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सोशल-मीडिया के भ्रम में मांएं छुड़ा रहीं बच्चों का दूध: IAPWS ने कहा-सोशल मीडिया की बातों में न आएं; 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध जरूरी – Bhopal News

सोशल-मीडिया के भ्रम में मांएं छुड़ा रहीं बच्चों का दूध:  IAPWS ने कहा-सोशल मीडिया की बातों में न आएं; 6 महीने तक सिर्फ मां का दूध जरूरी – Bhopal News


मां का दूध लाभदायक है या नुकसानदेह, इसे लेकर लोगों में बहस छिड़ गई है। सोशल मीडिया पर ऐसी जानकारियों की बाढ़ आ गई है, जिनमें दावा किया जा रहा है कि नवजात को मां का दूध पिलाने से उसकी सेहत खराब होती है।

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ऐसी जानकारियों को इंटीग्रेटेड एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स वेलफेयर सोसायटी (IAPWS) ने भ्रामक बताया है। संस्था ने पत्र जारी कर लोगों से अपील की है कि वे भ्रामक जानकारियों पर ध्यान न दें। बच्चों को 6 महीने तक केवल मां का दूध ही पिलाएं।

IAPWS ने कहा कि मां का दूध नवजात शिशु के लिए सबसे अच्छा और संपूर्ण आहार माना जाता है। जन्म के बाद पहले 6 महीने तक बच्चे को सिर्फ मां का दूध देने से उसकी इम्यूनिटी मजबूत होती है, जिससे शरीर संक्रमण और बीमारियों से बेहतर तरीके से लड़ पाता है।

मां के दूध में जरूरी प्रोटीन, एंटीबॉडी और पोषक तत्व होते हैं, जो बच्चे की सही ग्रोथ और ब्रेन डेवलपमेंट में मदद करते हैं।

IAPWS ने आम लोगों से अपील की

6 महीने बाद ही बच्चे को अन्न खिलाएं

संस्था ने अपील की कि बच्चों को पहले 6 महीने मां का दूध ही पिलाएं। 6 महीने के बाद ही अन्नप्राशन यानी अन्न देना शुरू करें। अन्न के साथ 2 साल तक बच्चों को मां का दूध पिलाया जा सकता है। बता दें कि इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स शिशु विशेषज्ञों की सबसे बड़ी संस्था हैं।

सोशल मीडिया पर ये हैं भ्रामक जानकारियां

  1. बच्चे के जन्म के बाद आने वाला गाढ़ा, पीले रंग का दूध (कोलोस्ट्रम) बासी या खराब होता है।
  2. मां को सर्दी, खांसी, बुखार या कोई आम संक्रमण है, तो बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाना चाहिए।
  3. फॉर्मूला मिल्क डिब्बे का दूध मां के दूध जितना ही पौष्टिक होता है।

केस-1: 3 माह का बच्चा कुपोषित, क्योंकि मां नहीं पिला रही थी दूध

रायसेन निवासी दंपती अपने बच्चे को बार-बार उल्टी-दस्त की समस्या के चलते हमीदिया अस्पताल लेकर पहुंचे। ओपीडी में डॉक्टरों ने जांच की तो बच्चा कुपोषित पाया गया। काउंसलिंग के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि मां पिछले 15 दिनों से बच्चे को दूध पिलाने से बच रही थी।

उसने सोशल मीडिया पर देखा था कि 3 माह के बाद बच्चों को मां के दूध के साथ गाय का दूध और हल्का आहार देना चाहिए। डॉक्टरों ने समझाया कि यह पूरी तरह गलत जानकारी है। इसके कारण बच्चे का पाचन तंत्र कमजोर हो गया और उसकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई।

केस-2: केमिस्ट के कहने पर बच्चे को पिलाने लगे पाउडर वाला दूध

हमीदिया अस्पताल में ही एक अन्य मामला सामने आया। इसमें 4 माह के बच्चे को परिवार से जुड़े एक केमिस्ट ने पाउडर दूध पिलाने की सलाह दी। उसने माता-पिता से कहा कि पाउडर मिल्क से संक्रमण नहीं होता और इसमें बच्चे की सेहत के लिए जरूरी सभी पोषक तत्व संतुलित मात्रा में मौजूद होते हैं।

केमिस्ट की बातों में आकर मां ने बच्चे को अपना दूध पिलाने की बजाय पाउडर दूध को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। इसका असर बच्चे के विकास पर पड़ा। डेढ़ साल की उम्र में वह अपनी आयु के अन्य बच्चों की तुलना में काफी कमजोर पाया गया।

ब्रेस्टफीडिंग के दौरान महिलाएं करती हैं ये गलतियां

ब्रेस्टफीडिंग के दौरान कई महिलाओं को जोड़ों, पीठ या हाथ का दर्द सताने लगता है। इसका कारण है कि वह कई घंटों तक एक ही जगह पर एक पोजिशन में बच्चे को लेकर बैठी रहती हैं। बच्चा रोता है तो मां तुरंत उन्हें दूध पिलाना शुरू कर देती हैं, जो गलत है।

बच्चे को 2 से 3 घंटे बाद ही दूध पिलाएं। जब भी ब्रेस्टफीडिंग करवाएं, हमेशा पीठ और हाथ को सपोर्ट दें। इसके लिए तकिया हाथों और पीठ के पीछे लगा लें। हर बार दूध पिलाने के बाद गर्म पानी में रूई को उबालकर निप्पल साफ करें।

जिन बच्चों को नहीं मिलता मां दूध, उनके लिए है मिल्क बैंक

कुछ केस में मां को दूध नहीं होता है, ऐसी स्थिति के लिए प्रदेश में ह्यूमन मिल्क बैंक खोले गए हैं। राजधानी भोपाल में एम्स और जेपी अस्पताल के बाद अब हमीदिया में यह सुविधा है।

ऐसे काम करता है ह्यूमन मिल्क बैंक

ह्यूमन मिल्क बैंक में माताएं दूध दान करती हैं। उसे सुरक्षित तरीके से इकट्ठा किया जाता है। इसके लिए विशेष डीप फ्रीजर का उपयोग किया जाता है, जिसमें दूध को लगभग -30 डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है।

एक मिल्क बैंक में करीब 50 से 60 लीटर तक दूध संरक्षित किया जा सकता है। यहां मेकेनाइज्ड ब्रेस्ट पम्प, मिल्क स्टोरेज यूनिट और आधुनिक स्टरलाइजेशन सिस्टम जैसी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं। इस बैंक में महिलाएं स्वेच्छा से अपना दूध दान कर सकती हैं, जिससे जरूरतमंद नवजात शिशुओं को पोषण मिल सके।



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