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‘एक था टाइगर’ लिखने वाले नीलेश मिश्रा का इंटरव्यू: ‘कूद’ के जरिए मैं एक्टिंग के किंडरगार्टन में आया, शोहरत ही अंतिम लक्ष्य नहीं

‘एक था टाइगर’ लिखने वाले नीलेश मिश्रा का इंटरव्यू:  ‘कूद’ के जरिए मैं एक्टिंग के किंडरगार्टन में आया, शोहरत ही अंतिम लक्ष्य नहीं

पत्रकार, कहानीकार, गीतकार और अब अभिनेता के तौर पर नई पारी शुरू कर चुके नीलेश मिश्रा इन दिनों फिल्म ‘कूद’ को लेकर चर्चा में हैं। यह उनके यू-ट्यूब चैनल पर रिलीज हुई है। इस पर उन्होंने खुलकर बातचीत की… क्या एक्टिंग हमेशा से आपके सपनों का हिस्सा थी? सच कहूं तो मैंने कभी खुद को अभिनेता के तौर पर देखा ही नहीं था। कॉलेज के दिनों में एक नाटक लिखा था। उसमें मुख्य भूमिका एक दोस्त को करनी थी, लेकिन आखिरी वक्त पर उसने मना कर दिया। तब मजबूरी में मुझे खुद मंच पर उतरा। उसके बाद जीवन रेडियो, लेखन और कहानियों में आगे बढ़ गया। फिर एक बार विशाल भारद्वाज ने एक मुलाकात में कहा कि अभिनय में 60 प्रतिशत हिस्सा आवाज का होता है। अब जब ‘कूद’ के जरिए कैमरे के सामने आया हूं तो लगता है कि मैं अभी एक्टिंग के किंडरगार्टन में हूं। फिल्म के विषय पर आपके क्या विचार हैं? ‘अपनी मर्जी की मौत’ का अधिकार एक बहुत ही जटिल और दार्शनिक बहस है। जब कोई व्यक्ति किसी रिश्ते में होता है, तो सामने वाला उसमें अपनी संवेदनाएं और जीवन का हिस्सा निवेश करता है। मेरा मानना है कि हमें अपनी मर्जी की मौत के बजाय अपनी मर्जी की जिंदगी की तलाश करनी चाहिए। आपने ‘महारानी’ जैसी चर्चित वेब सीरीज छोड़ दी थी। आखिर ऐसा क्यों किया? ‘महारानी’ सीरीज का प्रस्ताव आया तो मैं लखनऊ से मुंबई गया, लेकिन मेरी एक शर्त थी कि स्क्रीन पर गाली-गलौज नहीं करूंगा। वर्कशॉप के पहले दिन ही एहसास हुआ कि ओटीटी कंटेंट की मांग मेरी ‘लक्ष्मण रेखा’ के बाहर हैं तो मैंने उसी शाम मुकेश छाबड़ा से मुक्त करने की विनती कर दी थी। आज गालियों और आक्रामक भाषा को ‘रियलिज्म’ भी तो कहा जाता है? मेरी परवरिश, संवेदनाएं और भाषा अलग है। मेरा मानना है कि शालीनता भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। संवाद की ताकत सिर्फ गाली में नहीं, भाव में भी होती है। अगर मैं अपने मन के खिलाफ जाकर कुछ करूंगा तो वह ईमानदार अभिनय नहीं रह जाएगा। आपकी सफलता का रहस्य क्या है? मेरी सबसे बड़ी ताकत है- ‘किसी चीज के बारे में पहले से न जानना’। जब मैंने रेडियो पर कहानियां सुनाना शुरू किया, मुझे नहीं पता था कि यह कैसे होता है। जब ‘गांव कनेक्शन’ शुरू किया, तो मुझे बिजनेस की जानकारी नहीं थी। यह मेरे लिए एक बिजनेस नहीं, बल्कि ‘मिशन’ था। बस मुझे यह पता था कि गांवों की आवाज को मंच देना है। मैंने अपनी सारी जमा-पूंजी, अपना घर, सब कुछ उसमें लगा दिया। जब कैमरा के सामने इंटरव्यू लेना शुरू किया था तो मुझे कैमरा एंगल्स का ज्ञान नहीं था। चूंकि मुझे पता नहीं था कि यह कैसे किया जाता है, इसलिए मैंने इसे अपने तरीके से किया। यही अनभिज्ञता ही मुझे नए प्रयोग करने की आजादी देती है। मेरा जीवन एक खूबसूरत जर्नी है, जिसे मैं अपनी शर्तों और सादगी के साथ जी रहा हूं। आपके लिए जीवन की सबसे बड़ी विरासत क्या है। लोग आपको कैसे याद रखें? जब मैं पीछे मुड़कर देखूं तो अफसोस कम से कम हो। लोग मुझे एक ईमानदार इंसान और संवेदनशील रचनाकार के रूप में याद रखें। शोहरत आए या न आए, आपकी प्रामाणिकता, शालीनता और ईमानदारी ही अंत में असली विरासत बनती है।



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