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रोहतक में एक्टर जतिन सरना बोले- थिएटर दिवानों का मेला: संघर्ष के दिन किए याद; सड़कों पर सोए और चाय के सहारे दिन गुजारे – Rohtak News

रोहतक में एक्टर जतिन सरना बोले- थिएटर दिवानों का मेला:  संघर्ष के दिन किए याद; सड़कों पर सोए और चाय के सहारे दिन गुजारे – Rohtak News

रोहतक की डीएलसी सुपवा में पहुंचे मेरठिया गैंगस्टर्स व सात उच्चके जैसी फिल्मों के स्टार बालीवुड एक्टर जतिन सरना ने थियेटर से जुड़े अपने अनुभव को सांझा किए। जतिन सरना ने थियेटर के शुरूआती दिनों को याद किया और बताया कि किस प्रकार पैसे ना होने के कारण सड़कों पर दिन गुजारते हुए संघर्ष किया। एक्टर जतिन सरना ने बताया कि जब दिल्ली में थियेटर में काम करना शुरू किया तो उसके पास पैसे भी नहीं थे। लेकिन थियेटर को लेकर पागलपन इतना था कि सड़कों पर चाय के सहारे भी दिन गुजारने पड़े। मां हमेशा कहती थी कि बेटी पढ़ ले, जीवन अच्छा हो जाएगा। लेकिन थियेटर के प्रति जुनून के कारण आज वो एक्टर बन पाए। फिल्मों के माध्यम से कहना चाहते हैं कहानी
एक्टर जतिन सरना ने बताया कि बहुत सारी ऐसी कहानियां है, जिन्हें वह फिल्मों के माध्यम से कहना चाहते है। सोसायटी में हो रहे महिला उत्पीड़न, बच्चों के शोषण, रेप के ऊपर कहानी कहना चाहते हैं। कल्चर को बचाने के लिए कहानियां है, लेकिन उन कहानियों को फिल्मों के जरिए कहने का प्रयास करेंगे। 6 मार्च को रीलिज हो रही फिल्म
एक्टर जतिन सरना ने बताया कि वह कई फिल्में व वेब सीरिज कर चुके हैं और आने वाले समय में दो फिल्में रीलिज होने वाली है। इनमें 6 मार्च को ना जाने कौन आ गया फिल्म है, जो परिवार में प्यार के एंगल को लेकर स्टोरी है। इसमें परिवार की वेल्यू को लेकर कहानी को बुना गया है। थियेटर में नई बातें नहीं आ रही
जतिन सरना ने बताया कि नाटक एक ऐसा माध्यम था जो एक कम्यूनिटी वॉच के लिए था। देश की एकजुटता की बातें होती थी। इसमें थियेटर का बड़ा अहम योगदान रहा है। लेकिन अफसोस है कि नई बात क्यों नहीं कही जा रही। नाटकों में आज की बातें होनी चाहिए। इसमें लिए रिश्क लेने पड़ेंगे, नए डायरेक्टर को भी आगे आना चाहिए। जतिन सरना ने बताया कि आज के मुद्दों को लेकर भी नाटक बनने चाहिए, जिससे दर्शक भी साथ जुड़ेंगे। आप अपनी बात को मोबाइल के जरिए आसानी से कह सकते हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात लोगों तक पहुंचा सकते हैं। थियेटर को बताया दीवानों का मेला
जतिन सरना ने बताया कि थियेटर के कलाकारों को आर्थिक हालातों से गुजरना पड़ता है, क्योंकि थियेटर तो दीवानों का मेला है। कोशिश रहनी चाहिए कि थियेटर फेस्टिवल होते रहें। एक नाटक को खड़ा करना काफी मुश्किल हो जाता है। इसमें पैसे का अभाव शुरू से रहा है, लेकिन उसे एक कमजोरी मानकर थियेटर ना करे तो वह गलत है। थियेटर सीखने वाले नहीं दे रहे समय
जतिन सरना ने बताया कि एक्टिंग की तरफ लोगों का रूझान बढ़ रहा है। उससे थियेटर में सीखने वालों की बाढ़ तो आई है, लेकिन वो थियेटर को समय नहीं दे रहे। कुछ समय काम करके बालीवुड की चकाचौंध में जाना चाहते है, जिससे उन्हें परेशानियां भी हो रही है।



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