वक्फ की संपत्ति कब्जा कराने के मामले में जेल में बंद सस्पेंड इंस्पेक्टर सभाजीत मिश्रा की जमानत याचिका जिला जज अनमोल पाल की कोर्ट ने खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि पुलिस की पत्रावली में मौजूद साक्ष्यों को देखते हुए जमानत का पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट
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यह था पूरा मामला…
परेड के नवाब इब्राहिम हाता निवासी मोईनुददीन आसिफ जाह ने ग्वालटोली थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप लगाया था कि सिविल लाइंस स्थित 13/387, 13/388 और 13/390 की संपत्ति नवाब मंसूर अली की थी। वर्ष 1911 में हाफिज हलीम को यह संपत्ति 99 वर्ष के पट्टे पर दी गई थी। संपत्ति 2010 तक प्रयोग की जा सकती थी। इसके बाद यह दोबारा वक्फ संपत्ति हो गई। आरोप है कि वक्फ बोर्ड में बेदखली की कार्यवाई चल रही थी। इसी बीच अखिलेश दुबे ने साथियों संग मिलकर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिए और अपनी दबंगई के बल पर वक्फ संपत्ति कब्जा ली।
यहां बिल्डिंग और गेस्ट हाउस बनाकर करोड़ों की आमदनी होने लगी। आरोप है कि अप्रैल 2024 में तत्कालीन इंस्पेक्टर सभाजीत कई लोगों के साथ उनके घर पहुंचे और डरा धमकाकर बिना दिखाए व पढ़ाए एक पेपर पर साइन करा लिए और आधार कार्ड भी ले लिए। इस दौरान इंस्पेक्टर ने धमकी दी कि लखनऊ में दर्ज एफआईआर की पैरवी बंद नहीं की तो तुम्हारा जेल जाना तय है।
12 सितंबर को किया था गिरफ्तार
इस मामले में पुलिस ने 12 सितंबर को सभाजीत मिश्रा को गिरफ्तार किया था। वरिष्ठ अधिवक्ता पीयूष शुक्ला ने जमानत के पक्ष में तर्क रखा कि गिरफ्तारी का विरोध किया। डीजीसी दिलीप अवस्थी ने गिरफ्तारी को वैधानिक बताते हुए अपराध को गंभीर बताया। कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि सीडीआर से साफ है कि अखिलेश दुबे और सभाजीत के बीच 15 मई 2024 को 42 सेकेंड व 22 मई को 26 सेकेंड बातचीत हुई। जिसके बाद कोर्ट ने आरोपी इंस्पेक्टर की जमानत याचिका खारिज कर दी।
