राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने POCSO मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जमानत याचिकाओं में पीड़ित बच्चे या उसके अभिभावकों को पक्षकार के रूप में शामिल करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन उन्हें सुनवाई का अधिकार अवश्य मिलना चाहिए। जस्टिस संदीप
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यह मामला श्रीगंगानगर जिले का है, जो वर्तमान में हनुमानगढ़ जिला जेल में बंद हैं। आरोपी ने स्पेशल जज (POCSO एक्ट केसेस) नंबर-1, हनुमानगढ़ द्वारा पारित आदेश के खिलाफ यह जमानत याचिका दायर की थी, जिसमें उनकी जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी।
कोर्ट रजिस्ट्री ऑफिस ने उठाई आपत्ति
कोर्ट के रजिस्ट्री विभाग ने याचिका में एक कमी की ओर इशारा किया कि पीड़ित या सूचनाकर्ता को पक्षकार के रूप में शामिल नहीं किया गया है। इस आपत्ति पर आरोपी के वकील ने दलील दी कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 16 वर्ष 7 महीने थी और यह गैंगरेप का मामला नहीं है, न ही BNS 2023 की धारा 65 या धारा 70(2) के तहत आरोप लगाए गए हैं। उन्होंने तर्क दिया कि BNSS की धारा 483 के अनुसार पीड़िता, उसके अभिभावक या सूचनाकर्ता को पक्षकार बनाना आवश्यक नहीं है।
केस की कानूनी पेचीदगी
इस मामले में विचारणीय मुद्दा यह था कि “क्या POCSO एक्ट के तहत मामलों में, विशेष रूप से जमानत याचिकाओं में, पीड़ित बच्चे या उसके अभिभावकों/माता-पिता या जिस व्यक्ति पर बच्चे को उसे अनिवार्य रूप से पक्षकार के रूप में शामिल करना आवश्यक है”। आरोपी के वकील ने कहा कि यह मुद्दा पहले ही इस कोर्ट की डिवीजन बेंच द्वारा “पूजा गुर्जर एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य” में 19 दिसंबर 2023 को तय किया जा चुका है।
वकील ने बताया कि डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया था कि पीड़ित को पक्षकार के रूप में शामिल करने की आवश्यकता नहीं है, हालांकि कार्यवाही के हर चरण में उसे सुनवाई का अधिकार है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के “जगजीत सिंह बनाम आशीष मिश्रा” मामले का भी हवाला दिया था।
दूसरी ओर, सरकारी अधिवक्ता हाथीसिंह जोधा ने तर्क दिया कि POCSO के अनुसार पीड़िता या उसके अभिभावक/माता-पिता को शामिल करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय
- कोर्ट ने धारा 39, 40 और नियम 4 के सामूहिक विश्लेषण के बाद पाया कि विधायिका का स्पष्ट इरादा था कि बच्चे/पीड़ित, उसके माता-पिता, अभिभावक या जिस व्यक्ति में बच्चे को भरोसा और विश्वास है, उन्हें कार्यवाही के दौरान, चाहे वह जमानत आवेदन हो या कोई अन्य आवेदन, सुने जाने का अमूल्य अधिकार है और ट्रायल में भाग लेने का भी अधिकार है। हालांकि धारा 439(1A) के तहत केवल सीमित मामलों में पीड़ित की उपस्थिति का प्रावधान है, लेकिन POCSO एक्ट से संबंधित मामलों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO एक्ट के सभी मामलों में आरोपी जमानत याचिकाओं और अन्य आवेदनों के निर्णय के समय बच्चे/पीड़ित, उसके माता-पिता, उसके अभिभावकों को कार्यवाही के बारे में सूचित किए जाने और सुने जाने का अधिकार है और पूरी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है। हालांकि, पीड़ित या उसके माता-पिता/अभिभावक को पक्षकार के रूप में शामिल करने की आवश्यकता नहीं है।
पहचान की गोपनीयता का मुद्दा
- कोर्ट ने चिंता जताई कि कई मामलों में पीड़ित या पीड़ित के माता-पिता को उनकी पहचान प्रकट करते हुए पक्षकार के रूप में शामिल किया जाता है, जो POCSO एक्ट की कुछ धाराओं के प्रावधानों के विपरीत है। यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा “निपुण सक्सेना एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य” (2019 2 SCC पेज 703) में जारी दिशानिर्देशों का भी स्पष्ट उल्लंघन है।
- सुप्रीम कोर्ट ने निपुण सक्सेना मामले में स्पष्ट किया था कि पीड़ित के गांव का नाम प्रकट करना भी पीड़ित की पहचान प्रकट करना माना जाएगा। कोर्ट ने विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए थे जिनमें कहा गया कि कोई भी व्यक्ति प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, सोशल मीडिया आदि में पीड़ित का नाम या दूर से भी ऐसे तथ्य प्रकाशित नहीं कर सकता जिससे पीड़ित की पहचान हो सके।
नए दिशा-निर्देश जारी
कोर्ट ने आरोपी के अधिकार और पीड़ित/बच्चे या उसके अभिभावक/माता-पिता के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए:
- जब भी POCSO एक्ट के तहत कोई जमानत आवेदन या अन्य आवेदन दायर हो, अपीलकर्ता/आवेदक/आरोपी के वकील को मामले की लिस्टिंग से पहले सरकारी अधिवक्ता को जमानत आवेदन की प्रति और आवश्यक कागजात भेजने होंगे। सरकारी अधिवक्ता तुरंत इसकी एक प्रति जांच अधिकारी/थाना प्रभारी को भेजेगा ताकि पीड़ित/बच्चे के अभिभावक/माता-पिता या जिस व्यक्ति में बच्चे को भरोसा है, उन्हें सूचना भेजी जा सके। थाना प्रभारी/जांच अधिकारी अभिभावक/माता-पिता को मामले की फाइलिंग के बारे में जानकारी प्राप्ति के दो दिन के भीतर सूचना देगा।
- जहां तक संभव हो, थाना प्रभारी/जांच अधिकारी या उसके द्वारा निर्देशित कोई अन्य अधिकारी जो पीड़ित के परिवार को सूचना पहुंचाता है, वह सादे कपड़ों में रहेगा ताकि पीड़ित के निवास पर अवांछित ध्यान से बचा जा सके। थाना प्रभारी जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या RALSA को भी पेपर बुक की एक प्रति भेजेगा ताकि POCSO एक्ट की धारा 39 और 40 के अनुपालन में पीड़ित के परिवार के सदस्यों को कानूनी वकील की सहायता प्रदान की जा सके। यदि वे वकील रखने में असमर्थ हैं तो राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण उन्हें वकील उपलब्ध कराएगा।
- जमानत आवेदनों या अन्य आवेदनों या कोर्ट कार्यवाही के बारे में सूचना लिखित में होगी और जांच अधिकारी संबंधित या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति यह सुनिश्चित करेगा कि रसीद में प्राप्तकर्ता का नाम, हस्ताक्षर तथा प्राप्ति की विशिष्ट तिथि और समय हो। सेवा पूरी करने के बाद विवरण तुरंत सरकारी अधिवक्ता को भेजा जाएगा ताकि इसे कोर्ट फाइल में रखा जा सके। यदि सेवा नहीं की जा सकती या पीड़ित के अभिभावक/माता-पिता नहीं मिल सकते, तो संबंधित जांच अधिकारी इस संबंध में रिपोर्ट तैयार करेगा और सरकारी अधिवक्ता को सौंपेगा।
- संबंधित कोर्ट यह सुनिश्चित करेगा कि पीड़ित के अभिभावक/माता-पिता को सूचना भेजी गई है और उसके बाद जमानत मामलों और अन्य आवेदनों की सुनवाई करेगा। जिन मामलों में सेवा इस कारण से नहीं की जा सकी कि पीड़ित, परिवार के सदस्य, अभिभावक या सूचनाकर्ता का पता नहीं लगाया जा सका, या जिन मामलों में कोर्ट अंतरिम जमानत आवेदनों का निर्णय कर रहा है, ऐसी आकस्मिकताओं पर कोर्ट मामले के आधार पर निर्णय ले सकता है और न्याय के उद्देश्य को सुरक्षित करने के लिए, परिवार के सदस्यों, अभिभावकों आदि को नोटिस की सेवा की प्रतीक्षा करते हुए निर्णय के साथ आगे बढ़ने के कारणों को दर्ज कर सकता है।
आगे की कार्यवाही
कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि मामले को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाए ताकि इस संबंध में आवश्यक निर्देश/दिशानिर्देश/SOP जारी किए जा सकें। चूंकि मुद्दे का उत्तर यह देते हुए दिया गया कि पीड़ित या उसके अभिभावक/माता-पिता या जिस व्यक्ति में बच्चे को भरोसा और विश्वास है, उन्हें कार्यवाही में पक्षकार के रूप में शामिल करने की आवश्यकता नहीं है, इसलिए आरोपी के वकील द्वारा दायर कमी माफ करने के आवेदन को स्वीकार कर लिया गया।
रजिस्ट्री द्वारा बताई गई कमी को माफ कर दिया गया। मामले को जमानत के निर्णय के लिए 17 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया गया। इस बीच, सरकारी अधिवक्ता थाना प्रभारी के माध्यम से बच्चे के माता-पिता/अभिभावकों को वर्तमान आवेदन दाखिल होने के बारे में तुरंत सूचित करेंगे और इस संबंध में सेवा रिपोर्ट सरकारी अधिवक्ता को भेजेंगे।
