मैं अर्जुन पासवान, बिहार के जहानाबाद जिले के जमुआना गांव का रहने वाला हूं। हमारे पास जमीन नहीं थी। दलित होने के नाते जमींदारों के ही रहम-ओ-करम पर जिंदा थे। उनकी जमीनों पर काम के बदले खाने को बाजरा मिलता था। जमींदार रास्ते में मिल जाएं तो हम अपने पैरा
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गांव में अकाल पड़ा तो भूख से तंग आकर पटना आ गया। यहां मिट्टी की तेल की तस्करी का विरोध किया तो मुझे पांच गोली मारी गई। दो महीने कोमा में रहा। शरीर हिल-डुल नहीं पाता था, लेकिन दिमाग जिंदा था। सब सुनता था- पत्नी की सिसकियां, डॉक्टर और पुलिस वालों की फुसफुसाहट, मगर कुछ कर नहीं पाता था। एक ही तरह की बात सुन-सुन कर भीतर ही भीतर चिड़चिड़ा हो गया था।
पटना में अपने घर के बाहर खड़े 71 वर्षीय अर्जुन पासवान। यह गांव में गरीबी, भुखमरी अकाल और जमींदारों से परेशान होकर पटना आकर रहने लगे। यहां बहुत संघर्ष किया।
दरअसल मेरी कहानी गांव से शुरू होती है, जहां मैंने गरीबी, भुखमरी, अकाल, सामंती व्यवस्था और जाति व्यवस्था की मार झेली। हमारा सात लोगों का परिवार था। मैं तीन भाई और दो बहनों में सबसे बड़ा था। इसलिए पूरे परिवार को चलाने की जिम्मेदारी मेरी थी। 13 साल की उम्र में मेरी शादी कर दी गई।
गरीबी इस कदर थी कि खाने को मिल जाए, बस वही काफी था। उसके लिए मां के साथ नहर से मिट्टी निकालने जाता था, ताकि जमींदारों और ऊंची जाति के खेतों को पानी आसानी से मिल सके। उसके बदले हमें खाने को बाजरा मिलता था। बाजरा घर लाकर पीसना पड़ता था। सब्जी के लिए घर पर बैंगन उगाते थे।
खाने की ही नहीं, वहां जिंदगी जीने के लिए भी आसान नहीं थी। जमींदार रास्ते में आते-जाते कहीं मिल जाएं तो हम अपने जूते निकालकर हाथ में ले लेते थे, क्योंकि वह उनकी शान के खिलाफ होता था। यही नहीं, गांव में हमारे कुएं अलग होते थे। भूमिहार, मुसहर, कुर्मी, राजपूत और दलित सबके अलग-अलग कुएं।
इसके अलावा बड़े जमींदारों को अगर हमारे घर की कोई महिला पसंद आ जाए तो वे उसे उठा ले जाते थे। उसके साथ रेप करते थे। हम चाहकर भी विरोध नहीं कर पाते थे। कहीं सुनवाई नहीं होती थी। हमें न्याय के नाम पर बस कुछ मुट्ठी अनाज दे दिया जाता था।
जिंदगी इसी तरह से चल रही थी। फिर बिहार में 1966, 1967 और 1968 में लगातार तीन साल अकाल पड़ा। अकाल ऐसा कि भूखे मरने की नौबत आ गई। हमारे गांव के गरीब इंसान, जानवर सब मरने लगे। अकाल की खबर जानने के लिए हम उस समय पास के बड़े जमींदारों के घर रेडियो सुनने जाते थे। उनके घर का नियम होता था कि वे अपने दालान में कुर्सी पर बैठते और हम नीचे जमीन पर।
एक दिन अकाल को लेकर सरकार ने रेडियो पर ऐलान किया कि अकाल वाले गांव के लोग जहानाबाद से पुनपुन रेलवे स्टेशन जाएंगे और वहां से अपने जानवरों के लिए चारा लाएंगे। फिर जहानाबाद से 50 किलोमीटर पुनपुन स्टेशन के लिए ट्रेन में चार और डिब्बे जोड़े गए। सुबह हम उससे पुनपुन रेलवे स्टेशन जाते और शाम तक जानवरों के लिए घास लेकर आते। सारा दिन उसी में चला जाता था।
अब खाने के लिए घर में कुछ भी नहीं बचा था। उस दौरान लगभग एक साल तक हमारा परिवार गन्ना चूस कर पेट भर रहा था। वही गन्ना, जो अकाल के दौरान जानवरों के चारे के तौर पर आता था। सुबह नाश्ते के लिए हम रात में मक्का भिगोते थे और उसे ही उबालकर खाते थे।
अकाल के दौरान ही एक जमींदार ने मेरे पिता पर चोरी का झूठा आरोप लगा दिया। वे जेल चले गए। फिर तो हम एक नई आफत में आ गए थे। एक तरह से हमारी समस्याएं बढ़ती ही जा रही थीं। उस वक्त मेरी सास पटना में रहती थीं। उन्होंने मुझसे परिवार के साथ पटना आने को कहा। पिता को जेल होने के बाद घर चलाना मुश्किल था। लगा कि यहां भूख से मरने से अच्छा है कि पटना ही चला जाए। हमने दो गाय बेचीं और उससे जो पैसा मिला उसे लेकर परिवार के साथ पटना आ गया।
पटना आकर पीरवमरियभा इलाके में सास के साथ रहने लगा। यह एक दलित बस्ती है। यहां मेरी सास ने मुझे गंगा में चलने वाले पानी के जहाज में काम दिला दिया। ये जहाज कोलकाता से पटना आते थे। इन पर तेल, डालडा के कनस्तर और चीनी की बोरियां आती थीं। इन पर बिहार के मारुफगंज मंडी से मसाले और मखाना कोलकाता जाते थे। इन्हीं पर सामान लादने-उतारने का काम करने लगा।
अब पटना आने पर बस इतना-सा आराम हो गया था कि भूखे नहीं सोना पड़ता था। एक साल बाद पिता जी भी जेल से छूटकर घर आ गए। वो मेहनत-मजदूरी करके जब घर संभालने लगे, तो लगा कि मुझे पढ़ना चाहिए वर्ना जिंदगी भर यही सामान लादना-उतारना पड़ेगा।
एक स्कूल में एडमिशन लिए और पढ़ने जाने लगा। सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक स्कूल में रहता और उसके बाद पानी के जहाज पर काम करने चला जाता। वहां रात 10 बजे तक काम करता था। इस तरह 1971 में 10वीं तक पढ़ाई कर ली। उसके बाद बिहार नेशनल कॉलेज से इंटरमीडिएट किया।
इस दौरान मुझ पर वामपंथी आंदोलन का प्रभाव पड़ा। दरअसल, जब अपने गांव में था तो वहां के पास के सीकरी गांव में भी लोग वामपंथ से जुड़े थे, जिन्हें बचपन में देखा था। यहां पटना के जिस इलाके में रहता था वो सारा इलाका वामपंथ के प्रभाव में था। वामपंथी नेता राम अवतार शास्त्री यहां से तीन दफा सांसद बन चुके थे। वे गरीबी, भुखमरी, सामंती व्यवस्था, जाति व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते रहते थे, लिहाजा मैं भी उनके साथ जुड़ गया।

अर्जुन पासवान ने पटना आकर 10वीं और 12वीं की पढ़ाई की। यहां वामपंथी आंदोलन से जुड़कर लोगों के लिए काम करने लगे।
आंदोलन में जुड़ने के बाद अपने इलाके में चल रही मिट्टी के तेल की कालाबजारी के खिलाफ बोलने लगा। यहां के डिपो पर आने वाले मिट्टी के तेल को दबंग लूट ले जाते थे और उसे मंहगे दाम पर बेच देते थे। कोई विरोध नहीं करता था। मेरे घर वाले मुझे विरोध करने से रोक रहे थे, बावजूद मैंने इसका विरोध किया। इस दौरान मुझे धमकियां मिलने लगीं।
एक दिन जब सुबह किसी काम से घर से निकला और घर से थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि पहले से घात लगाए दो लोगों ने मुझ पर ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरू कर दी। पांच गोलियां मारीं। तीन गोलियां मेरी शरीर के आर-पार हो गईं। एक गोली माथे पर, एक टांग पर और एक सीने पर लगी थी।
उस दिन खून से लथपथ पुलिस स्टेशन की तरफ भागा और वहां जाकर बेहोश हो गया। पुलिस अपनी जिप्सी से मुझे नालंदा मेडिकल कॉलेज ले गई। इस दौरान काफी खून बह चुका था। डॉक्टरों ने तो कह दिया था कि 24 घंटे इंतजार कीजिए, अगर बच गए तो ठीक, वर्ना बचना मुश्किल है।
इस दौरान मुझे चार बोतल खून चढ़ाया गया। हालांकि, मेरी जान बच गई, लेकिन कोमा में चला गया। दो महीने कोमा मे बिस्तर पर पड़ा रहा। शरीर में जान नहीं थी, लेकिन दिमाग पूरी तरह जिंदा था। लोग आते, बातें करते और चले जाते। सब सुनता, लेकिन कुछ कर नहीं पाता।
डॉक्टर जब भी मेरे पास आते तो कहते- ’अब बचने की ज्यादा उम्मीद नहीं है’। इस दौरान मेरे ऊपर दोबारा न हमला हो, पुलिस सुरक्षा दी गई थी। दो पुलिस हमेशा पास रहते थे। वे भी जब आपस में बातें करते तो सब सुनता था। कहते कि देखो- कितना भला आदमी है, गरीबों के लिए लड़ता था, लेकिन क्या हाल कर दिया गया। दो महीने तक यह सब सुनता रहा, लेकिन बोल नहीं पाता था।
इस दौरान मेरी पत्नी पुलिस वालों से कहती- ‘आखिर का जरूरत थी ई सब करने की? गुंडों से क्यों भिड़े’? अंदर ही अंदर इशारे से पत्नी को जवाब देने की कोशिश करता कि जो हो गया, सो हो गया,कालाबाजारी का विरोध मैं न करता तो कौन करता? आखिर कुत्ता, बिल्ली की तरह तो नहीं हूं? लेकिन उस हालत में इशारा भी तो नहीं होता था! रिश्तेदार भी देखने आते तो यही सारी बातें कहते। यह सब सुनकर भीतर ही भीतर चिड़चिड़ा हो गया था। मन में सोचता कि काश बोल पाता।
दो महीने बिस्तर पर रहने के बाद ठीक होने लगा। अचानक हाथ-पैर हिलने-डुलने लगे। धीरे-धीरे चलने-फिरने शुरू हो गया। ऐसा महसूस हो रहा था जैसा नया जन्म मिला हो। जब ठीक हुआ तो भगवान पर मेरी आस्था बढ़ गई। सोच रहा था कि जब तक वो नहीं चाहे, कुछ भी बुरा नहीं हो सकता। उस समय 46 साल उम्र थी। अखबारों ने इस खबर को छापा था।
बाद में पता चला कि मुझ पर हमला करने वाले लोग एक दूसरे मामले में एनकाउंटर में मारे गए हैं। उस समय सोच रहा था कि आखिर वे मारे गए और मैं उनके हमलों से बच गया। कोई ताकत तो है, जो वक्त से पहले मुझे मारना नहीं चाहती।

कोमा रहने के दौरान अर्जुन पासवान की एक अखबार में छपी तस्वीर और खबर। उस समय यह 46 साल के था। 2 महीने कोमा में रहे। मिट्टी के तेल की कालाबाजारी का विरोध करने पर जब गुंडों गोली मारी थी। इन्हें कुल पांच गोलियां लगी थीं। तीन तो शरीर को पार कर गईं।
(अर्जुन पासवान ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए हैं।)
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