आज इंटरनेशनल नर्सेज डे है। यह दिन उन नर्सों के सम्मान का प्रतीक है, जो अस्पतालों की रीढ़ हैं। लेकिन राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स की नर्सें संघर्ष और दबाव के बीच अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं। जहां एक नर्स पर 5 मरीजों की जिम्मेदारी होनी चाहिए, वहां रिम्स में एक नर्स पर 20 से अधिक मरीज हैं। इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड (आईपीएचएस) नॉर्म्स के अनुसार 500 बेड वाले अस्पताल में संचालन के लिए 400 से अधिक नर्सों की जरूरत होती है। शिक्षण संस्थान के लिए निर्धारित संख्या इस अनुपात से ज्यादा है। ऐसे में 2200 बेड वाले रिम्स में कम से कम 2500 नर्सों की आवश्यकता है। यानी हर शिफ्ट में लगभग 800 से ज्यादा नर्सों की तैनाती होनी चाहिए। लेकिन रिम्स में कुल नर्सों की संख्या 400 के आसपास ही है। इनमें भी स्थायी नर्सों की संख्या 350 से कम बताई जाती है। शेष आउटसोर्स के माध्यम से कार्यरत हैं। ऐसे में एक शिफ्ट में औसतन केवल 120 से 130 नर्सें ही ड्यूटी पर रहती हैं। सम्मान संग समाधान जरूरी नर्सेज डे पर नर्सों को सम्मानित करने के कार्यक्रम होते हैं, लेकिन रिम्स की स्थिति सवाल खड़ा करती है कि क्या केवल सम्मान पर्याप्त है? विशेषज्ञ मानते हैं कि बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नर्सिंग स्टाफ की पर्याप्त नियुक्ति अब सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।
मरीजों की सुरक्षा और इलाज पर भी असर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नर्सों की कमी का सीधा असर मरीजों पर पड़ता है। दवा देने में देरी, मॉनिटरिंग में गैप, इमरजेंसी रिस्पॉन्स में विलंब और संक्रमण नियंत्रण जैसी चुनौतियां बढ़ जाती हैं। गंभीर मरीजों वाले विभागों में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक है। कई बार लगता है मरीजों को समय नहीं दे पा रहे… रिम्स अराजपत्रित कर्मचारी संघ की अध्यक्ष सिस्टर आईवी रानी खलखो कहती हैं कि वर्तमान व्यवस्था में नर्सें शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर दबाव में काम कर रही हैं। रिम्स में कम-से-कम 3000 नर्सों की जरूरत है, लेकिन संख्या 400 से भी कम है। एक नर्स पर 20 से ज्यादा मरीजों की जिम्मेदारी रहती है। कई बार ऐसा होता है कि एक साथ 3 मरीजों को नर्सिंग केयर की जरूरत पड़ती है, लेकिन सीमित स्टाफ के कारण तुरंत पहुंच पाना संभव नहीं हो पाता। हर साल 8 से 10 स्थायी नर्सें सेवानिवृत्त हो रही हैं, लेकिन नई नियुक्तियां नहीं हो रही हैं। नियुक्ति होनी है, पर प्रक्रिया शुरू नहीं रिम्स में करीब 6 माह से 144 पदों पर स्थाई नियुक्ति का प्रस्ताव तैयार है। लेकिन अबतक प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है। करीब चार माह पहले रिम्स निदेशक डॉ. राजकुमार ने बताया था कि प्रस्ताव जेएसएससी को भेजी गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से फाइल वापस लौट गई थी। ऐसे में रिम्स ने दोबारा प्रस्ताव तैयार कर भेजा है, पर प्रक्रिया कब शुरू होगी, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नही हैं। विभागवार समझें नर्सों की कितनी कमी… मेडिसिन विभाग : यहां एक आईसीयू और 6 यूनिट संचालित हैं। सभी यूनिट में औसत मरीज 50-60 रहते है। जबकि सभी यूनिट में 1 शिफ्ट में 3-3 नर्सें कार्यरत हैं। रिम्स के सेंट्रल इमरजेंसी से हर विभाग में नर्सें एक-चौथाई भी वर्तमान में नही है।) जरूरत : 100 मरीजों पर कम-से-कम 10 नर्सों की जरूरत जरूरत : कम-से-कम 1 शिफ्ट में 7-8 नर्सों की जरूरत जरूरत : यहां प्रति यूनिट 8-10 नर्सें एक शिफ्ट में रहनी चाहिए। जरूरत : एक शिफ्ट में प्रति वार्ड 12-12 नर्सों की जरूरत कार्डियोलॉजी : 5 डॉक्टरों के यूनिट में 100 से ज्यादा मरीज हैं। इमरजेंसी में भी नर्सों का इंगेजमेंट रहता है। यहां 1 शिफ्ट में आईसीयू में 3-3 नर्सें व वार्ड में 2-2 नर्सें हैं। सर्जरी विभाग : यहां वार्डों में एक शिफ्ट में 2-2 नर्स है। जबकि प्रति यूनिट मरीज 35-40 है। आईसीयू में 3-3 नर्स एक शिफ्ट में काम कर रही हैं। न्यूरो सर्जरी : 4 वार्डों में मरीजों की औसत संख्या 40 है। आईसीयू व एचडीयू में 40 से 50 रोगी हैं। वार्ड में 3-3 नर्सें, आईसीयू-एसडीयू में 5-5 नर्सें एक शिफ्ट में रहती हैं।
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