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नौकरी छोड़ बंजर जमीन में उगाई फसल: बागवानी संग डेयरी का मॉडल अपनाया, सरकारी योजनाओं और सोलर पंप ने बदली किस्मत – Jaipur News

नौकरी छोड़ बंजर जमीन में उगाई फसल:  बागवानी संग डेयरी का मॉडल अपनाया, सरकारी योजनाओं और सोलर पंप ने बदली किस्मत – Jaipur News

जयपुर जिले के जयसिंहपुरा के किसान हनुमान सिंह खंगारोत ने खेती में नवाचार से आत्मनिर्भर बनने की कहानी लिखी है। सांभर झील के आसपास खारे पानी, कम बारिश और बंजर भूमि में पारंपरिक खेती हमेशा से घाटे का सौदा मानी जाती रही। मगर, वे शहर में नौकरी कर रहे थे। इसे छोड़कर एकीकृत कृषि का सफल मॉडल खड़ा किया। सोलर और पॉली हाउस बनाया हनुमान सिंह के पास 9 हेक्टेयर का खेत है। इसमें पोल्ट्री फार्मिंग शुरू की, क्योंकि पानी की जरूरत कम रहती है। पोल्ट्री से मिलने वाली नियमित आय ने उनके लिए नई संभावनाएं पैदा की। इसके बाद संरक्षित खेती, यानी पॉली हाउस तकनीक अपनाई। नियंत्रित वातावरण में शिमला मिर्च, खीरा और टमाटर जैसी फसलें करने लगे। इनकी सफलता से प्रभावित होकर कृषि विभाग ने भी पॉलीहाउस स्वीकृत किए। कम व खारे पानी की चुनौती का स्थायी समाधान खोजने के लिए हनुमान सिंह ने सरकारी योजनाओं का सहारा लिया। उन्होंने अपने खेत पर 2 लाख लीटर की क्षमता का फार्म पौंड बनवाया। इससे पॉली हाउस और पोल्ट्री की जरूरतें पूरी होने लगी। खेत पर 22 किलोवाट का सोलर पंप सिस्टम भी लगाया। जिससे बिजली पर निर्भरता समाप्त हुई। रेस्टोरेंट पर खेत की सब्जियां जोबनेर हाईवे पर रेस्टोरेंट है, जिसमें अपने खेत में उगाई ताजा सब्जियां और अपने डेयरी फार्म के उत्पाद उपयोग करने लगे। इस तरह खेत से प्लेट तक का मॉडल अच्छी आय का जरिया बन गया। अब वे मशरूम एवं कृषि पर्यटन की ओर नवाचार के इस सिलसिले को आगे बढ़ा रहे हैं। बेटे ओमपाल सिंह ने भी मशरूम उत्पादन का वैज्ञानिक प्रशिक्षण लेकर इसकी खेती शुरू की है। अब इस आधुनिक फार्म को कृषि पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य शहरी आबादी, विशेषकर बच्चों को ग्रामीण जीवनशैली, डेयरी संचालन और प्राकृतिक कृषि प्रणालियों से रूबरू कराना है। पशुपालन से अतिरिक्त आय कर रहे हैं और गोबर का उपयोग जैविक खाद के रूप में करते हैं। कीटनाशक पदार्थ का खर्च घट गया है। किसान भी अपना रहे यही तकनीक डेयरी, बागवानी और खेती का इस तरह का मॉडल अपना लिया है कि एक का अपशिष्ट दूसरे में उपयोगी हो जाता है। गोबर खाद बनता है और खेतों से मिलने वाला चारा पशुओं के काम आता है। अब आसपास के किसान भी इनके मॉडल को अपनाने में रुचि ले रहे हैं। प्रतिनिधिमंडल विजिट पर आते हैं।



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