यह गायब था। कई दिनों की तलाश के बाद यह बाड़मेर में भटकता मिला। तब से मेरे रिश्तेदारों ने इसे लाकर पेड़ से बांध दिया। जंजीर खोलकर भागे न इसलिए उसमें ताला भी लगा दिया। इस बातचीत के दौरान पीरे हमें देख रहे हैं। उनके गले में दो-तीन ताबीज हैं। तभी उनके चचेरा भाई शफी घर आ जाता है। शफी मेरे पास बैठकर बताते हैं- दो बार किसी तरह पैसा जुटाकर बाड़मेर और जोधपुर के अस्पताल ले गए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। वहां से भागकर चला आया। क्या करें? दिहाड़ी न करें, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा। दिनभर में ढाई-तीन सौ रुपए ही कमा पाते हैं। कहां से इलाज करवाएं? इससे भी बड़ी दिक्कत बाड़मेर यहां से 90 किलोमीटर और जोधपुर 200 किलोमीटर दूर है।’ शफी बताते हैं- ‘पहले यह बिल्कुल भला-चंगा था, हंसता-बोलता था। लेकिन अब हालत ऐसी हो गई है कि हर त्योहार इसी पेड़ के नीचे पड़ा रहता है। पिछले दो सालों से इसकी पूरी जिंदगी इन्हीं जंजीरों में कैद होकर रह गई है। इसका छोटा भाई नसीर मेरे साथ काम करता है। उसी की कमाई से घर चल रहा है।’ वह बताते हैं- बाड़मेर में कई ऐसे गांव हैं, जहां मानसिक रूप से बीमार लोगों को जंजीर से बांधकर रखा गया है। कानासर से करीब 150 किलोमीटर दूर खारी गांव है। वहां भी ऐसा ही मामला है। अब मैं खारी गांव के लिए निकल पड़ता हूं। खारी पहुंचने के बाद पैदल करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक झोपड़ी के पास पहुंचा, जहां 55 साल के दूद्धा राम मिले। उनकी 45 साल की पत्नी मोड़ी देवी झोपड़ी के बाहर जंजीरों में बंधी पड़ी हैं। दूद्धा राम ने मेरे पैर पकड़ लिए, उनकी आंखें भर आई। कांपती आवाज में बोले- ‘तीन साल से पत्नी को जंजीरों में बांधकर रखा है। इसे देखता हूं, तो कलेजा फट जाता है, लेकिन क्या करूं, कोई रास्ता नहीं बचा।’ 5 साल पहले की बात है। बेटी की शादी की थी। तब यह एकदम ठीक थी। उसके बाद पता नहीं क्या हुआ, अचानक लोगों को मारने-पीटने लगी। एक दिन मेरे हाथ पर जोर से डंडा मार दिया। हाथ में घड़ी थी, इसलिए बच गया, नहीं तो हाथ टूट जाता। इसी तरह घर के पास रास्ते से जो भी आता-जाता, उसे पत्थर फेंककर मारती। गांववालों ने डर के मारे इस रास्ते से आना-जाना छोड़ दिया। एक दिन मजबूरी में जंजीर खरीदकर लाया और इसे बांध दिया। तब से यह यहीं दिन-रात पड़ी रहती है।’ वह बताते हैं- हमारा एक बेटा और एक बेटी है। मैं बचपन से विकलांग हूं, पैर में लकवा है,’ इतना कहते-कहते दूद्धा राम की आंखें फिर से डबडबा जाती हैं। वह अपने 18 साल के बेटे जोगा राम को घर से डॉक्टर की पर्ची लाने को कहते हैं। आगे बताते हैं- महाजन से 10 हजार रुपए कर्ज लेकर किसी तरह एक बार इसे जोधपुर ले गया था, लेकिन दवा खाते ही और बीमार पड़ गई। इस बीच घर में काफी खोजबीन के बाद जोगा राम सीटी स्कैन की रिपोर्ट लेकर आते हैं। कहते हैं, ‘हम लोग बहुत पढ़े-लिखे नहीं हैं। रिपोर्ट ज्यादा समझ नहीं पाते। आप ही जरा देखिए।’ वह रिपोर्ट मुझे पकड़ा देते हैं। जोगा कहते हैं- पापा शुरू से विकलांग हैं। पहले वह दिहाड़ी पर काम करने जाते थे। जब मैं बड़ा हुआ, तो इन्हें काम करने से रोक दिया। अब मेरी ही कमाई से घर चलता है। मम्मी की हालत ऐसी है, क्या करूं? मजबूरी में इन्हें जंजीर से बांधकर रखना पड़ रहा है। किसे अच्छा लगता है कि अपनी मां को जंजीर से बांधकर रखे। कई ओझाओं और तांत्रिकों के पास गया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यहीं के रहने वाले हरीश अब मुझे बताते हैं- ‘यहां से करीब 10-15 किलोमीटर दूर केकड़ गांव है। वहां एक महिला को पिछले 15 सालों से ऐसे ही बांधकर रखा गया है।’ हरीश की बात सुनते ही उनके साथ उस गांव की ओर निकल पड़ा। गांव पहुंचते ही दूर एक झोपड़ी दिखी। अंदर 65 साल की तुग्गी देवी बैठी हैं। सामने रखी सब्जी-रोटी खा रही हैं। जैसे ही उनकी नजर मेरे कैमरे पर पड़ती है, वे अचानक उठ खड़ी हुईं और पास आकर मुझे जोर से धक्का दे दिया। करीब खड़े तुग्गी देवी के जेठ के बेटे दुर्गा राम दौड़कर आए और उन्हें संभाला। वह बताते हैं- ‘कैमरा देखकर यह ऐसा ही करने लगती हैं। डर जाती हैं। इनका कोई बच्चा नहीं है। 15-20 साल से ऐसी ही हालत में हैं। इनकी तबीयत अचानक खराब हो गई। गांव-गांव घूमने लगीं। लोगों को डंडे-पत्थर से मारती थीं। कई बार इनका एक्सीडेंट हो चुका। तब जाकर हम लोगों ने इन्हें जंजीर बांधा। अब यहीं पड़ी रहती हैं। इन्हें इस हालत में देखकर तकलीफ होती है। हमारे छोटे बच्चे इन्हें देखकर क्या सोचते होंगे, लेकिन क्या करूं?’ तभी तुग्गी देवी के देवर मंगदा राम आते हैं। पास बैठकर बताते हैं, ‘जब ये ठीक थीं, तो घर का सारा काम करती थीं। पहले अचानक चुप रहने लगीं, फिर लोगों को मारने-पीटने लगीं। हमें लगा कि किसी ने इन पर भूत-प्रेत कर दिया है। ओझाओं से झाड़-फूंक करवाई, ताबीज भी पहनाए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ। अब कभी-कभी तो मन में यही आता है कि भगवान इन्हें जल्दी अपने पास बुला ले, ताकि इनकी और हमारी यह तकलीफ खत्म हो सके। इस तरह जंजीर से बांधकर रखना दर्द देता है, लेकिन कर ही क्या सकता हूं।’ इस तरह कई गांव घूमने के बाद अब शाम हो चुकी है। रास्ते में मिट्ठरा गांव आता है। मेरे साथी कहते हैं, ‘यहां भी इसी तरह का एक मरीज है। वह कई महीनों से घर में बंद है। चलेंगे क्या?’ अब यहां से निकल और करीब आधे घंटे में उस घर पर पहुंचा। यहां एक कमरे की खिड़की से एक महिला किसी को लोटे में पानी भरकर देती हैं, लेकिन अचानक भीतर से लोटा बाहर आकर गिरता है। महिला ने जिसे पानी दिया था, उसने लोटा बाहर फेंक दिया था। हम नजदीक पहुंचे। देखा कमरे में एक 20 साल की लड़की परमेश्वरी चटाई पर लेटी हुई है। 40 साल की पारू देवी पल्लू संभालते हुए बोलती हैं, ‘यह मेरी बेटी है। ढाई महीने से ऐसी ही पड़ी है। इसे इतना गुस्सा आता है कि किसी का भी गला पकड़ लेती है। इसीलिए कमरे में बंद करके रखती हूं। अभी पानी दिया, तो लोटा बाहर फेंक दिया। पता नहीं इसे क्या हो गया है। झाड़-फूंक का भी कोई असर नहीं है। एक दिन यह स्कूल से आई। अचानक गीत गाने लगी। हमें लगा इस पर भूत आ गया है। एक ओझा के पास लेकर गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अभी कमरा खोल दूं, तो बाहर निकलकर जो भी हाथ में आएगा, उसी से मारने दौड़ पड़ेगी। इसलिए खिड़की से ही खाना-पानी देती हूं। इस बीच मैंने कई बार परमेश्वरी को आवाज दी, लेकिन वह नहीं बोली। बेसुध लेटी रही। मेरे साथी बताते हैं, ‘यहां मानसिक रोगियों को सही समय पर इलाज नहीं मिलता, इसलिए इनके परिवार इन्हें जंजीर से बांधकर रखने को मजबूर हैं।’ अब मैं बाड़मेर पहुंचता हूं। जिले के चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर विष्णु राम विश्नोई के पास। विष्णु राम बताते हैं, ‘बाड़मेर में ही नहीं, पूरे देश में मानसिक रोगी हैं। बाड़मेर में 3 साल पहले मानसिक इलाज की सुविधा नहीं थी, इसलिए लोगों को जोधपुर जाना पड़ता था। अब यहां इलाज है, लेकिन लोग जागरूक नहीं हैं। हम लोग गांव-गांव आशा वर्कर्स से ऐसे मरीजों के बारे में पता लगवाते हैं, लेकिन बड़ी दिक्कत यह है कि यहां घर दूर-दूर हैं। कुछ घरों के बीच एक-एक किलोमीटर की दूरी है। इसलिए हेल्थ वर्कर्स हर घर तक नहीं पहुंच पाते। हमें जहां भी ऐसे मानसिक रोगियों की जानकारी मिलती है, उनका रेस्क्यू कराते हैं। किसी इंसान को जंजीर से बांधकर रखना अमानवीय है। हालांकि, सरकार की अब तक ऐसी कोई विशेष नीति नहीं बना पाई है, जिसके जरिए इन लोगों की पहचान कर ठीक से इलाज किया जा सके। लोगों का झाड़-फूंक में ज्यादा यकीन है। इससे मरीज की हालत बिगड़ती जाती है। परिवार मरीजों का पूरा इलाज नहीं कराते, जिससे बीमारी बढ़ जाती है।’ बातचीत खत्म होने के बाद मैं वापस लौटता हूं। लेकिन रास्ते भर एक सवाल पीछा करता है- आखिर किसी इंसान को जानवर की तरह जंजीर से कैसे बांधा जा सकता है? मरीजों की इस हालत पर मेडिकल अफसर विष्णु राम विश्नोई के चेहरे पर मुझे जरा भी चिंता नहीं दिखी। उनका दावा है कि आशा वर्कर्स गांव-गांव जाकर मानसिक रोगियों की पहचान करती हैं। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल भी लाती हैं। लेकिन जिन परिवारों से मेरी बात हुई, उनमें से किसी ने भी नहीं बताया कि उनके यहां कभी कोई आशा वर्कर्स आई थीं। ————————————— 1- ब्लैकबोर्ड-‘तुम ईसाई बन गए, बाप की लाश नाले में बहाओ’:22 दिन तक सड़ती रही लाश, सरपंच बोला- अंतिम संस्कार किया तो बीवी-बच्चों के बारे में सोच लेना ‘7 जनवरी 2025। सुबह के 10 बजे थे। पापा की किडनी फेल होने की वजह से मौत हो गई थी। देखते ही मां रो-रोकर बेहाल हो गई। शव बरामदे में रखते ही चीख-पुकार मच गई। सभी रिश्तेदार घर पहुंचने लगे। सभी कहने लगे- अंतिम संस्कार की तैयारी करो। जब तक लाश दरवाजे पर रहेगी, सब रोते रहेंगे। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-पत्नी के घरवालों ने नंगा करके पीटा, नस काटकर सुसाइड:पत्नी ने कॉलर पकड़कर मांगे 20 लाख तो फांसी लगाई; तंग पतियों की स्याह कहानियां ‘20 जनवरी 2025 की बात है। शाम के 4 बजे थे। मैं अपने दोनों पोतों को स्कूल से लेकर घर लौट रही थी। रास्ते में मेरा छोटा बेटा नितिन बाइक से आ रहा था। उसने कहा- मम्मी, बाइक पर बैठ जाओ। फिर हम उसके साथ घर आए। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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