पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के वाहन मालिकों को बड़ी राहत देते हुए साफ कर दिया है कि पुराने पंजीकरण नंबरों को नई HR सीरीज में बदलवाने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जा सकता, चाहे नंबर वीआईपी या पसंदीदा श्रेणी का ही क्यों न हो। जस्टिस जगमोहन बंसल ने हरियाणा सरकार के 8 नवंबर, 2019 के उस ज्ञापन को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि अगर वाहन मालिक नई HR सीरीज में अपना पसंदीदा नंबर रखना चाहते हैं तो उन्हें निर्धारित फीस देनी होगी। जानें…पूरा मामला हरियाणा में पहले कई वाहनों के नंबर HR सीरीज के बजाय दूसरी पुरानी सीरीज में जारी किए गए थे। बाद में सरकार ने नई “HR” सीरीज लागू करते हुए पुराने नंबर बदलने की प्रक्रिया शुरू की। 28 मई 2019 को राज्य सरकार ने स्पष्ट किया था कि पुराने नंबरों को नई “HR” सीरीज में बिना किसी शुल्क के बदला जा सकता है। लेकिन बाद में 8 नवंबर 2019 को नया ज्ञापन जारी कर यह कहा गया कि यदि कोई वाहन मालिक अपना पुराना पसंदीदा या वीआईपी नंबर नई सीरीज में रखना चाहता है तो उसे फीस देनी पड़ेगी। इसी फैसले को कई वाहन मालिकों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने क्या कहा? हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार पुराने नंबरों को HR सीरीज में बदल सकती है, लेकिन इसके लिए कोई शुल्क नहीं ले सकती। कोर्ट ने साफ किया कि एक बार पहले से आवंटित पसंदीदा नंबर के लिए दोबारा फीस लेना कानूनन सही नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत पंजीकरण नंबरों की वैधता और नियम तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। राज्य सरकार केवल ज्ञापन जारी करके अतिरिक्त शुल्क नहीं लगा सकती। वाहन मालिकों को क्या फायदा? इस फैसले के बाद अब पुराने गैर-एचआर नंबर वाले वाहन मालिक बिना अतिरिक्त भुगतान किए अपनी गाड़ियों के नंबर नई HR सीरीज में बदलवा सकेंगे। खास तौर पर उन लोगों को राहत मिलेगी जिन्होंने पहले ही वीआईपी या पसंदीदा नंबर के लिए रकम जमा कराई थी। राज्य सरकार का पक्ष हरियाणा सरकार ने कोर्ट में कहा था कि पुरानी सीरीज समाप्त हो चुकी हैं और वाहन मालिकों को नई HR सीरीज में नंबर लेना जरूरी है। सरकार का तर्क था कि यदि कोई व्यक्ति पसंदीदा नंबर चाहता है तो उसे नई सीरीज के अनुसार फीस देनी होगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया और 2019 का विवादित ज्ञापन रद्द कर दिया। अदालत की अहम टिप्पणी कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं था जिसके आधार पर वह सिर्फ ज्ञापन जारी कर अतिरिक्त शुल्क लगा सके। इसलिए यह आदेश “कानून की नजर में गलत” है। इस फैसले को हरियाणा के हजारों वाहन मालिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
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