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म्यूजियम की 5 विरासतें, जिन्होंने इंदौर की पहचान गढ़ी: 100 साल पुराने बैज से लेकर 600 मिलीग्राम के सिक्के तक, म्यूजियम डे पर सामने आएंगे इतिहास के अनसुने किस्से – Indore News

म्यूजियम की 5 विरासतें, जिन्होंने इंदौर की पहचान गढ़ी:  100 साल पुराने बैज से लेकर 600 मिलीग्राम के सिक्के तक, म्यूजियम डे पर सामने आएंगे इतिहास के अनसुने किस्से – Indore News

इंदौर के म्यूजियम में संरक्षित कई दुर्लभ आर्टिफैक्ट्स केवल इतिहास की निशानी नहीं हैं, बल्कि वे उस दौर की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि की कहानी भी बताते हैं। म्यूजियम डे पर दैनिक भास्कर की विशेष प्रस्तुति में इतिहासकार जफ़र अंसारी और म्यूजियम क्यूरेटर आशुतोष महाशब्दे ऐसे चुनिंदा आर्टिफैक्ट्स से जुड़ी रोचक और कम चर्चित जानकारियां साझा की, जिन्हें आज पाठक पढ़ने के साथ ही सुन और देख भी सकेंगे।
होल्कर अहिल्या सल्तनत मैडल महाराजा तुकोजीराव होल्कर तृतीय ने करीब सौ साल पहले ‘नर रत्न मंदिर’ नाम से संग्रहालय का निर्माण कराया था। आजादी के बाद इसे नई इमारत में शिफ्ट किया गया। उसी दौर से जुड़ा ‘द इंदौर म्यूजियम’ लिखा एक मेटल बैज जिसे चपड़ास कहते हैं, आज भी यहां संरक्षित है। इसके साथ होल्कर अहिल्या सल्तनत अवार्ड भी म्यूजियम की खास धरोहरों में शामिल है। यह इंदौर रियासत का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता था, जो राजा-महाराजाओं सहित सेना, पुलिस, साहित्य और अन्य क्षेत्रों के विशिष्ट लोगों को दिया जाता था। इकन्नी : होलकर रियासत का सबसे छोटा सिक्का होलकर रियासत का सबसे छोटा और बेहद दुर्लभ सिक्का ‘एकक्नी’ खास धरोहरों में शामिल है। इसका वजन करीब 600 मिलीग्राम यानी एक ग्राम से भी कम है। उस दौर में छोटे लेन-देन के लिए बेहद कम मूल्य के सिक्के बनाए जाते थे, जिनका उपयोग स्थानीय बाजारों में रोजमर्रा की खरीद-बिक्री में होता था। छोटे आकार के बावजूद इन सिक्कों पर राजचिन्ह और टकसाल की पहचान उकेरी जाती थी। कई सिक्के हाथ से ढाले जाते थे, इसलिए उनका आकार और वजन पूरी तरह समान नहीं होता था। सोने-चांदी का भंवरा सोने और चांदी से बने भंवरे इंदौर की समृद्धि और वैभव की पहचान माने जाते हैं। उस दौर में इंदौर के कपड़ा मिलों का उत्पाद देश-विदेश तक निर्यात होता था। संभ्रांत परिवारों के बच्चे इन धातु के भंवरों में रेत भरकर खेला करते थे। यह आर्टिफैक्ट तत्कालीन सामाजिक संपन्नता की झलक भी दिखाता है। रावणानुग्रह प्रतिमा उमा-महेश्वर की प्रतिमा है, जिसमें उस प्रसंग को दर्शाया गया है जब रावण कैलाश पर्वत को उठाकर ले जाने का प्रयास करता है। मालवा में प्रचलित एक किंवदंती के अनुसार रावण का एक सिर गधे का माना गया है, जो उसके अहंकार का प्रतीक है। प्रतिमा में इसी प्रतीकात्मक रूप को उकेरा गया है। कला महर्षि देवलालीकर के चुनिंदा आर्ट वर्क म्यूजियम में संरक्षित कलाकार देवलालीकर की पेंटिंग्स मालवा की सांस्कृतिक संवेदनाओं और भारतीय जीवन शैली की झलक पेश करती हैं। चित्रों में लोक रंग, पारंपरिक शैली और आधुनिक कला दृष्टि का संतुलित मेल दिखाई देता है।



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