पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के साथ हो रहे व्यवहार पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि सरकारी और सार्वजनिक शिक्षण संस्थान जरूरत पड़ने पर कर्मचारियों को नियुक्त कर बाद में बाहर नहीं कर सकते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संस्थान कर्मचारियों के साथ “यूज एंड थ्रो” जैसा व्यवहार नहीं कर सकते। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी संस्थान में काम की आवश्यकता लगातार बनी हुई है, तो केवल पद का नाम बदलकर किसी संविदा कर्मचारी को हटाकर उसकी जगह दूसरे कर्मचारी की नियुक्ति नहीं की जा सकती। दिव्यांग श्रेणी से भी जुड़ा मामला जस्टिस संदीप मौदगिल ने यह अहम फैसला रिम्पी नामक महिला याचिकाकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता वर्ष 2021 से केंद्रीय सरकार के तहत डेवलपमेंट स्टडीज विभाग में गेस्ट फैकल्टी के रूप में कार्यरत थीं। उनका चयन चयन समिति के माध्यम से हुआ था और वह 4 दिसंबर 2021 से लगातार पढ़ा रही थीं। वह 48 प्रतिशत दिव्यांग श्रेणी से भी संबंधित हैं। याचिकाकर्ता ने बताया कि वर्ष 2023 में असिस्टेंट प्रोफेसर ऑन कॉन्ट्रैक्ट पदों के लिए दोबारा विज्ञापन जारी किया गया था, जिसमें उन्होंने भी आवेदन किया। हालांकि, चयन प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही संस्थान ने किसी अन्य संविदा कर्मचारी की नियुक्ति कर दी और 9 मार्च 2024 को उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया गया। नियमित शिक्षकों जैसा कार्य याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनसे नियमित शिक्षकों जैसा पूरा शैक्षणिक कार्य लिया गया, लेकिन इसके बदले उन्हें केवल 52 हजार रुपये प्रतिमाह फिक्स वेतन दिया जाता था। उनका आरोप था कि संस्थान संविदा कर्मचारियों के साथ शोषणपूर्ण व्यवहार कर रहा है। वहीं, संस्थान ने कोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता की नियुक्ति केवल 11 महीने के अनुबंध पर थी और उन्हें सेवा जारी रखने या नियमित नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं है। संस्थान का यह भी कहना था कि नई चयन प्रक्रिया में उनका चयन नहीं हुआ और नई नियुक्ति असिस्टेंट प्रोफेसर ऑन कॉन्ट्रैक्ट के अलग पद पर की गई है। काम की वास्तविक प्रकृति अहम हाईकोर्ट ने संस्थान की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि केवल पद का नाम नहीं, बल्कि वास्तविक कार्य की प्रकृति देखी जानी चाहिए। रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता पहले भी वही शिक्षण कार्य कर रही थीं और बाद में नियुक्त कर्मचारी भी उसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए लगाया गया। अदालत ने कहा कि यह मामला एक संविदा कर्मचारी को हटाकर दूसरे संविदा कर्मचारी की नियुक्ति का प्रतीत होता है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि शैक्षणिक संस्थानों में लगातार अल्पकालिक संविदा नियुक्तियां न केवल कर्मचारियों के भविष्य को असुरक्षित बनाती हैं, बल्कि शिक्षा के माहौल को भी प्रभावित करती हैं। बहाली और बकाया वेतन के आदेश कोर्ट ने कहा कि जब छात्रों का शिक्षण कार्य लगातार जारी है, तो कर्मचारियों को अस्थिरता में नहीं रखा जा सकता। अंत में हाईकोर्ट ने 9 मार्च 2024 का आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल बहाल करने, सेवा निरंतरता देने और सभी लाभ प्रदान करने के निर्देश दिए। साथ ही अदालत ने बकाया वेतन चार सप्ताह के भीतर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अदा करने का आदेश भी दिया।
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